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जड़ों से कटने का नतीजा

पहले के लोक-समाज अपनी जिन व्यवस्थाओं पर टिके थे, उनकी जगह अब आधुनिक विकास के पश्चिमाभिमुख उपक्रमों ने ले ली है। जिस तरह का ‘एपोरिया’- ऐसा सवाल जिसका जवाब नहीं है, ऐसी समस्या जिसका समाधान नहीं है- पहले अंग्रेजों ने और फिर आधुनिक व्यवस्थाओं ने गढ़ा है, वह मिथ्या है।

Author November 5, 2017 5:00 AM
प्रतीकात्मक चित्र।

पीयूष दईया 

यह एक निर्मम सच्चाई है कि पिछली दो सदियों में पश्चिम में लोक विषय के अध्ययन के सिलसिले में जो औजार, पद्धतियां और रीतियां आविष्कृत हुर्इं, हमने भी हूबहू उन्हीं प्रणालियों को अपना लिया। अब यह निर्विवाद है कि अंग्रेजों ने भारतीय मानस और यहां की सामाजिक व्यवस्थाओं को तोड़ कर अपनी जो शक्ति संरचनाएं निर्मित-स्थापित कीं, उनसे लोक भारत का ताना-बाना क्षत-विक्षत हो गया। स्वतंत्र भारत के अध्येताओं और शासकों ने उसे जारी रखा, बजाय उसे आमूलचूल बदल डालने के।  क्या हम यह अनदेखा कर सकते हैं कि कैसे किसी एक खास संस्कृति, समुदाय या रचना-रूप को शोधार्थी जिस रीति और परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रहा है वह प्रस्तुतीकरण मात्र सब कुछ को अंतत: उलट देता है? सुविचारित ढंग से बहुत कुछ को बुनियादी रूप में बदल-बिगाड़ देता है?

दरअसल, पहले के लोक-समाज अपनी जिन व्यवस्थाओं पर टिके थे, उनकी जगह अब आधुनिक विकास के पश्चिमाभिमुख उपक्रमों ने ले ली है। जिस तरह का ‘एपोरिया’- ऐसा सवाल जिसका जवाब नहीं है, ऐसी समस्या जिसका समाधान नहीं है- पहले अंग्रेजों ने और फिर आधुनिक व्यवस्थाओं ने गढ़ा है, वह मिथ्या है। लोक सर्जना अक्सर एक जीवंत और लगातार सक्रिय कल्पना है- किसी एक समय में ठहरी हुई नहीं है। इस कल्पना की जड़ें हमेशा संबंधित समुदाय के मानस में गहरे तक रची-बसी होती हैं। हमारे यहां एक ही समय में अनेक सदियों का सहअस्तित्व है। और जीवन सामूहिक स्मृति के बहुवर्णी फलन हैं। यहां स्थानीयता ही उन्मोचित होकर सार्वभौम में रूपांतरित हो जाती है। लोकाभिव्यक्ति की पारंपरिक भाषा सदा देशज संवेदनशीलता का नवोन्मेषित रचाव होती है। अपने उत्तरवर्ती चिंतन में विट्गेंस्टाइन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक भाषा की कल्पना करने का अर्थ एक जीवन-रूप की कल्पना करना है। विट्गेंस्टाइन-पद्धति से विचार करें तो समझ आता है कि भारतीय लोक-जीवन-रूपों और व्यवहार के चरितार्थन अब महज अवशेष रह गए हैं।

यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है कि न केवल शिक्षा-दीक्षा, बल्कि समूचे जीवन के ताने-बाने में औपनिवेशिक कारकों की वर्चस्वकामी सक्रियता का चेतन-अचेतन दबाव है। दरअसल, विचारों में आधिपत्य का एक सूक्ष्मतर रूप भी होता है, जो विचारों के क्षेत्र में एक संस्कृति द्वारा दूसरी संस्कृति पर हावी होने पर दिखाई देता है। यह आधिपत्य अंतत: अधिक चिंताजनक होता है, क्योंकि सााधारणतया उसे लोग महसूस नहीं करते। दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य ने लिखा है: ‘जब तक व्यक्ति किसी बंधन के प्रति सचेत है तब तक उसके द्वारा प्रतिरोध संभव है। उसे एक अपरिहार्य बुराई के रूप में सहते हुए भी आत्मा में स्वतंत्र रहा जा सकता है। दासता तब आरंभ होती है जब व्यक्ति बुराई को महसूस करना ही बंद कर देता है।… जब अशुभ को शुभ के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो वह दासता और गहन-गंभीर हो जाती है।’ इसीलिए यह समझ लेना स्वाधीन बुद्धिजीवी की सबसे बड़ी चुनौती है, तभी हम लोक के अपने स्वराज्य की जड़ों में पुनर्वास कर सकेंगे।

लोक-समय केवल एक विषय पर बातचीत नहीं है या साहित्यिक या सौंदर्यशास्त्र या नैतिक मूल्यों पर। यह राजनीति पर भी विचार-विमर्श है और सांस्कृतिक परिघटना पर भी। हमारे समय में ‘लोक’ की बात प्रकारांतर से ग्राम-समुदायों की बात में महदूद हो कर रह गई है- शहर, कस्बे, गांव का अंतर लगातार पटता जा रहा है। संचार-क्रांति ने सब उलट दिया है। लोक की सामूहिक स्मृति क्या तेजी से तिरोहित नहीं होती जा रही? अपनी अनुष्ठानपरक और आस्तिक ऋजुता की भित्ति से विच्छेदित होते ही लोक की सारी देशज थाती एक उत्पाद में बदल जाती है: अंतत: मनोरंजन, व्यवसाय और अपने निहित स्वार्थों के पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए। ज्यादातर लोक कलाकारों और गायकों का कहना है कि वे छुटपन से ही अपने पारंपरिक काम को सीखने-करने में मुब्तिला हो गए थे। अब बाल श्रम की समस्या को यहां किस तरह से रखेंगे? यह समस्या कहीं ऐसा तो नहीं कि फिर आधुनिकीकरण का एक विवरण है? दो कोण रखता हूं: एक कलाकार और गायक कहता है कि एक उच्च-कोटि का कलाकार है, भले लोग उसे न जानें, वह देसी घी की तरह है, जिसकी सुगंध आएगी ही। यह वह पारंपरिक सोच है, जिसमें अपनी कला पर गहरा और मजबूत भरोसा तथा आत्म-गौरव है।

जबकि एक दूसरा कलाकार कहता है कि ‘कलाकार वह वहां तक होता है जहां तक लोग उसे जानें’ अगर वह अपने गांव, अपने घर तक में सीमित रह जाता है तो असल में वह अपने को मार रहा है। तब उसकी हैसियत ‘घर में खूंटे की तरह’ है। यह आधुनिकता और मुख्यधारा में प्रवेश के लिए छटपटाहट है। यह विमानवीयकृत संसार में अपने लिए एक जगह बनाना चाहता है। अब एक लोक-शिल्पी या एक लोक-गायक जिस संसार के लोगों के लिए प्रस्तुत होता है उसका उसे न तो अनुभव है न बोध। यह वह संस्कृति है, जो उससे पूरी तरह अनभिज्ञ है। डिजाइन के क्षेत्र में आज क्या हो रहा है? उत्तर-औपनिवेशिक शिक्षा-दीक्षा से लैस और पेशेवर तौर पर प्रशिक्षित डिजाइनर ने हस्तशिल्प को एक उत्पाद-मात्र में बदल दिया है। डिजाइनर और कारीगर की पारंपरिक दोहरी भूमिका निभाने वाला लोक-हुनरमंद अब नागर डिजाइनर को सिर्फ एक दक्ष श्रम मुहैया कराता है, ताकि वह नागर डिजाइनर इस दक्ष श्रम से अपने द्वारा संकल्पित विचारों को मूर्त रूप दे सके। घर या अपने मानुसों के बीच आनुष्ठाानिक उद्देश्य के लिए किया जाने वाला चित्रांकन अब कागज या कैनवास पर दूसरों के लिए एक व्यवसाय के बतौर किया जाने लगा है। वैश्वीकृत बाजार में भारतीय कला-रूपों की मांग दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है, लेकिन स्वयं लोक-कलाकारों की जीवन-स्थितियों पर नजर डालें, तो लगता है कि वे भारत में ऐसे बड़े-छोटे व्यावसायिक घरानों के उपनिवेश में बदलते जा रहे हैं, जहां उनके श्रम और हुनर का शोषण होता है। कलाकार अपने मानवाधिकारों तक के प्रति जाग्रत नहीं हैं। वैश्वीकरण के दौर की चुनौतियों और मुद्दों का अपना सिलसिला है, जिसका सामना किए बिना अब भविष्य की कोई सार्थक रूपरेखा नहीं बन सकती। अगर भूमंडलीकरण सचमुच कड़ियों को जोड़ने का प्रयास है तो आज भूमंडलीकृत होने के लिए सबसे पहले वे औजार होने चाहिए, जिसके साथ भूमंडलीकृत हुआ जाए।

यह आत्मबोध लगातार सक्रिय रहना चाहिए कि एक देश और समाज अपने विवेक, ज्ञान और जड़ों को खारिज या विस्मृत करके कभी खिल नहीं सकता। अनुपम मिश्र भी यह ठीक ही विश्लेषित करते हैं कि पिछले दो सौ सालों से विचार का केंद्र अंग्रेजी या पश्चिम बिना सोचे-विचारे इस तरह मान लिया गया है कि जो उनकी बहस है वही हमारी है। यह अपने में विडंबनामूलक तथ्य है कि विभिन्न पारंपरिक और लोक-शैलियों की सभी रचनात्मक विधाओं के अपने व्याकरण, तकनीक और सौंदर्यशास्त्र होने के बावजूद- जो कि उनके सृजन-कार्य से प्रकट होता है- इनसे संबंधित साक्ष्य-स्वरूप जो किताबें या निबंध हमारे पास उपलब्ध हैं, उनमें से अधिकतर अंग्रेजी में ही लिखे गए हैं और कहना न होगा कि उनकी दृष्टियां कुछ इस तरह से भ्रांतिमूलक और पूर्वाग्रहग्रस्त हैं कि हम उन पर भरोसा तक नहीं कर सकते। लोक-वांग्मय के अध्ययन के लिए हमें अपनी स्वदेशी दृष्टि, प्रणालियां और विधियां आविष्कृत और विकसित करनी होंगी। यही वह वास्तविक प्रस्थापना-प्रवर्तन है, जिसकी हमें सच में दरकार है, ताकि तथाकथितों का वर्चस्व टूट सके और जड़ों की सांसें खिल सकें। अन्यथा हमारे पास भटकावों के दस्तावेज तो होंगे, लेकिन सच्चे मार्ग के रहस्य नहीं। दूसरे की र्इंटों से हम अपना घर नहीं बना सकते।

 

 

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