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प्रतिरोध रचती धुनें

भारतीय संगीत के क्षेत्र में प्रचलित मुहावरा है- ‘ओल्ड इज गोल्ड’। माना जाता है कि पुराने गीतों में कलात्मक औदात्य है, इसलिए वे हमारी संस्कृति की धरोहर हैं।

Author June 18, 2017 01:49 am
प्रतीकात्मक चित्र।

राजकुमार

भारतीय संगीत के क्षेत्र में प्रचलित मुहावरा है- ‘ओल्ड इज गोल्ड’। माना जाता है कि पुराने गीतों में कलात्मक औदात्य है, इसलिए वे हमारी संस्कृति की धरोहर हैं। अतीत में जीने की इस आदत के कारण पुराने गीत-संगीत, फिल्में, भाषा, कला आदि हमें सर्वाधिक प्रिय हैं। मगर क्या यह मानने के पीछे हमारा मनोविज्ञान आधुनिकता-विरोधी है? या समकालीनता के प्रति विग्रहवादी? या परंपरा के प्रति अतिरिक्त अनुरागी? क्या हम समाज की बदलती गति के साथ सामंजस्य बिठाने में असमर्थ हैं? इन प्रश्नों के साथ आज की युवा पीढ़ी पर नशे की तरह चढ़ती रैप, देसी हिपहॉप, पॉप, रॉक, आइटम सांग, फ्यूजन-रिमिक्स म्यूजिक, जैज और ब्लूज आदि को समझने का प्रयास करें तो सामान्य धारणा बनती है कि ‘ओल्ड इज बेस्ट’।
तब सवाल उठता है कि स्कूल-कॉलेज जाने वाली पीढ़ी नए किस्म के संगीत के पीछे क्यों दिवानी है? बसों और मेट्रो में, फुटपाथों पर चलते-फिरते इयरफोन लगाए इस संगीत में क्यों रमे रहते हैं? क्या यह केएल सहगल, गीता दत्त, लता मंगेशकर, रफी, किशोर, मुकेश, आशा भोंसले, मन्ना डे, आरडी बर्मन, शंकर जयकिशन, मदन मोहन, एसडी बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी जैसे महान गायकों-गीतकारों-संगीतकारों से ऊबी पीढ़ी है? या आस्वाद बदल जाने या नए विकल्प चुनने का मामला है? या इनके गीत-संगीत में नई पीढ़ी को आकर्षित करने की क्षमता चुक गई है?  माना जाता रहा है कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय, सूफी, लोकसंगीत की जड़ें इतनी गहरे धंसी हैं कि उपनिवेशवाद भी नष्ट नहीं कर सका। फिल्मी गीत भी इन्हीं धाराओं के बीच सामान्य जनमानस में लोकप्रिय हुए। अगर इनकी तुलना बाबा सहगल, देवांग पटेल, अलिशा चिनॉय, हार्ड कौर, बोहेमिया, यो यो हनी सिंह, नैजी, प्रभदीप, डिवाइन, ब्रोधा, रफ्तार, बादशाह, स्मोकी द घोस्ट, तोड़फोड़, डी मवाली आदि जैसे अजीबोगरीब उपनाम वाले रैप गायकों से की जाए तो एक सपाट निष्कर्ष निकलेगा कि दोनों पीढ़ियों के गीत-संगीत में अंतर्वस्तुगत, विधागत और शैलीगत अंतर है, इसलिए तुलना संभव नहीं।

वर्गीकरण करें तो रैप, हिपहॉप, पॉप, रॉक, जॉज में मामूली अंतर है। ये एक-दूसरे से जुड़े भी हैं। रैप को अमेरिकी, और अफ्रीकी संगीत माना जाता है। यह अपने अस्तित्व से ही क्रांतिकारी संगीत है। इसे ‘प्रतिरोध का संगीत’ कहा जाता है। या कहें संगीत विधा में ‘प्रतिरोध की आवाज’ है। इन आवाजों में रैप गायक के कड़वे निजी और समुदायगत जीवनानुभव तथा परिवेशगत विषमताएं प्रामाणिक रूप से उभरी हैं। अमेरिका-अफ्रीका के तथाकथित काले लोगों के नस्ली उत्पीड़न, सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक बहिष्कार, भेदभाव, विद्रूप, उपहास के खिलाफ रचनात्मक-अवधारणात्मक सांगीतिक स्वरूप में प्रस्तुति है। जैसे जैज के माध्यम से की गई थी। जैज उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के प्रारंभ में अस्तित्व में आया और रैप मार्टिन लूथर किंग जूनियर की मृत्यु के साथ सत्तर के दशक में। यह अपने अस्तित्व की लड़ाई, संघर्ष, अस्मिता की पहचान और आजादी को सांगीतिक मुहावरा बना कर प्रस्तुत करता है। राजनीतिक नारे बनने से अलग आख्यानात्मक गेयता देता है। हाशिए का यह संगीत जल्द ही मुख्यधारा में शामिल हो गया। गोरे लोग भी इसमें इस संगीत का हिस्सा बन गए। आज एमिनेम रैप की दुनिया के सबसे बड़े झंडाबदार, कमाऊ लोगों में हैं। मगर आज भी दुनिया में सर्वाधिक रैप गायक या तो नीग्रो हैं या झुग्गी से आने वाले। तथाकथित सभ्य संस्कृति में रैप को इसलिए बुरा माना जाता है कि उसमें बदमाशों के बीच धांय-धांय, सरे-राह हिंसात्मक मारधाड़, अभद्र भाषा, सेक्स, नशीले पदार्थ, पैसा, बाहुबल, उठाईगिरी, बर्बरता दिखती है। सत्ता और कॉरपोरेट की आलोचना होती है। वे अजीबोगरीब टी-शर्ट, उल्टी-तिरछी टोपी, सोने की मोटी-मोटी चेन पहने, ढीली पतलून, कभी अर्द्धनग्न, कभी पूरी देह पर टैटू बनाए, धूप का चश्मा चढ़ाए, बालों और दाढ़ी-मूछों को तरह-तरह से कटाए-रंगाए सड़क छाप नजर आते हैं।
रैप में शब्द-गुच्छों का प्रवाह होता है। पुराने गीतों में शब्दलय और अर्थलय के बीच संतुलन होता था। वे प्रतीकों, अलंकारों, तुकों और छंदों से बिंधे होते थे। यहां निरे गद्य को रफ्तार में हांक कर लय पैदा की जाती है। शब्द दनादन गोली की तरह छूटते हैं। शब्दों को घुमाया-फिराया और नचाया जाता है। ये मुकेश की तरह न तो व्याकरण को थामे रहते हैं, न रफी की तरह शुद्ध उच्चारण को। अक्सर इनके उच्चारण गलत और क्षेत्रीय दबाव लिए गली-कूचों से उठाए होते हैं। गालियों की बौछार होती है। मर्दानगी को इसकी विशेषता बना कर प्रस्तुत किया जाता है। जो शब्द सार्वजनिक मंचों के लायक नहीं माने जाते, उनका धड़ल्ले से प्रयोग होता है। डिवाइन इंगलिश रैप से हिंदी-इंगलिश या हिंगलिश में आया, फिर उसमें मराठी फेंटा। हनी सिंह ने हिंदी-पंजाबी-अंगरेजी की मिलावट की। बड़े दर्शक-श्रोता वर्ग को घेरने के लिए इस संगीत में भाषाई बहुलता बढ़ती जा रही है। रैप में जब ब्रेक डांस, फ्लोर डांस, एटीट्यूड आदि की मिलावट की जाती है तो वह हिपहॉप में बदल जाता है। रॉक संगीत अपनी गति में हिपहॉप से धीमा है।

हिंदुस्तान में रैप की शुरुआत बाबा सहगल ने 1990 में की। तब देश नई आर्थिक दुनिया में प्रवेश को छटपटा रहा था। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को बाधित कर मुक्त अर्थव्यवस्था के साथ सरपट दौड़ने की तैयारी कर रहा था। संगीत के क्षेत्र में इसी समय रपटीली, सक्रिय, तेज रफ्तार और गतिशील भागते हुए शब्दों के साथ बाबा सहगल ने प्रवेश किया। वनिला आइस के ‘आइस आइस बेबी’ से प्रेरित हो ‘ठंडा ठंडा पानी’ लेकर उतरे और भारतीय संगीत की दुनिया में नई शैली को सामने रखा। अपनी जिंदगी के बहुत करीब लाकर उन्होंने उसकी पुनरर्चना की। एक छोटे शहर के अनुभव जब मुंबई जैसे महानगर के अनुभव से टकराए तो उनके गीतों के बोल बदल गए। ‘ठंडा ठंडा पानी’ में महानगरीय संस्कृति को आसानी से देखा जा सकता है। उनका यह ‘इंडी-पॉप कल्चर’ हिट रहा। देसी रैपर हनी सिंह जब ‘चार बोतल बोदका…’ गाते हैं तो कहीं न कहीं युवाओं के बीच पार्टी के नाम पर पसर रही नशे की संस्कृति और पंजाब में फैली नशा अपसंस्कृति के यथार्थ को सामने रखते हैं।

हनी सिंह, नैजी, डिवाइन, मवाली, परधान, ब्रोधा आदि रैप गायकों ने रैप म्यूजिक का भारतीयकरण किया। प्रादेशीकरण भी। रोमांस और प्रेम से आगे संगीत को जनवादी बनाया। हनी सिंह के बॉलीवुड में प्रवेश, लोकप्रियता और फिल्मों में रैप-हिपहॉप की जगह सुनिश्चित होते ही रैपरों की बाढ़-सी आने लगी है। यह कैरिअर भी बन गया है। नैजी और डिवाइन की अलग-अलग सफलता और संयुक्त मोर्चे ने बीबीसी और एप्पल म्यूजिक को भी आकर्षित किया। इनके संगीत में मुंबई के झुग्गी समाज का यथार्थ बोलता है। वे रैप से समाज में जागरूकता फैलाते हैं। ज्ञान को गतिशील बनाते हैं और क्रोनी कैपटलिज्म के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं।  डिवाइन उन्हें ‘जंगली शेर’ कहते हैं। इस जंगल की कहानी में टू-जी घोटाले से लेकर सत्ता की सीनाजोरी भी है। भूख, आर्थिक विषमता, बेरोजगारी और रोज के लफड़े हैं। संसाधनों को लूटने वाले लोग हैं। संगीत के माध्यम से सबसे ताकतवर लोगों को इतनी खुली चुनौती कभी पहले सुनने-देखने को नहीं मिली। अपने निजी दुखों, संघर्षों और अकेलेपन को शब्दों में बांधते हुए ये रैपर घोषित करते हैं कि ‘सड़क पर रह लूंगा/ लेकिन ईमान नहीं बेचूंगा’। दरअसल, रैप और देसी हिपहॉप खुद को व्याख्यायित करने और अपने अनुभव को बयान करने का एक संगीतात्मक माध्यम है, जो दृश्य माध्यम में सामने आ रहा है। इसके माध्यम से रैपर बेहद ईमानदारी से अपने दृष्टिकोण और सामाजिक दर्शन को भी रखता है। लेकिन इनकी लोकप्रियता के बीच बॉलीवुड घुस गया है, जो इस व्यवस्था-विरोधी क्रांतिकारी संगीत को बाजारू बनाने में जुट गया है।

 
५राजकुमार

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