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अच्छे नाटकों की कमी नहीं

मोहन राकेश के पहले नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का मंचन पहली बार 1962 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ही किया गया था।
Author नई दिल्ली | November 20, 2016 03:49 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

देवेंद्र राज अंकुर

जब मैं 1969 से 1972 तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में एक छात्र था, तब से लगातार पढ़ता और सुनता आ रहा हूं कि हिंदी में अच्छे नाटक नहीं लिखे जा रहे हैं, इसलिए दूसरी भारतीय और विदेशी भाषाओं के नाटकों के अनुवाद या रूपांतरण मंचित किए जा रहे हैं। अगर नाटक उपलब्ध नहीं हैं तो कहानियों और उपन्यासों के नाट्य रूपांतरणों का प्रदर्शन हो रहा है। यहां तक कि अब तो नाटकों के अभाव में कहानियों को रूपांतरित किए बिना, सीधे-सीधे उनके मौलिक रूप में ही मंच पर उतारा जाने लगा है। लेकिन अगर हम आजादी के बाद के लगभग सत्तर वर्ष से जुड़े तथ्यों के आलोक में विचार करें तो तस्वीर का दूसरा पहलू भी दिखाई देता है कि अगर इन वर्षों में अनुवादों-रूपांतरणों के समांतर मौलिक नाटकों की सूची तैयार की जाए तो मौलिक नाटकों का पलड़ा ही भारी रहेगा। फिर भी अगर प्रमाण के रूप में उदाहरण प्रस्तुत करने ही हों तो मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, सुरेंद्र वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, भीष्म साहनी, बलराज पंडित, शंकर शेष, रामेश्वर प्रेम, स्वदेश दीपक, असगर वजाहत, मीराकांत, शाहिद अनवर, मुद्रा राक्षस, बीएम शाह, रमेश बक्षी, शरद जोशी, मृणाल पांडे- ये कुछ नाम हैं, जिनके लगभग सभी नाटक इतने वर्षों में अलग-अलग नाट्य मंडलियों द्वारा खेले जाते रहे हैं।

इस सूची में मैंने जानबूझ कर हबीब तनवीर का नाम शामिल नहीं किया है, क्योंकि यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ी में लिखे हैं या कि हिंदी में। इस सूची में उन युवा लेखकों को भी शामिल नहीं किया गया है, जो इक्कीसवीं सदी में हमारे सामने उभर कर आए हैं। मसलन, आसिफ अली हैदर, अनुपम कुमार, रामजी बाली आदि।
मुझे लगता है कि नए नाटक न लिखे जाने की अवधारणा के पीछे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा मंचित नाटकों का इतिहास भी रहा है। हम प्राय: भूल जाते हैं कि एक विद्यालय और नाट्य मंडली में बहुत अंतर हुआ करता है। नाट्य मंडली से यह अपेक्षा की जाती है और की भी जानी चाहिए कि वह नए से नए नाट्यालेखों को मंचित करे, लेकिन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को लेकर ऐसी अपेक्षा करना गलत है। यहां प्रशिक्षण के तौर पर ग्रीक नाटक, शेक्सपियर के नाटक, मोलियर के नाटक, इब्सन के नाटक और ब्रेख्त के नाटक बार-बार किए जाएंगे, जैसे कि संस्कृत नाटक, लोक नाटक, पारसी नाटक और आधुनिक भारतीय नाटक बार-बार किए जाते हैं।

इसके बावजूद यह जानकारी देना जरूरी लगता है कि मोहन राकेश के पहले नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ का मंचन पहली बार 1962 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ही किया गया था। इसी क्रम में सुरेंद्र वर्मा के ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’, नंदकिशोर आचार्य का ‘जिल्ले सुब्हानी’, बलराज पंडित का ‘पांचवां सवार’, कृष्ण बलदेव वैद का ‘भूख आग है’, महेंद्र भल्ला का ‘दिल की बस्ती…’ और ‘ऐन उस चीज के आमने-सामने’ पहली बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा ही प्रस्तुत किए गए थे। मैंने अभी तक स्वयं को मात्र हिंदी नाटक और रंगमंच तक सीमित रखा है। अगर भारतीय नाटकों को भी इस चर्चा में शामिल कर लिया जाए तो गिरीश कर्नाड का सुप्रसिद्ध नाटक ‘तुगलक’ पहली बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ही 1966 में मंचित किया गया था। तब तक उसकी कन्नड़ में भी कोई प्रस्तुति नहीं हुई थी। आद्य रंगाचार्य का ‘सुनो जनमेजय’ हिंदी में पहली बार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने ही किया था। यही बात महेश एलकुंचवार के मराठी नाटक ‘बाड़ा चिरे बंदी’ के हिंदी अनुवाद ‘विरासत’ के बारे में भी कही जा सकती है।

ऐसा भी कहा जाता है कि हिंदी के ज्यादातर नाटककार दूरदर्शन और फिल्मों में चले गए। हिंदी अभिनेताओं के बारे में यह बात सौ फीसद सही हो सकती है, लेकिन नाटककार के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता। कुछ दिनों तक असग़र वजाहत अवश्य फिल्म और दूरदर्शन से जुड़े रहे, लेकिन उन्होंने नाटक लिखना कभी नहीं छोड़ा। इधर हाल में ही उनके आठ नाटकों का संग्रह आया है। क्या इसे अलग से रेखांकित करने की जरूरत है कि पिछले पच्चीस बरसों में सबसे ज्यादा बार मंचित नाटकों में ‘जिस लाहौर नहीं देख्या…’ का नाम भी लिया जाता है। अभी तक जिन नाटकों और नाटककारों का नाम लिया गया है, वे शायद हिंदी रंगमंच की मुख्य धारा के नाटककार हैं और उनके नाटकों के मंचन शायद महानगरों में ही होते रहे हैं, लेकिन एक बड़ी संख्या ऐसे नाटककारों की भी है, जिन्होंने छोटे-छोटे कस्बों और शहरों से अपनी शुरुआत की, लेकिन अपनी रचनाओं की गुणवत्ता के बल पर वे भी अखिल भारतीय स्तर पर पहचाने गए। रीवा के योगेश त्रिपाठी का नाटक ‘मुझे अमृता चाहिए’ विभु कुमार का नाटक ‘तालों में बंद प्रजातंत्र’ और राधेश्याम का नाटक ‘आदरणीय डैडी’ के नाम सहज ही याद आ जाते हैं।

शायद अच्छे नाटकों के अभाव की बात इसलिए भी की जाती है कि प्रकाशन न होने के कारण उनके बारे में हमें पता नहीं चल पाता। नए नाटककार के मन में यह दुविधा भी बनी रहती है कि कोई जाना-पहचाना निर्देशक उसके नाटकों को पढ़ेगा भी या नहीं? उन्हें मालूम होना चाहिए कि जब मोहन राकेश ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ लिखा था, तब उन्हें नाटककार के रूप में कोई नहीं जानता था। भीष्म साहनी ने इकसठ वर्ष की उम्र में ‘हानूश’ लिखा था और वह उनका पहला नाटक था। निर्देशक कोई भी हो- बिलकुल युवा या अनुभवी- उसे हमेशा एक ताजे और अच्छे आलेख की तलाश रहती है। ऐसा बहुत कम होता है कि वह नाटककार के नाम के आधार पर नाटक का चुनाव करता है। अंत में यही कहा जा सकता है कि फिल्म, दूरदर्शन के रहते लगातार नाटक भी मंचित होते रहते हैं तो यह निश्चित रूप से स्वीकार करना होगा कि अच्छे नाटक भी लिखे जा रहे हैं।

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