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हिंदी में नाटक बनाम हिंदी के नाटक

‘हिंदी के नाटक’ न होने और ‘हिंदी में नाटक’ होने ने हिंदी रंगमंच, हिंदी भाषा और भारतीय रंगमंच पर अलग-अलग तरह से असर डाला है।

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यह मुद्दा शुरू से चर्चा में है कि हिंदी रगमंच पर अन्य भाषाओं से अनूदित और अन्य विधाओं से रूपांतरित मंचनों के मुकाबले हिंदी के मौलिक नाटक कम क्यों खेले जाते हैं? यह स्थिति सर्वमान्य है, क्योंकि कभी किसी ने इस तथ्य से इनकार तो क्या, इस पर शक तक नहीं किया। बहुतेरे नामचीन ‘हिंदी नाट्योत्सवों में मूल हिंदी का एक भी नाटक नहीं’, ने इसे प्रत्यक्ष प्रमाणित किया। किसी भी देश-काल के क्लासिक नाटकों को चुनौती की तरह मंच पर साधना हर कुशल निर्देशक की सहज कला-पिपासा होती है, लेकिन इसके बहाने सब का सब बाहरी ही खेला जाए, और हिंदी मंच पर हिंदी नाटक ‘नॉट प्लेइंग कैप्टन’ बन जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि हिंदी रंगकर्म को ‘हिंदी का रंगमंच’ क्यों कहा जाए? क्यों न इसे ‘हिंदी में रंगकर्म’ कहा जाए?

पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक में यह मुद्दा सीधे-सीधे ‘नाटककार बनाम नाट्य-निर्देशक’ ही रहा, जो आज तक चला आ रहा है, क्योंकि यही उसका मेरुदंड है। अलबत्ता बड़ा फर्क यह पड़ा है कि जहां तब लेखक-निर्देशक दोनों इस मुद्दे पर अपना मत रखते थे कि हिंदी के अधिकतर नाटक मंचेय क्यों नहीं होते और उनके न खेले जाने की क्या वजहें और मकसद हैं। ‘हिंदी के नाटक’ के बरक्स ‘हिंदी में नाटक’ के आधारभूत खुलासे के लिए कुछ प्रमुख लिखने-करने वालों की जानिब से ही बात शुरू की जाए।  बकौल प्रसिद्ध निर्देशक बंसी कौल- ‘निर्देशकों को हर बार एक ऐसे नाटक की तलाश होती है, जो सुगठित हो। जहां शायद ज्यादा काम न करना पड़े। हिंदी के आठ-दस (जाने-माने) निर्देशकों में से दो-तीन ही जोखिम उठाते हैं’। परिष्कृत ढंग से कही गई इसी बात को ‘दिल्ली ऊंचा सुनती है’ जैसे मकबूल नाटक की लेखिका कुसुमकुमार व्यंग्य की मार के साथ यों कहती हैं- ‘हमारे निर्देशक सोचते हैं, कहीं से लाओ एक सफल नाटक… हो सके, तो मराठी का। उसी में कुछ दम बचा है।’

अब लेखन की बावत, जो इस भवितव्य का शिकार भी है, कारण भी है और इसी की ‘आह’ और दावे से बात उभरी-बढ़ी। लेखक मणि मधुकर ने स्वीकार किया- ‘हम अच्छे नाटक नहीं लिखेंगे, तो निर्देशक कहां से करेगा?’ मृणाल पांडेय ने कारण दिया- ‘नाटककार ने शब्दों का विस्तार और भाषा का संस्कार दिया, लेकिन मंच की शारीरिक भंगिमाओं का महत्त्व प्राय: नहीं समझा।’ दरअसल, लेखक की तरफ से यह मामला महत्त्वाकांक्षा का है, कि हर बड़ा निर्देशक उसका नाटक खेले और लेखकीय स्वाभिमान (चूं-चूं का मुरब्बा) का है कि उसमें कुछ फेर-बदल न करे। और निर्देशक की जानिब से पसंद और पसंद के नाम पर सहूलियत (किए-कराए को करना) और सरनाम तथा सफलताकामी होने का है। इन वृत्तियों ने दोनों को समानांतर रेखा में सेट कर दिया, जिससे न लेखक मंचानुशासन को जानने के लिए निर्देशक के साथ आता, न निर्देशक ही किसी लेखन को मंचीय बनाने के लिए लेखक के साथ बैठ कर काम कर पाता। अपवादस्वरूप शंकर शेष, भीष्म साहनी, सुरेंद्र वर्मा और मोहन राकेश जैसे लोग अपनी-अपनी तरह मंच से रूबरू हुए, तो मिले-जुले रूप में ही सही, बेहतर परिणाम बने। लेखक सैकड़ों में हैं, तो निर्देशक दर्जनों में- और अच्छे और बड़े तो अंगुलियों पर गिने जाने जितने। दोनों को लेकर यह काम कार्यशालाओं के माध्यम से संस्थाएं कर सकती हैं। मराठी आदि में ऐसे काम होते रहे हैं, जिनके बहुत अच्छे परिणाम भी आए हैं। विजय तेंदुलकर ने कहा था- ‘जब तक नए नाटककारों के साथ परिश्रम और प्रयोग नहीं होगा, अच्छे नाटक नहीं मिलेंगे। लेकिन करोड़ों-लाखों के बजट वाली सराकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं हिंदी में ऐसा कभी नहीं करतीं हैं- यानी बहसें और आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं, काम नहीं।

‘हिंदी के नाटक’ न होने और ‘हिंदी में नाटक’ होने ने हिंदी रंगमंच, हिंदी भाषा और भारतीय रंगमंच पर अलग-अलग तरह से असर डाला है। विदेशी नाटक काफी खेले गए, जिसमें अनूदित का मामला इतना भर है कि हिंदी दर्शक उनके बारे में जान सका और रंगकर्मी को अपेक्षित लोभ-लाभ के साथ समुद्र-पार तक की लोकप्रियता मिली, पर न उसमें अपनी संस्कृति आई, न सरोकार। इसकी क्षतिपूर्ति करते हुए कालांतर में रूपांतरित करके अपने परिवेश दिए जाने लगे, पर लेखक का विदेशी नाम के अलावा भी चाहे ‘तुम्हारी अमृता’ हो या ‘तुम्हारी सोनिया’, ‘लवलेटर्स’ की परंपरा कभी भारतीय न बन सकी।  हिंदीतर भारतीय भाषाओं के नाटकों के मंचन का बड़ा फायदा यह हुआ कि ये नाटक और लेखक राष्ट्रीय हो गए। राष्ट्र को समृद्ध कर गर्इं ‘जस्मा ओडन’ जैसी विभिन्न प्रांतों की लोक-विरासतें। इससे हिंदी भाषा के राष्ट्रीय स्वरूप का भी विकास हुआ और भारतीय रंगमंच की एक छवि बनी, पर ‘हिंदी का रंगमंच’ लोकल भी न रह गया। राष्ट्रीयता के इस रोशन चिराग तले हिंदी नाटकों पर अंधेरा और गहरा गया, जो पूरे देश में उजागर हुआ। महाराष्ट्र में रहते मुझे व्यंग्य सुनने पड़े- हिंदी में दो ही नाटक लिखे गए क्या, ‘अंधायुग’ और ‘आधे अधूरे’?

हिंदी की नाट्येतर विधाओं के मंचन ने उपन्यास, संस्मरण और परसाई के व्यंग्यों आदि से रूपांतर-कला का एक नया क्षेत्र अवश्य खोला और ‘होरी’, ‘महाभोज’, ‘काशी का अस्सी’ और ‘निठल्ले की डायरी’ जैसे उल्लेखनीय काम सामने आए। लेकिन अपने में से ही उभरे इन विकल्पों ने मूल नाटकों के दरवाजे ज्यादा ही जोर से बंद किए, तो चोट महसूस भी ज्यादा हुई।
मूल नाटकों के सिर पर सर्वाधिक धमाल जिसने मचाई, उसके नियामक और कर्ता-धर्ता वही लोग बने, जो सारे कलारूपों के समाहार से सज्जित नाट्यकला के लिए जीने का प्रण लेकर और पब्लिक के पैसे से सीख कर आए। लेकिन उन्हें मीडिया ने अचानक इल्हाम कराया कि इस सीखे की सार्थकता पर्दे पर है, जो बड़ा कलारूप है। फिर वहां की अवांछित व्यस्तता में कामचलाऊपन पर कला का लेप लगाए तुम्माफेरी की तरह ईजाद ‘कहानी का रंगमंच’ सिर्फ और सिर्फ हिंदी में हुआ। फिल्म करते हुए श्रीराम लागू ने सप्ताह में एक दिन ही सही, मराठी का अच्छा नाटक किया। पर उनसे बड़े स्टार नसीर भाई हिंदी में कहानियां कर रहे हैं। इस प्रारूप ने हिंदी के मूल नाटकों की ही नहीं, पूर्ण नाटकों की भी हत्या की और उसी पर फल-फूल रहा है।

मराठी के सतीश आलेकर जैसों की तरह हिंदी में किसी लेखक ने रंगसमूह नहीं बनाया, पर हबीब साहब और सत्यदेव दुबे जैसे रंगसमूह वाले कुछ बड़े निर्देशकों ने अपने नाटक लिख डाले, जिसकी लियाकत इसी से सिद्ध होती है कि उन नाटकों को उनके अलावा किसी ने नहीं खेला। न प्रवृत्तियों ने ऐसा औरा भी रचा कि मणिपुर के रतन थियम संस्कृत का नाटक करें, तो वह मणिपुरी, लेकिन ‘माटी की गाड़ी’ हिंदी में ‘अनूदित’ नाम ही पाता है। अगर ‘कहानी का रंगमंच’ सरीखी उक्त नाट्येतर प्रवृत्तियों का मकड़जाल न फैलता, तो लोग मूल नाटक खोजते-करते। लेखक-निर्देशक की युति बनती। अन्य भाषाओं की तरह ‘हिंदी का रंगमंच’ भी होता, ‘हिंदी में रंगमंच’ का अयाचित तमगा न लगता।
क्या अब ऐसा कुछ संभाव्य है?

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