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अभिव्यक्ति और यथार्थ का अतिरेक

अतियथार्थवाद दादावाद की प्रक्रिया में ही विकसित हुआ। पहला विश्वयुद्ध इसके जन्म का कारण माना जाता है। इसका केंद्र पेरिस रहा और 1920 के बाद यह पूरी दुनिया में फैला और इसने साहित्य, कला, संगीत, फिल्म और नाटक को प्रभावित किया
Author October 8, 2017 03:39 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

ज्योतिष जोशी

क समय था जब अतियथार्थवाद सभी वैचारिक मान्यताओं को पीछे छोड़ कर कलाओं का मानक तय करने लगा था। एक वाद के रूप में पूरी दुनिया में फैल जाने वाला यह सांस्कृतिक आंदोलन भले अब उतना प्रभावकारी नहीं रहा, लेकिन आज भी पूरी दुनिया में उसे अपना कर काम करने वाले मौजूद हैं। इस वैचारिक आंदोलन का इतिहास बड़ा दिलचस्प है। अपने स्वरूप में अतियथार्थवाद अपने दृश्यात्मक कामों और लेखन के कारण जाना जाता है। इसमें कलाकार अतार्किक, अवास्तविक दृश्यों को छायाचित्र की पृष्ठभूमि में दिखाते हैं। इसमें विचित्रता दृश्य होती है। रोजमर्रा की वस्तुओं से विचित्र जीवों की रचना करके कलाकार चित्रकला की तकनीक से अवचेतन की भी अभिव्यक्ति करता है। इसका लक्ष्य रहा- स्वप्न के पूर्व की अंतर्विरोधी स्थितियों, वास्तविकताओं को ठोस वास्तविकता और उसे परा-यथार्थ में रूपांतरण करके प्रस्तुत करना। उसके घोषणा-पत्र में स्पष्ट है कि यह विचार स्वप्न-व्याख्या और कलाकार के अवचेतन की यात्रा है, जिसमें कल्पना से मुक्ति भी है। इसे एक हद तक पागलपन भी करार दिया गया। इसका जवाब देते हुए विख्यात कलाकार सल्वाडोर डाली ने कहा था- ‘‘एक पागल आदमी और मुझमें यही अंतर है कि वह पागल आदमी है और मैं सिर्फ आदमी हूं।’’ आश्चर्य मिश्रित तत्त्वों, अप्रत्याशित और अतार्किक तथ्यों को अपनी निर्मिति का आधार बना कर चला यह आंदोलन उससे संबद्ध कलाकारों और लेखकों के लिए एक सांस्कृतिक आंदोलन था। इसके सूत्रधार आंद्रे ब्रेतों ने तो इसे क्रांतिकारी आंदोलन तक कह डाला था।

यह सच है कि अतियथार्थवाद दादावाद की प्रक्रिया में ही विकसित हुआ। पहला विश्वयुद्ध इसके जन्म का कारण माना जाता है। इसका केंद्र पेरिस रहा और 1920 के बाद यह पूरी दुनिया में फैला और इसने साहित्य, कला, संगीत, फिल्म और नाटक को प्रभावित किया।अतियथार्थवाद शब्द मार्च, 1917 में गुइलाम अपोलीनायर द्वारा दिया गया। उन्होंने पाल डर्मी को एक पत्र लिखा और कहा कि ‘आज के सभी चित्रों को देखने के बाद लगता है कि इसे अतियथार्थवाद कहा जाना चाहिए।’ अपोलीनायर ने इस शब्द का प्रयोग अपने एक कार्यक्रम की प्रस्तावना में किया था, जो सर्जे दियाविलेव के बैले रसेज ‘परेड’ के लिए था। ‘परेड’ एक अंक का बैले था, जिसमें जिन कॉकटेउ की भूमिका थी। इस नृत्य नाटिक का संगीत एरिक सैटी ने तैयार किया था। उस समय कॉकटेउ ने इसे यथार्थवादी कहा था। बाद में अपोलीनायर ने इसे अतियथार्थवादी कहा। इस शब्द का पहला लिखित प्रयोग अपोली नायर ने ‘लेस मामेल्स’ नामक नाटक की भूमिका में किया था, जो 1917 में खेला गया था। पहले विश्वयुद्ध के दौरान जो कलाकार और लेखक पेरिस में रह रहे थे, उनमें से अनेक दादावाद से प्रभावित थे। वे मानते थे कि अधिकतम तार्किक विचार और बुर्जुआजी मूल्य पहले विश्वयुद्ध में द्वंद्व लेकर आए। दादावाद का विरोध भी तब कलाविरोधी समूह के रूप में हुआ। विश्वयुद्ध के बाद इस विरोध के बावजूद दादावादी कलाकारों ने अपने सृजन को जारी रखा।

कहते हैं कि प्रसिद्ध चित्रकार आंद्रे ब्रेतों को युद्ध के दौरान दवाओं और मनोचिकित्सा का प्रशिक्षण दिया गया था। तब ब्रेतों ने सिगमंड फ्रायड की मनोचिकित्सा पद्धति से विश्वयुद्ध के समय मानसिक आघात के शिकार सैनिकों का इलाज किया था। इन्हीं दिनों में ब्रेतों की भेंट युवा लेखक जैक्स वाच से हुई, जो अल्फ्रेड जेट्टी के पुत्र थे। उन्होंने लेखकों की समाज-विरोधी गतिविधियों को स्वीकार किया था। बाद में ब्रेतों ने लिखा था- ‘‘मैंने इस आंदोलन में रिम्बॉड, जेट्टी, नॉवेयू और लैटरमॉन्ट से प्रेरणा ली थी, पर जैक्स वाच से बहुत कुछ ग्रहण किया।’’ पेरिस लौटने के बाद ब्रेतों ने दादावाद की गतिविधियों मेंशामिल होकर लुईस अरागां और फिलीप साओ पॉल के साथ मिल कर साहित्यिक पत्रिका ‘लिट्ररेचर’ शुरू की। इसमें स्वत:स्फूर्त और सपनों से भरे लेखन को महत्त्व दिया गया। ब्रेतों और साओ पॉल ने 1920 में ‘द मैग्नेटिक फील्ड’ लिखा। इस स्वत: वाद का विश्वास था कि यह युक्ति सामाजिक परिवर्तन लाएगी। इन्होंने दादावाद की पारंपरिक पद्धति को भी तोड़ने की कोशिश की। बाद में इस विचार से अनेक कलाकार और लेखक जुड़े। तब इसका एक मुकम्मल दर्शन बना।
अतियथार्थवाद का विश्वास था कि परा-यथार्थ पहले के सभी निश्चित रूपों और पद्धतियों के नकार में है। इसमें जीवन की सभी समस्याओं के हल के स्रोत हैं, क्योंकि यह स्वप्न और अवचेतन के गहरे बोध से जन्मता है।

अतियथार्थवाद के घोषणा-पत्र में ब्रेतों ने यह स्पष्ट किया कि सृजन एक विशुद्ध, स्वयं संचालित एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्त भाव बिना आग्रह या दबाव के व्यक्त होना चाहिए। ब्रेतों का स्पष्ट कहना था कि यह भाव किसी भी नैतिक आग्रह, बाह्य नियंत्रण और सत्यासत्य के प्रतिमानों से मुक्त है। सिग्मंड फ्रायड के मनोदर्शन के बुनियादी तत्त्वों को शामिल कर अतियथार्थवाद की धारणाओं में इस बात पर बल दिया गया कि तर्कबुद्धि निरा भ्रम है और बौद्धिक क्रिया से ही मानव जीवन की समग्र अनुभूति का ज्ञान पाना संभव नहीं है। कल्पना, ज्ञान और सहज बुद्धि को महत्त्व देते हुए अतियथार्थवाद अवचेतन की क्रियाओं को प्रमुखता देता है और उससे प्राप्त विरोधी प्रेरणाओं को समन्वित करने और तर्क-बुद्धि के प्रतिपक्षी तत्त्वों- मृत्यु-जीवन, भूत-वर्तमान-भविष्य, यथार्थ-कल्पना आदि में एकात्मकता स्थापित करने पर बल देता है। इस वाद में स्वप्न, यौन आदि से संबंधित बिंबों का बहुत महत्त्व है। स्वप्न, मतिभ्रम जैसी अवस्थाएं भी इसका आसंग हैं।

दिलचस्प यह भी है कि इसमें परस्पर विरोधी और असंगत लगने वाली चीजें भी एकरूप हो जाती हैं और कुछ भी रहस्यमय, स्वप्नमय या भ्रमपूर्ण नहीं रहता; क्योंकि यह सब मनुष्य के अवचेतन के खंडित तत्त्वों को जोड़ने का कार्य करती है।निश्चित रूप से इस आंदोलन ने कला में क्रांतिकारी भूमिका निभाई, जिसमें अपने समय के प्राय: सभी बड़े कलाकारों ने काम किया। सल्वादोर डाली, पाब्लो पिकासो, अलबर्टो जिकोमेट्टी, जॉन मिरो, पॉल क्ली, रेने मेग्रिट्टी, मार्क्स अंर्स्ट, मार्शन डूसां और फ्रांसिस पिकाबिया जैसे कलाकारों ने अतियथार्थवाद को अपनी कृतियों के माध्यम से एक वैश्विक आंदोलन बना दिया। बाद के दिनों में कला के साथ-साथ साहित्य, संगीत, नाटक और सिनेमा पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इसको सर्जकों ने यथार्थ के अतिरेक को दिखाने का माध्यम माना। सिग्मंड फ्रायड के म

नोदर्शन ने भी इसकी वैचारिकता को पुष्ट किया, जिसमें अवचेतन और मनुष्य के अंतर-संसार सहित उसके स्वप्न को एक विचार और एक अर्थ के रूप में समझने का सिद्धांत है।
भारत में कई पीढ़ियों के कलाकारों में अतियथार्थवाद की प्रवृत्ति दिखती है और कई बड़े-छोटे कलाकारों ने इस पद्धति में महत्त्वपूर्ण काम किए हैं। गणेश पाईन, विकास भट्टाचार्य, बीरेश्वर भट्टाचार्य, सनत कर, जोगेन चौधरी, लालू प्रसाव साव, हकू शाह, परितोष सेन, शक्ति बर्मन, रतन परिमू जैसे वरिष्ठों के साथ बड़ी संख्या में नए कलाकारों ने अति यथार्थवाद में अपनी रचनाएं कीं और यथार्थ की अतिरेकी छवियों में अपने समय को व्यक्त किया। दूसरे कलारूपों- साहित्य और नाटक में भी अतियथार्थवाद की अभिव्यक्ति हुई। अकविता, अकहानी जैसे साहित्यिक आंदोलनों में भी यह पद्धति दिखी। भूखी पीढ़ी का काव्यांदोलन अपने समय के अतिरेकी यथार्थ का उद्घोष था। हिंदी कविता में आधुनिक कवि शमशेर में आधुनिक कवि शमशेर बहादुर सिंह ने अति यथार्थवादी प्रवृत्तियों पर भी बहुत सफल कविताएं लिखी थीं। चूंकि शमशेर चित्रकार भी थे, इसलिए प्रभाववाद और अति यथार्थवाद का असर उनकी कविताओं पर दिखता है।  भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’ और उनके नाटकों- ‘तांबे के कीड़े’ और ‘आदमखोर’ में अतियथार्थवादी तत्त्व हैं, तो रमेश बक्षी की रचनाओं में भई। हिंदी में आजादी के बाद आए अनेक आंदोलनों में अतियथार्थवाद का प्रभाव देखने में आया, पर चूंकि अधिकतर रचनाकारों में वह एक प्रचलन या शौक बन गया, इसलिए उनमें जुगुप्सा और नकारवादी भाव ही उभर पाया। जाहिर है, वे असफल सिद्ध हुए।

 

 

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