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समस्या इतिहासवाद से है

मार्क्सवादी आलोचना के रूप में जो ‘इतिहासवाद’ हिंदी साहित्य में आया, उसने न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण रचनाओं को देशनिकाला दे दिया।

Author October 23, 2016 3:08 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

साहित्य शून्य में पैदा नहीं होता। उसका अस्तित्व समाज के भीतर होता है। इसलिए साहित्य और समाज में अनिवार्यत: और स्वाभाविक संबंध होता है। हालांकि यह संबंध निश्चित नहीं होता, जो हर युग और दौर में एक ही तरह का हो। न तो साहित्य कोई स्थिर वस्तु है और न समाज। दोनों विकासशील हैं, इसलिए परिवर्तनशील भी। समाज की विकास प्रक्रिया और साहित्य की विकास प्रक्रिया में एक संबंध होता है। इस संबंध के दो परिणाम होते हैं- एक तो संपूर्णता में साहित्य और समाज का संबंध हर युग में बदलता रहता है और दूसरा, किसी खास साहित्यिक कृति का भी अपने समय के समाज से जो संबंध होता है वह बाद में बदल जाता है। बहुत संभव है कि कोई साहित्यिक कृति एक समय में बहुत महत्त्वपूर्ण हो, दूसरे समय में उसका महत्त्व बहुत कम हो जाए। इसका उल्टा भी संभव है कि एक समय में गौड़ माने जाने वाली साहित्यिक कृति दूसरे समय में महत्त्वपूर्ण हो जाए। वर्तमान समय में कबीर के साहित्य का केंद्र में आना और उसी अनुपात में तुलसी के साहित्य का विस्थापन किसी साहित्यिक कृति के समाज से बदलते संबंध का उदाहरण है।

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साहित्य और समाज के इस बदलते संबंध की पहचान-व्याख्या के लिए इतिहास दृष्टि या ऐतिहासिक चेतना का होना आवश्यक है। इतिहास की मदद के बिना साहित्य और समाज के बदलते संबंध हमारे लिए पहेली ही बन कर रह जाएंगे। महाभारत की शकुंतला और कालिदास की शकुंतला में अंतर क्यों है? वाल्मीकि की रामायण और तुलसीदास की रामायण में इतनी भिन्नता क्यों है? रामकथा की एकमात्र परंपरा के रूप में वैष्णव परंपरा ही कैसे स्थापित हो गई? इन प्रश्नों के उत्तर साहित्य के भीतर नहीं, बल्कि उसके बाहर इतिहास में है।  किसी भी साहित्यिक कृति के संदर्भ में बुनियादी तौर पर पर दो ही प्रश्नों के उत्तर खोजने होते हैं। एक, उसके वैशिष्ट्य से जुड़ा हुआ और दूसरा उसकी उत्पति से जुड़ा हुआ। एक का उत्तर साहित्य के भीतर मौजूद होता है और दूसरे का साहित्य के बाहर। उदाहरण के लिए ‘गोदान’ के संबंध में एक प्रश्न यह हो सकता है कि उस दौर और परिवेश के सभी उपन्यास ‘गोदान’ जैसे क्यों नहीं हैं, तो एक प्रश्न यह भी कि हिंदी में गोदान जैसा उपन्यास उसी युग में क्यों लिखा गया? स्पष्ट है, दूसरे प्रश्न का उत्तर उपन्यास से बाहर इतिहास में निहित है।

साहित्य के अनुशीलन के लिए इतिहास की समझ होनी चाहिए। पर, समस्या तब पैदा होती है जब इतिहास को एक खास अर्थ में अवमूल्यित कर दिया जाता है। समस्या इतिहास से नहीं, ‘इतिहासवाद’ से है। ‘इतिहासवाद’ का विरोध इतिहास का विरोध नहीं है। ‘इतिहासवाद’ का अभिप्राय उस विश्वास से है कि ऐतिहासिक परिवर्तन किन्हीं बंधे-बंधाए नियमों से संचालित है और उन नियमों का न सिर्फ पता लगाया जा सकता है, बल्कि उसके आधार पर निश्चित भविष्यवाणी भी की जा सकती है। हेगेल और मार्क्स का दर्शन ‘इतिहासवाद’ के अंतर्गत ही आता है। मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि ऐतिहासिक परिवर्तन का एक ही नियम है और वह निश्चित है इसलिए अपरिहार्य है। दास-प्रथा, सामंतवाद, पूंजीवाद, समाजवाद और उसके बाद साम्यवाद। सभ्यता के विकास के यही पांच चरण हैं और यह क्रम अटल है।

मार्क्सवादी आलोचना के रूप में जो ‘इतिहासवाद’ हिंदी साहित्य में आया, उसने न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण रचनाओं को देशनिकाला दे दिया। प्रगतिशील लेखक संघ के पहले घोषणा पत्र (1936) में आदिकाल से लेकर उस समय तक के समस्त साहित्य को निष्प्राण, निस्तेज और प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया गया। क्योंकि वह साहित्य इतिहास-विरोधी नहीं, बल्कि ‘इतिहासवाद’ के अनुकूल नहीं था। मुक्तिबोध द्वारा कामायनी को ध्वस्त करने के मूल में कामायनीकार द्वारा इस कृति में इतिहासवाद का खंडन ही था। अगर कोई रचनाकार लोकसंगीत, लोकपर्व, लोकपरंपरा, लोकजीवन, लोकसंस्कृति आदि के नष्ट होते जाने को मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त कर रहा है तो वह प्रगतिविरोधी यानी प्रतिक्रियावादी है, क्योंकि उसे समझना चाहिए कि साम्यवाद के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लोक का विनाश एक ऐतिहासिक अनिवार्यता है। किसान का बैल से चाहे जितना मार्मिक संबंध हो, उसका विदा होना आवश्यक है। रचनाकार अगर इस विदाई को अनिवार्यता के रूप में चित्रित नहीं करता तो वह निश्चय ही प्रगतिविरोधी होने का पाप कर रहा है।

मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि साहित्य के क्षेत्र में कई बार आतताई बन कर प्रकट हुई है। जैसे मार्क्सवाद से असहमत होना समाज-विरोधी होना नहीं है, वैसे ही मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि का विरोध करना इतिहास का विरोध करना नहीं है। साहित्य का इतिहास से रिश्ता होता है ‘इतिहासवाद’ से नहीं। इसी तरह, साहित्यकार में ऐतिहासिक चेतना होनी चाहिए पर, इतिहासवादी चेतना हो, यह आवश्यक नहीं। इतिहास की चेतना होने से साहित्य जितना उत्कृष्ट होता है, इतिहासवाद की चेतना होने से वह उतना ही निकृष्ट हो सकता है। साहित्य इतिहास को नहीं, इतिहासवाद के छद्म विज्ञान को नकार कर ही महत्त्वपूर्ण और महान बनता है।

‘इतिहासवाद’ के अंतर्गत मान्यता है कि एक समय में एक ही पक्ष (थीसिस) और एक ही प्रतिपक्ष (एंटी थीसिस) होता है। यानी, एक समय में एक ही मूल द्वंद्व होता है। पर नवइतिहासवाद ने इस धारणा का खंडन करते हुए यह मान्यता रखी है कि एक समय में एक से अधिक पक्ष और प्रतिपक्ष होते हैं। वर्चस्व और अधीनता का केवल एक ही रूप नहीं होता। इतिहास के किसी भी दौर में स्त्री के लिए पितृसत्ता, दलित के लिए सवर्ण और आदिवासी के लिए गैर-आदिवासी मुख्य वर्चस्वकारी शक्ति रहे हैं। एक तरह से, नवइतिहासवाद के गर्भ से ही विमर्शों का जन्म हुआ है। विमर्शों के संबंध में मार्क्सवादी दृष्टिकोण बहुत उत्साहजनक नहीं है। अधिकतर मार्क्सवादी आलोचकों ने अपनी क्षमता भर विमर्शों का विरोध ही किया है। क्या हम कह सकते हैं कि जो दलित, स्त्री और आदिवासी लेखन और चिंतन हो रहा है, उसमें इतिहास का विरोध है? दरअसल, वे इतिहास की अपनी व्याख्या कर रहे हैं, जो इतिहासवाद यानी मार्क्सवादी इतिहास दृष्टि से मेल नहीं खाता है। इतिहासवादी इतिहास दृष्टि से दलित, आदिवासी और स्त्री साहित्य स्वत: खारिज हो जाता है। इस संदर्भ से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि साहित्य के लिहाज से इतिहास और इतिहास दृष्टि दोनों आवश्यक हैं पर, इतिहासवादी इतिहास दृष्टि से अपरिचित रह कर भी श्रेष्ठ साहित्य का सृजन और आलोचना-कर्म संभव है।

 

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