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लोकप्रियता के मौजूदा मरहले

आज फिल्मों की लोकप्रियता का पैमाना आमूल-चूल बदल गया है। ताजा पैमाना ‘सौ करोड़’ वाला है।

Author January 15, 2017 4:40 AM
सैराट फिल्म का बजट बहुत ज्यादा नहीं होने के बावजूद यह सिनेमाघरों में तकरीबन 100 दिनों तक टिकी रही।

सत्यदेव त्रिपाठी

आज फिल्मों की लोकप्रियता का पैमाना आमूल-चूल बदल गया है। ताजा पैमाना ‘सौ करोड़’ वाला है। इस ‘सौ करोड़ क्लब’ के पैमाने पर ताजा विजेता फिल्म है ‘दंगल’, जिसने साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए की कमाई करके एक नया रेकॉर्ड कायम किया है’।जाहिर है कि कमाई की इस आंकड़ेबाजी ने लोकप्रिय शब्द का अर्थ बदल दिया है। अब यह ‘लोक को प्रिय’ का नहीं, ‘बाजार को प्रिय’ का वाचक बन गया है। एकाध दशक पहले सिलवर और गोल्डन जुबली के पैमाने चलते थे। उसमें पच्चीस-पचास सप्ताह तक देखने वालों (लोक) की प्रियता का मर्म था। लेकिन तब यह नहीं बताया जाता था कि कितने करोड़ कमाए।

उस जुबली-काल में बालकनी, अपर, लोअर स्टॉल वाले सिनेमाघरों के टिकट दर के हिसाब से करोड़ीमल होना न संभव था, न सपना। अब इस बाजार के रहनुमाओं ने मल्टीप्लेक्स बना कर टिकट के रेट कई गुना बढ़ा दिए हैं, जिसके चलते कम समय में कम देखने वालों के बावजूद उगाही (कलेक्शन) उतनी ही गुना बढ़ गई है। इसलिए अब अधिक लोगों तक फिल्म के पहुंचने या अधिक दिनों तक देखे जाकर चर्चा में रहने और असरकारक होने की धारणा ही बदल गई है। लोकप्रिय की एक धारणा ‘वैचारिक’ के समक्ष ‘लोकप्रिय सिनेमा’ की भी थी, जो व्यावसायिक से वाबस्ता थी। उसका मतलब भी व्यवसाय करना यानी कमाना ही था। लेकिन इस स्तर तक जाकर उगाही करने का इरादा उसमें नहीं था। पर वैचारिक की वह धारा अब समाप्तप्राय हो गई है। इधर बड़े छलावे भरे कौशल के साथ उस व्यावसायिकता ने वैचारिक सिनेमा को अपने में समो लिया है, बल्कि कहें उसे निगल लिया है और इस तरह अब अपने एकछत्र राज्य में ‘व्यावसायिक’ की संज्ञा से पल्ला झाड़ कर, ‘कुछ भी करने को आजाद’ सिनेमा ‘लोकप्रिय करोड़ीमल’ हो गया है।

स्टारडम को बनाने और भुनाने के फॉर्मूले पिटे-पिटाए ढंग से बारंबार दुहराए जा रहे हैं। दुहराए तो विषय भी जाते हैं। खेल जीवन पर बनी फिल्में ही लें। इधर चार सालों में ढेरों आ गई हैं। उनमें ‘दंगल’ और ‘सुल्तान’ की कुश्तियों को ही ले लीजिए और इन्हें ‘मिस मेरी’ से मिला कर देख लीजिए। इसे ‘लगान’ के साथ भी रखा जा सकता है। ‘दंगल’ कराने वाले नीलेश तिवारी कहते हैं कि ‘सुल्तान’ वाले अली अब्बास जफर उनके पास आए और दुहराव निकाले। निकाले या वही के वही भावुक जोड़ भेस बदलवा कर डाले, का मर्म समझ में आ जाएगा। यह मामला तो फिर भी कहीं न कहीं कलागत है। पहले के व्यावसायिक सिनेमा में हिट के लिए मसाले के रूप में शामिल होने वाले अतिरंजित घटक सर्वविदित हैं- पब्लिक की पसंद के गाने, कहानी में फैंटेसी की छौंक, कॉमेडी के बघार, सुंदर नायिकाओं के चयन, उनके रूप और देह के प्रदर्शन, स्टारों-मल्टी स्टारों के समावेश, कैबरे और कव्वालियां, फाइटिंग और ऐक्शन आदि। और तब समझदार और सुरुचि-संपन्न दर्शक पर यही भारी पड़ने लगते थे। इन्हीं को खत्म करके वैचारिक सिनेमा आया और सिर-माथे पर लिया गया था।

आज ढेरों ऐसे आयोजन हैं, जिनका कलागत मानकों से कुछ लेना-देना नहीं रह गया है, जो कला-क्षेत्र से इतर और अवांतर, बल्कि कला के नाम पर कलंक हैं। लेकिन अब तो ‘सौ करोड़ी क्लब’ के लाभ-लोभ और स्टेटस वाले मुकाम को पाने के लिए प्रमोशन का चलन इस कदर हावी हो गया है, गोया बड़े-बड़े स्टार शहर-दर-शहर अपने संवादों-स्लोगनों की फेरी लिए फिर रहे हैं। जरा-सा गौर करने पर यह भी दिखता है कि ‘सुल्तान’, ‘पीकू’, ‘चेन्नई एक्स्प्रेस’ आदि रिलीज होती हैं, तो सारी टॉकिजें ऐसे आरक्षित कर ली जाती हैं कि छोटे बजट की फिल्में और अच्छी फिल्में अच्छे टॉकिजों और शोज में जगह नहीं पातीं, हाशिए पर चली जाती हैं। ऐसे में ‘मोह माया मनी’ तो क्या ‘कहानी-2’ जैसी फिल्मों तक के शोज का पता लगाना पड़ता है। ‘मसान’ जैसी फिल्म का न चल पाना इस ‘सौ करोड़ क्लब’ के साइड इफेक्ट का ही नतीजा है। ‘लंच बॉक्स’ में करन जौहर का हाथ न लग जाता, तो जाने क्या हस्र होता! ‘हाइवे’ जैसी फिल्म कब आती और चली जाती है, आंखों-आंख नहीं दिख पाती। अगर कोई ‘जॉली एलएलबी’ चल भी जाती है, तो फिर अपने पार्ट-2 में इसी क्लब वालों द्वारा हथिया ली जाती है। बाजार के इस जंजाल में फंस कर ढेरों अच्छी फिल्में उत्सवों तक महदूद या यू-ट्यूब तक कीलित रह जाती हैं। बड़ी मछलियों द्वारा छोटी मछलियों के निगले जाने का सरेआम ऐसा नजारा अन्यत्र दुर्लभ है।

लोकप्रियता की ‘सौ करोड़ी क्लब कल्चर’ का एक और बाजारी गणित मल्टीप्लेक्स है, जो अपने इरादों में बाजारू भी है। सीधे मॉल से संचालित होता है, जो फिल्म से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। उसके होटल, शो रूम आदि कैसे हों, वहां चीजों की गुणवत्ता कैसी हो और यह सब कुछ लोगों की रुचियों के अनुकूल हो, उसे बढ़ावा देने वाली हो, आदि का खास ध्यान रखा जाता है। मतलब यह कि मॉल में जिस तरह माल बिकता है, उसी तरह फिल्म भी बेची जाती है। इस दबाव में फिल्म से अधिक अहम भूमिका मार्केट रिसर्चर की हो गई है। इस अ(न)र्थशास्त्र का जलजला यहां तक पहुंचा कि निर्माता ने फिल्म को ‘आलू का चिप्स’ तक कह दिया। और उन रिक्शे-ठेले वाले तथा मामूली रोजगार और नौकरी करने वाले दर्शकों को ‘चवन्निया छाप’ जैसा तिरस्कृत नाम दिया गया, जिनके लिए कभी प्रदर्शनपरक कला (नाटक) का जन्म हुआ था, लेकिन सौ करोड़ी लोकप्रियता को अब उसकी दरकार कतई नहीं।

बज्जर पडे उस दर-ओ-दौरां पर, जब फिल्म बनने में काफी खर्च का हवाला देकर जमाने से मनवा लिया गया कि सिनेमा के बनने में लगी लागत की वापसी के लिए फिल्मों की बिक्री अपरिहार्य है। इसी बिक्री की हथछुट ने ऐसी छूत लगाई कि सब बिकाऊ हो गया। इस ताकतवर माध्यम का स्क्रू धीरे-धीरे ढीला होता गया और पेंच ऐसा पड़ा कि इसका पेचकस बाजार के मैकेनिक के हाथों में पकड़ा दिया, जो अपना मकसद साधने में इसे धीरे-धीरे कसने लगा। इतने में बाजार का ठेकेदार नमूदार हुआ और भूमंडलीकरण के अभियंता का अवतार हो गया। इनके जलजले ने जो मंजर खड़ा किया है, उसमें अवाम की दर्शकता का लोप हुआ है, उसके साथ संवाद टूट गया है, यानी असली लोकप्रियता का खात्मा हो रहा है, जो बरबस चिंतनीय है। ऐसा नहीं कि इस दौर में अच्छी फिल्में नहीं बन रही हैं और वे समानांतर सिनेमा के दौर को सबक सिखाती चल भी रही हैं। सौ करोड़ी क्लब के बरक्स प्रतिभा का विस्फोट भी इस युग की उल्लेखनीय विशेषता है। एक से एक जहीन निर्देशक-लेखक, कुशल तकनीशियन और समझदार निर्माता आज कार्यरत हैं। उनकी दीवानगी और बेफिक्री काबिले-तारीफ है। पर यह समृद्धि इसी सौ करोड़ी लोभ-लाभ के परवान चढ़ जा रही है।

 

 

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