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बिसरती देसी ज्ञान परंपरा

वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस युग में बैलगाड़ी की पैरवी करना निहायत पिछड़ापन माना जा सकता है।

firozabad, firozabad tension, firozabad cow deaths, firozabad protests, firozabad cattle smugglers, firozabad news, up newsफिरोजाबाद: हाईवे के पास एक खेत में 13 गाएं और 5 बैल मरे पाए गए।

वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस युग में बैलगाड़ी की पैरवी करना निहायत पिछड़ापन माना जा सकता है। विकास का नाम बैलगाड़ी जैसी उलटबांसी किसी भी विवेकवादी के लिए दिक्कत पैदा करने वाली हो सकती है। तीन दशक पहले इस देश में तकरीबन सवा करोड़ बैलगाड़ियां हुआ करती थीं, जो घट कर दस लाख तक पहुंच चुकी हैं। उन पर हर वर्ष सैकड़ों करोड़ टन उत्पाद का स्थानांतरण और हजारों करोड़ का मूल्य संवर्द्धन होता था। यह संवर्धन सीधे किसान की आय का हिस्सा बनता था। अगर इसकी लागत की तुलना पेट्रोल और डीजल से चलने वाले विकल्पों से की जाए तो कल्पना की जा सकती है कि कितनी ऊर्जा और धन की बचत की जा सकती है। ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन रेटिंग की लागत जोड़ दें तो यह और प्रासंगिक हो जाता है।

पूरी दुनिया में पारंपरिक देसी ज्ञान परंपराएं तेजी से लुप्त हो रही हैं। यह संकट तीसरी दुनिया के देशों में तेजी से फैला है। इस पर तब गौर किया गया, जब तमाम जैव और वानस्पतिक प्रजातियां लुप्त हो चली हैं। संकट यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि धरती की पारिस्थितिकी भी इससे अछूती नहीं है। आधुनिक काल में खेती, पर्यावरण आवास से लेकर जीवन के तमाम बर्ताव में पारंपरिक देशी ज्ञान और समझ गायब हो रही है। आज दुनिया भोजन की उपलब्धता से कहीं अधिक धरती की गायब होती उर्वरता से चिंतित है। देशी ज्ञान परंपराएं जिस विवेकवादी दबाव में लुप्त हुर्इं, वही आधुनिक तर्क प्रणाली देशी ज्ञान परंपराओं को टिकाऊ विकास की अवधारणा के रूप में पुनर्व्याख्यायित कर रहा है। आधुनिकता परंपरा का अंधा प्रतिरोध नहीं, बल्कि उसे विवेकवादी दृष्टि से समझने में है। आज जब पश्चिमी देश पूर्व की देशी ज्ञान परंपराओं पर शोध करके उसे बाजार में पेश करते हैं, तो तथाकथित आधुनिकतावादी उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं। हम लगातार अपनी देशी ज्ञान परंपराओं को विसारते जा रहे हैं। चाहे वे परंपराएं पर्यावरण, प्रकृति या हमारी जरूरतों के अनुकूल क्यों हों। अपने ज्ञान के प्रति हिकारत वाला नजरिया एक औपनिवेशिक निर्मिति है, जिसकी पुनर्समीक्षा प्रासंगिक है।

दरअसल, आजादी के बाद के नीति नियामक गांव को समझने में विफल रहे हैं, क्योंकि गांव के लिए टिकाऊ विकास की कल्पना वहां की अंतर्निहित विशेषताओं और परंपराओं को समझे बिना नहीं की जा सकती। आज भारतीय कृषि की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि गांव की जरूरतों के अनुरूप तकनीक का स्थानांतरण जमीनी स्तर पर नहीं हो पाया है। आधुनिक शोध और अनुसंधान में देशी ज्ञान जमीनी सामुदायिक परंपराओं की समझ का अभाव है। नतीजतन, विकास के सारे कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते और गांव और शहर के बीच आर्थिक असमानता का माध्यम बनते हैं। भूमंडलीकृत बाजार के इस दौर में बैलगाड़ी, साइकिल, घराट, कोल्हू जैसे तमाम पारंपरिक ज्ञान प्रचलन से बाहर हो गए। यह उन समाजों में हुआ, जहां उनकी जरूरत मौजूद थी।
तकनीक विकास की इस अंधी दौड़ में इस बात से बहुत कम लोग वाकिफ होंगे कि चिकित्सा विज्ञान की तमाम आधुनिक खोजों की मूल प्रेरणा स्थानीय और जनजातीय समाज की परंपराए हैं। तमाम शोधों के निष्कर्ष यही बताते हैं कि पौधों पर आधारित अस्सी प्रतिशत आधुनिक दवाओं का प्रयोग पारंपरिक समाजों में पहले से प्रचलित था। बस हुआ यह है कि उस देशी ज्ञान की तार्किक व्याख्या कर ली गई है।

अमेरिकी चिकित्सक और वैज्ञानिक डीन ओर्निश ने हृदय रोगों के लिए योग उपचार के बजाय निवारण का नजरिया देकर धूम मचा दी। उनके इस प्रयोग में योग और मेडिटेशन प्रमुख अवयव थे। उन्होंने यह स्थापित किया कि हृदय रोग जैसे मनोकायिक विकार लाइलाज नहीं हैं, बल्कि उन्हें भी पलटा जा सकता है। इस प्रक्रिया में पूरी दुनिया के चिकित्सा विज्ञान की यह समझ उभरी कि मनोकायिक विकारों का निदान सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि मन से मिला कर देखने में निहित है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट ने ढाई दशक पहले पानी के बारे में डाइंग विसडम नामक प्रख्याड अध्ययन में साबित किया कि राजस्थान में टांकों से जल संरक्षण की जो देशी परंपरा थी, उसका कोई टिकाऊ विकल्प नहीं हो सकता। इस अध्ययन से यह बात सामने आई कि शुद्धता, गुणवत्ता और लागत के नजरिए से देशी ज्ञान परंपराएं और उनका तोड़ आज की तकनीक के पास नहीं है। इस देश के करोड़ों लोगों के लिए शुद्ध पानी की जरूरत क्या बिजली से चलने वाले फिल्टर और वाटर प्यूरीफायर से पूरी की जा सकती है? अगर हम सोचते हैं कि कुओं और बावड़ियों का टिकाऊ विकल्प उभर पाया है, तो यह भ्रम ही होगा। सदियों से मिट्टी के घड़े, मटकी भारत जैसे देश में आम जीवन का हिस्सा रहे हैं। इनका चलन फ्रिज और रेफ्रीजेरेटर की वजह से गायब हो रहा है। क्या यह वैकल्पिक नजरिया तर्कपूर्ण नहीं है कि एक परिवार में बीस से तीस लीटर ठंडा पानी बिना किसी लागत के मुहैया कराने वाला घड़ा बेवजह मारा जा रहा है।

पारंपरिक वास्तु की समझ हमारे जीवन और बर्ताव से गायब होती जा रही है। पारंपरिक आवास की जगह पक्के मकान ले रहे हैं। पहले आवास एक मुकम्मल सोच थी, जिसमें घर के साथ उसका वातावरण भी शामिल था। पारंपरिक कच्चे घरों को र्इंट, कंक्रीट के ढांचे ने प्रचलन से बाहर कर दिया, बिना इस समझ के कि वे उस वातावरण के अनुकूल हैं या नहीं। कच्चे घरों, झोपों में सदियों का अनुभव और दृष्टि शामिल थी। ये पारंपरिक घर भारत जैसे गरम और सर्द मौसम में तापनिरोधक का काम करते हुए ऊर्जा की बेहद बचत करते थे। इनके चलन से बाहर होने से तमाम स्थानीय रोजगार अवसरों में कमी ही नहीं आई, बल्कि अनेक पारंपरिक कौशल भी लुप्त हो गए। नए घरों ने महंगी लागत के कारण ग्रामीण जीवन पर अनचाहा आर्थिक दबाव बनाया।

खेती की पारंपरिक समझ तो बेहद दिलचस्प है। सहरोपण, फसल चक्र, जैविक खेती और जल संरक्षण जैसी तमाम बातें, जो आज टिकाऊ विकास के केंद्र में हैं, उनका मूल देशी ज्ञान परंपराए हैं। यहां डेनियल क्विन की उक्ति याद आती है कि ‘‘देशज लोग विश्वास करते थे वे इस धरती के लिए हैं, जबकि सभ्य लोग यकीन करते हैं कि धरती उनके लिए है।’’ स्थानीय और सभ्य लोगों के नजरिए के बीच के इस फासले को अगर हम मिटा नहीं पाए, तो आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ बता पाएंगे कि इस धरती की हरियाली में तितलियां हुआ करती थीं और सूकून भी कुछ ज्यादा था।

 

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