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साहित्य- साहित्य पर बाजार का साया

साहित्य का राज-सत्ता से रिश्ता चाहे जैसा रहा हो, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि बाजार के साथ उसका रिश्ता सदा विरोध का ही रहा है।

Author January 7, 2018 04:20 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

साहित्य का राज-सत्ता से रिश्ता चाहे जैसा रहा हो, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि बाजार के साथ उसका रिश्ता सदा विरोध का ही रहा है। सुदूर अतीत से लेकर वर्तमान समय तक सत्ता के साथ साहित्य का संबंध बनता-बिगड़ता रहा है। जितना श्रेष्ठ साहित्य सत्ता का प्रतिरोध करते हुए लिखा गया है उतना ही सत्ता के संरक्षण में भी रचा गया है। यानी, राजसत्ता विरोध श्रेष्ठ साहित्य की अनिवार्य शर्त नहीं है। साहित्य राजसत्ता की तुलना में सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता को अधिक चुनौती देता है। मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता से लड़ते हुए ही श्रेष्ठ साहित्य का मार्ग प्रशस्त होता है। यह अलग बात है कि कुछ लोग इस दोषपूर्ण समझ के शिकार हैं कि मनुष्य और मनुष्यता के पक्ष में रचा गया साहित्य अनिवार्यत: राजनीतिक होगा। ऐसे लोगों को अपने भक्ति साहित्य की तरफ देखना चाहिए, जो राजसत्ता से निरपेक्ष होकर भी समाज-संपृक्ति का अनुपम उदाहरण है। मानव मात्र की गरिमा को प्रतिष्ठित करने वाला वैसा साहित्य अब भी लिखा जाना शेष है। आज हर तरफ राजनीति का वर्चस्व है। हम चाहें न चाहें, राजनीति हमें प्रभावित करती ही है। हम राजनीति से निरपेक्ष हो सकते हैं, पर राजनीति हमसे निरपेक्ष नहीं हो सकती। राजनीतिक होना हमारा चयन नहीं, बाध्यता है। ऐसे दौर में भी साहित्य ने राजनीति के आगे समर्पण नहीं किया, चाहे वह जनता के पक्ष की ही राजनीति क्यों न हो! प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद साहित्य में वामपंथी और गैर-वामपंथी लेखकों के बीच एक विभाजक रेखा खींच दी गई। तबसे आज तक यह विभाजन थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ चला आ रहा है। साहित्य के गंभीर अध्येता से लेकर अदना-सा विद्यार्थी भी यह नहीं कह सकता कि मार्क्सवादी राजनीति की केंद्रीयता को अस्वीकार करने वाले गैर-वामपंथी लेखकों ने महत्त्वपूर्ण कृतियों का सृजन नहीं किया है।

प्रगतिशील आंदोलन के बाद दुनिया के स्तर पर भी इस सच को देखा जा सकता है कि राजनीति की केंद्रीयता को नकारने वाले लेखकों ने एक से बढ़ कर एक श्रेष्ठ साहित्य का सृजन किया है। व्यवस्था विरोध, सामंतवाद विरोध, साम्राज्यवाद विरोध आदि के साथ और बावजूद दोनों ही स्थितियों में कोई रचना श्रेष्ठ हो सकती है। श्रेष्ठ रचना चाहे कलावादी हो या यथार्थवादी, मार्क्सवादी हो या गांधीवादी, समाजवादी हो या दक्षिणपंथी, वह अनिवार्यतया बाजार और बाजारवादी मूल्यों का विरोध करती है। बाजार से प्रभावित और उसके द्वारा प्रेरित कोई भी साहित्य आज तक महत्त्वपूर्ण नहीं हो पाया है। साहित्य के भीतर चाहे कितने विभाजन हों, पर सभी पक्षों ने बाजार को एकमत से खारिज किया है। साहित्यकारों की एक लंबी परंपरा है, जिन्होंने गरीबी और जहालत का जीवन जीते हुए भी बाजार के अनुरूप साहित्य लिखने से इंकार कर दिया। यह अकारण नहीं है कि हिंदी का कोई भी साहित्यकार फिल्म उद्योग में नहीं टिक पाया। हिंदी साहित्य की आत्मा बाजार-विरोधी है। आज उसकी आत्मा पर ही संकट मंडरा रहा है। बाजार के साथ कदमताल करना एक तरह से हिंदी साहित्य की आत्मा को गिरवी रखना है।

हिंदी साहित्य में अब तक विचारधारा के आधार पर खेमे बने हुए थे। मार्क्सवादी और गैर-मार्क्सवादी के बीच विभाजन था। इसके कई दुष्परिणाम भी हुए। पर आज जिस तरह साहित्य के क्षेत्र में बाजार का हस्तक्षेप बढ़ रहा है, उससे तो लगता है कि वह विभाजन ठीक था। कम से कम साहित्य बचा हुआ था। उसके उद्देश्य को लेकर जरूर मतभेद थे। यथार्थवाद बनाम कलावाद या राजनीतिक प्रतिबद्धता बनाम साहित्यिक प्रतिबद्धता जैसी बहसें साहित्य के भीतर की बहसें थीं। ये अपने-अपने तरीके से साहित्य को और महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट बनाने की बहसें थीं। आज बाजार साहित्य को ही समाप्त करने पर तुला है। ऐसा नहीं कि बाजार ने एकाएक साहित्य को अपना शिकार बना लिया। बाजार पहले भी था और साहित्य की असल संवेदना को नष्ट करके उसे बाजारोनुकूल बनाने के प्रयास बहुत पहले से होते रहे हैं। पर सफलता अब मिलती दिख रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि पूर्ववर्ती पीढ़ी के लेखकों में एक जबर्दस्त बाजार-विरोधी चेतना थी। वे तमाम आपसी मतभेदों के बावजूद इस बात पर सहमत थे कि साहित्य को कारोबार का विषय नहीं बनने देना है। वे और समझौते कर सकते थे, पर साहित्य को बाजारू बनाना उन्हें स्वीकार नहीं था।

सन दो हजार के बाद हिंदी साहित्य में बाजार का निर्णायक असर दिखना शुरू हो गया। बाजार का प्रतिरोध करने की जगह लेखक उसके अनुकूल होने लगे। साहित्य की दुनिया में प्रवेश करने वाले ऐसे नए लेखकों की जमात बढ़ने लगी, जो अपनी रचनाओं से नहीं, बाजारवादी नुस्खों से सफलता हासिल करने लगे। उनके लिए साहित्य शौक का विषय हो गया। किसी भी तरह चर्चित होना उनका एकमात्र उद्देश्य हो गया। ऐसे माहौल में प्रतिबद्धता और सरोकार के साथ सफर शुरू करने वाले नए लेखक उपेक्षित होने लगे। रही-सही कसर प्रकाशन जगत ने पूरी कर दी। हिंदी के बड़े प्रकाशकों के यहां आई नई पीढ़ी ने साहित्य को विशुद्ध कारोबार का विषय बना दिया। साहित्य के नाम पर साहित्य विरोधी चीजों को परोसने का दौर चल निकला। साहित्य का दर्जा आज इतना गिर गया है कि साहित्यिक पुस्तकों के नाम इस तरह रखे जा रहे हैं, मानो वह साहित्य की किताब न होकर फुटपाथों पर बिकने वाला अश्लील साहित्य हो। किसी भी लेखक को ऐसे नामों को कतई स्वीकार नहीं करना चाहिए। ‘हसीनाबाद’, ‘बहत्तर धड़कनें तिहत्तर अरमान’, ‘देह ही देश’ जैसे नामों से क्या संकेत मिलता है? ये नाम हाल में आए उपन्यास, कहानी संग्रह और यात्रा-डायरी के हैं। वैसी विषय-वस्तु न होने के बावजूद वैसे नाम क्यों दिए जा रहे हैं? लेखक इतना मजबूर कैसे हो गया? क्या पुस्तक प्रकाशन में लेखक की कोई बात नहीं सुनी जा रही है या लेखक खुद साहित्य का दर्जा गिराने के खेल में शामिल हो गया है?

हिंदी साहित्य में जो यह नई प्रवृत्ति चल पड़ी है, उससे लगता है कि बाजार जल्दी ही साहित्य को उसकी मूल चेतना से काट कर उसे सिर्फ क्रय-विक्रय की वस्तु बना देगा। ऐसे में जरूरी है कि साहित्य के प्रति सरोकार रखने वाले सभी लोग साहित्य में घर जमा चुकी बाजारवादी प्रवृत्ति का एकजुट होकर विरोध करें। साहित्य के क्षेत्र में फिलहाल हर तरह का वैचारिक विभाजन व्यर्थ है। अभी बाजार से साहित्य को बचाने का लक्ष्य प्राथमिक होना चाहिए। राजनीतिक सत्ता से लड़ने के चक्कर में बाजार की अनदेखी करना आत्मघाती साबित हो रहा है। राजनीतिक सत्ता की तुलना में बाजार साहित्य के लिए अधिक खतरनाक है। सत्ता साहित्य के सिर्फ व्यवस्था-विरोधी स्वर को दमित करती है, पर बाजार साहित्य के अस्तित्व को ही मिटा देता है। सत्ता अधिकतम साहित्य के भाव पक्ष को नियंत्रित करती है, पर बाजार उसके भावपक्ष और कलापक्ष दोनों को नष्ट कर डालता है। सत्ता के साथ साहित्य फिर भी बचा रह सकता है, पर बाजार के साथ उसका बचा रहना असंभव है। भारत में लंबे समय तक साहित्य राजदरबारों के संरक्षण में ही फला-फूला है। आजादी के बाद सरकार द्वारा निर्मित संस्थाओं ने साहिय को प्रश्रय दिया है। सत्ता साहित्य का बहुत नुकसान नहीं कर सकती है। इसलिए आज साहित्य को सत्ता से नहीं, बाजार से अधिक खतरा है। साहित्य बचा रहेगा, तो सत्ता से कभी भी लड़ा जा सकता है। आज बाजार जिस रफ्तार से साहित्य को निगल रहा है, अगर हम अब भी नहीं चेते तो भविष्य में चेतने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं।

 

 

 

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