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भाषा पर प्रौद्योगिकी का दबाव

कहा जाता है कि जब कोई भाषा मरती है, तो उससे जुड़ी संस्कृति भी समाप्त हो जाती है। किसी भी भाषा के मरने की वजहों में सबसे प्रमुख कारण आर्थिक स्थितियों को माना जाता है।

प्रतीकात्मक चित्र।

भाषा का भविष्य और भविष्य की भाषा
भाषाएं मर रही हैं। इसे लेकर दुनिया भर में चिंता जताई जा रही है। कहा जाता है कि जब कोई भाषा मरती है, तो उससे जुड़ी संस्कृति भी समाप्त हो जाती है। किसी भी भाषा के मरने की वजहों में सबसे प्रमुख कारण आर्थिक स्थितियों को माना जाता है। आज जिस तेजी से अर्थव्यवस्थाएं बदल और विकसित हो रही हैं, उसके साथ संचार तकनीक भी कदमताल करती हुई आगे बढ़ रही है, उसमें भाषाओं का बहुत तेजी से संकुचन हो रहा है। ऐसे में तमाम देशों में अध्ययन हो रहे हैं कि भाषाओं का भविष्य क्या है और भविष्य में कौन-कौन-सी भाषाएं बची रह पाएंगी। इस बार की चर्चा भाषाओं पर गहराते संकट की वजहों और भाषाओं के भविष्य की पड़ताल पर। – संपादक

परिवर्तन शाश्वत है और अस्तित्व वैकल्पिक। आज के तेजी से बदलते विज्ञान और प्रौद्योगिकी नियंत्रित युग में जो चीजें मानव जीवन के लिए मूलभूत और अपरिहार्य थीं, वे पलक झपकते न केवल बदल, बल्कि गायब भी हो रहीं हैं और उनकी जगह नई चीजें ले रहीं हैं। भाषा उनमें से एक है।

लगभग पैंसठ हजार साल पहले स्वरों की सार्थक संकेत-व्यवस्था के रूप में भाषा का प्रयोग शुरू हुआ। इसके परिष्कृत रूप और प्रयोग के परिणामस्वरूप लगभग आठ हजार साल पहले भारत में सर्वप्रथम मानव कृति के रूप में ऋग्वेद रचा गया। पाणिनि ने पांचवीं सदी ईसा पूर्व में ‘अष्टाध्यायी’ के रूप में भाषा का सर्वाधिक सूक्ष्म, वैज्ञानिक और वैश्विक व्याकरण ग्रंथ दिया। भाषा-दर्शन की दृष्टि से सातवीं सदी के आसपास भर्तृहरि ने ‘वाक्यपदीय’ ग्रंथ के रूप मानवता को अप्रतिम भेंट दी।  इन सभी युगों में भाषा के रूप बदले। उसने आंगिक संकेत-भाषा (साइन लैंग्वेज) से मौखिक, फिर लिखित, मुद्रित और आजकल के कंप्यूटर युग में वर्चुअल रूप धारण किया। पिछले कुछ दशकों में भाषा के अस्तित्व को लेकर चिंता बढ़ी है। बीसवीं सदी के शुरू में विश्व में लगभग पंद्रह हजार भाषाएं थीं, जिनकी संख्या इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में घट कर लगभग सात हजार रह गई। अगर ऐसा ही चलता रहा तो इस सदी के अंत तक यह संख्या घट कर सात से आठ सौ के बीच रह जाएगी।  ईषाओं का लुप्त होना चिंता का विषय है, क्योंकि हर लुप्त होती भाषा के साथ संबंधित भाषाभाषी समुदाय का इतिहास, ज्ञान और संस्कृति सदा के लिए खो जाते हैं और पूरी मानव-सभ्यता खुद को खोकर दरिद्र हो जाती है। ऐसे में भाषा के भविष्य और भविष्य की भाषाओं को लेकर चिंता अस्वाभाविक नही है।

भाषा के भविष्य को प्रभावित करने वाले तत्त्वों में सबसे प्रमुख कारणों में जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, सैन्य-शक्ति, ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में सहभागिता शामिल हैं। जो देश या समाज इनमें आगे होंगे उन्हीं की भाषाएं टिकेंगीं। ‘पेपर लैंग्वेज’ पत्रिका के अनुसार बोलने बालों की संख्या के आधार पर विश्व की पहली पांच भाषाएं चीनी (1.2 अरब), स्पेनिश (32.9 करोड़), अंग्रेजी (13.8 करोड़), अरबी (22.9 करोड़) और हिंदी (18.2 करोड़) हैं। दूसरी ओर ‘एंग्को मॉडल’ के अनुसार सन 2050 तक चीनी, स्पेनिश, अंग्रेजी, हिंदी/ उर्दू, अरबी विश्व की पांच प्रमुख भाषाएं होंगी। शायद अंग्रेजीभाषी अमेरिका को यह जानकर आश्चर्य होगा कि आजकल स्कूल जाने वाली अमेरिकी पीढ़ी जब अपने करिअर की ऊंचाई पर होगी, तब स्पेनिश न केवल दुनिया बल्कि अमेरिका में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा बन चुकी होगी और इसलिए उसे स्पेनिश बोलनी पड़ेगी। हालांकि भाषा संबंधी अनुमानों में कोई एक मत नहीं है। ऐसे कई अनुमान सामने आए हैं। उनमें एक में कहा गया है कि अगर भविष्य में फ्रेंच बोलने बाले पश्चिमी अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है, तो दुनिया में फ्रेंच सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हो सकती है। उपयोगिता के हिसाब से ब्रिटिश काउंसिल ने 2013 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट ‘लैंग्वेज आॅफ द फ्यूचर’ में ब्रिटेन के लिए जरूरी भाषाओं में क्रमानुसार स्पेनिश, अरबी, फ्रेंच, मेंडेरिन चीनी, जर्मन, पुर्तगाली, इतालवी, रूसी, तुर्की और जापानी को माना है।

आने वाले समय में वही भाषाएं टिकेंगी, जिन्हें उनके प्रयोक्ताओं की कुशल जनसंख्या, ताकतवर सैन्य-बल, मजबूत अर्थव्यवस्था और ज्ञान-विज्ञान बुद्धि-बल का समर्थन होगा। अनुमान है कि 2050 तक चीन और भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में योगदान पचास प्रतिशत के आसपास होगा। जनसंख्या के कारण ये समाज बड़े बाजार की तरह उभरेंगे। इन देशों में व्यापार व्यवहार करने के लिए इनकी भाषाएं सीखनी पड़ेंगी। अर्थ के साथ शस्त्र और शास्त्र में योगदान के कारण इन देशों की भाषाओं का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा।  भविष्य की भाषाओं के स्वरूप निर्धारण में युवा पीढ़ी और बाजार की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। युवा पीढ़ी सरल, संक्षिप्त भाषा पसंद करेगी और शिष्ट, नियम-सम्मत भाषा-शुद्धि के ठेकेदारों और व्याकरण के संतरियों की नहीं चलेगी। इमोजी और एक्रोनिम्स का प्रयोग बढ़ेगा। साथ ही भाषा-प्रयोग में लिंग-तटस्थता बढ़ेगी।

ऐसे में भविष्य में भाषाओं की नियति के निर्धारण में प्रौद्योगिकी की भूमिका निर्णायक होगी। शायद नई भाषाएं सीखना इतिहास की वस्तु बन जाए। एक भाषा से दूसरी भाषा में तत्क्षण ‘रियल टाइम’ अनुवाद दुभाषियों और इंटरप्रेटर्स या आशु अनुवादकों को गैर-जरूरी बना देगा। दो भाषाओं में ‘रियल टाइम’ अनुवाद करने में सक्षम ‘डुओलिंगो’ जैसे एप्प की तरह कई ‘मल्टीलिंगो’ एप्प बन जाएंगे, जो एक भाषा से दूसरी भाषा में आवागमन को सुगम कर देंगे। अगर ऐसा हुआ तो खतरा यह है कि भाषाओं की सिमट रही दुनिया केवल आठ-दस भाषाओं के आसपास रह जाएगी। तब भाषिक विविधता की जगह प्रमुख भाषाओं के स्थानीय प्रकारों के समूह अस्तित्व में आएंगे।

संभव है भाव और विचार का संप्रेषण मन और मष्तिष्क में हो रहे वाइब्रेशन और सेंसेशन बोले बगैर संबंधित व्यक्ति, समुदायों द्वारा ग्रहण कर लिए जाएं और उसी रूप में प्रत्युत्तर भी जाए। चिप, एप्प या कान के पीछे चिपके बटन जैसे एंटेना से संकेतों का आदान-प्रदान होता रहे और भाषा के वैखरी रूप की जरूरत या प्रयोग न होने से उसका मौखिक भाषात्व गायब ही हो जाए। भारतीय मूल के वैज्ञानिक अमरीश मिश्र द्वारा बनाए ब्लिपर्स जैसे एप्प से (जो किसी भी सजीव या निर्जीव वस्तु को पहचान सकता है और उससे संबधी सभी सूचनाएं दे सकता है) और नई संभावनाएं पैदा होती हैं। संभव है कि चेहरा पढ़ने बाले एप्प के साथ मन या मष्तिष्क पढ़ सकने वाले एप्प और उसका उत्तर देने की क्षमता वाले एप्प भाषा के प्रयोग या ज्ञान की जरूरत को ही खारिज कर दें।

आजकल एक सवाल अक्सर उठाया जाता है कि क्या ‘इमोजी’ भविष्य भाषा है। इमोजी संप्रेषण की संकेत-व्यवस्था रूपी भाषा के इतिहास में एक नया चरण है। कई शब्दों की जगह केवल एक इमोजी का दृश्य संकेतक ज्यादा प्रभावी माध्यम है। सरल, संक्षिप्त और चित्तग्राही होने से नई पीढ़ी में यह प्रचलित है। इसका प्रचार-प्रसार और बढ़ेगा। पर इसकी सीमा है कि मानव मन की अनुभूतियों, भावों और विचारों की बारीकियों, व्यापकता और गहराई, कोमलता और सूक्ष्मता को व्यक्त करने में अभी यह सक्षम नहीं है। इसका जन-संप्रेषण में प्रयोग बढ़ेगा, पर यह ज्ञान और साहित्य की भाषा बन जाए, ऐसा शंकास्पद है। भविष्य में हिंदी या गुजराती जैसी भाषाओं का क्या होगा? हिंदी या गुजराती आदि भाषाओं को दूसरी भगिनी भाषाओं से डरने की जरूरत नहीं है। उन्हें जरूरत है अपने भाषी समुदाय को संभालने की।

हिंदी और गुजराती का भविष्य हिंदी-भाषियों और गुजरातियों के हाथ में है। पर इसके लिए उन्हें संप्रेषण की भाषा के साथ व्यापार की भाषा बनना पड़ेगा। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उन्हें ज्ञान की भाषा बनना होगा। मनुष्य भाषा का प्रयोग इतने लंबे समय से करता आ रहा है कि भाषा उसके शरीर की चमड़ी लगने लगी है। इसलिए काफी बड़ा वर्ग भाषा को नैसर्गिक मानता है, पर भाषा मूलत: मानव विकसित प्रौद्योगिकी है। शब्द अनादि और ब्रह्म है और संभावनाएं अनंत। फिर भी शब्द से बनी भाषा की अपनी सीमाएं उतनी ही ज्यादा हैं। मनुष्य की उत्सुकता, कल्पना और क्षमता उसके पास उपलब्ध शब्दों के भंडार से कहीं ज्यादा है। इसलिए भाषाओं के विकास और भविष्य के लिए प्रयास करने की जरूरत है, उन्हें लेकर हमेशा रोते रहने की नहीं।  भाषा का क्षेत्र एक वन-प्रदेश की तरह है, जिसमें भाषा रूपी पौधे उगते हैं, खिलते हैं और एक दिन पीले होकर सूख जाते हैं। उनकी जगह नए कल्ले निकलते हैं। यह क्रम जारी रहेगा। मानव इतिहास अनगिनत भाषाओं की कब्रगाह है और जन्मभूमि भी। प्रौद्योगकी ने भाषाओं के सामने चुनौतियां

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