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तीरंदाज- घृणा के कारखाने

यह एक भयावह घटना है। अनजान निहत्थे लोगों को भीषण क्रूरता से निशाना बनाना किसी की भी समझ से बाहर है। पर ऐसा हुआ है और लगातार होता आ रहा है- इतिहास में इस तरह के जनसंहारों की लंबी फेहरिस्त है, जिसमें घृणा भाव ने सिर चढ़ कर अपने को अभिव्यक्त किया है।
Author October 8, 2017 04:32 am
अमेरिका के लास वेगास में संगीत कंसर्ट के दौरान हुई गोलीबारी।

हम एक-दूसरे से घृणा करते हैं। यह एक शाश्वत सच है। शाश्वत झूठ यह है कि हम एक-दूसरे के प्रति अमूमन सद्भाव रखते हैं और मानव प्रकृति प्रेम से परिपूर्ण है।  अमेरिका के लास वेगास शहर में हाल में हुई घटना शायद इसी सच की ओर इशारा करती है। वहां एक व्यक्ति ने दस सूटकेसों में बंदूकें भर के होटल का कमरा किराए पर लिया था। ठंडे दिमाग से सोची-समझी योजना के तहत उसने बंदूकों को इस तरह लगाया कि वह एक संगीत समारोह में आए हुए नितांत अनजान लोगों को निशाना बना सके। उसके बाद उसने बेवजह ताबड़ तोड़ फायरिंग की थी और लगभग छह सौ लोगों को गोली मार दी। इनमें से अट्ठावन की मौत हो गई थी और अनेक बुरी तरह जख्मी हो गए। यह एक भयावह घटना है। अनजान निहत्थे लोगों को भीषण क्रूरता से निशाना बनाना किसी की भी समझ से बाहर है। पर ऐसा हुआ है और लगातार होता आ रहा है- इतिहास में इस तरह के जनसंहारों की लंबी फेहरिस्त है, जिसमें घृणा भाव ने सिर चढ़ कर अपने को अभिव्यक्त किया है। कहने को तो कह सकते हैं कि ऐसी घटनाएं मानवता को शर्मसार करती हैं और यह कुछ विकृत दिमागों की कारस्तानी है, पर ऐसा है नहीं। लॉस वेगास के शूटर ने वह कर दिया, जो हम और आप अक्सर करना चाहते हैं। वास्तव में घृणा हर व्यक्ति की सामान्य मानसिक स्थिति है।  लोक संवाद में अक्सर कहा जाता है कि प्रेम, सद्भाव या फिर मानवतावाद हमारी प्राकृतिक अवस्था है, जबकि घृणा सिर्फ विशेष परिस्थियों में उत्पन्न होती है। मां का अपने बच्चो के लिए सवाभिक प्रेम इसका एक उदहारण है। पर क्या ममता प्रेम का पूर्ण पर्यायवाची है? माना ममता में प्रेम का बड़ा अंश होता है, पर वह प्रेम अपना हाड़-मांस होने की वजह से होता है।

अपना हाड़-मांस होना यहां पर जरूरी वजह है। हम अपने से घृणा नहीं करते हैं और क्योंकि ऐसा नहीं है, तो प्रेम करते हैं। दूसरे शब्दों में, घृणा की गैरहाजिरी प्रेम का द्योतक है और चूंकि हम अपने से प्रेम करते हैं, इसीलिए अपना सुख, अपना मतलब, अपना ऐश्वर्य और अपनी जान से ज्यादा हमें और कोई चीज नहीं सुहाती है। पहले हम हैं, बाकी सब बाद में हैं- हर रिश्ता बाद में है और वह भी तब, जब हम अपने जीवन को आखिरी घंूट तक नहीं भोग लेते हैं। स्वहित सर्वोपरि है और उसकी व्यक्तिगत कामनाएं असीमित हैं। इनकी तृप्ति असंभव है। मानव स्वभाव के विपरीत भी है। ऐसे में निर्मल अथाह प्रेम या व्यापक मानवतावाद की कोई गुंजाइश नहीं है। फिर भी हम सर्व-प्रेम को ही भजते हैं। दलील यह दी जाती है कि प्रेम भाव सकारात्मक है, जबकि घृणा नकारात्मक भाव है। प्रेम से हमें जुड़ना चाहिए। नकारात्मकता को नकारना चाहिए। तमाम पीर पैगंबर, ऋषि-मुनि या फिर महात्मा सदियों से प्यार का पैगाम लेकर अवतरित होते रहे हैं। कितने ही धर्मग्रंथों का प्रचार-प्रसार हुआ है और न जाने कितनी लीलाएं रची गई हैं, जिनमें मानवता को प्यार-मोहब्बत की सीख दी गई है। पर विडंबना यह है कि सबको ‘प्रेम’ के प्रसार के लिए घृणा फैलानी पड़ी है। असंख्य युद्ध हुए हैं और जन मानस को प्रेम समझाने के लिए बेहयाई से जुल्म ढाए गए हैं। यह कहा जा सकता है कि घृणा ही वास्तव में परोसी गई है, क्योंकि घृणा हमारे जीवन की ठोस वास्तविकता है, हमारी अंत:प्रेरणा है, जो व्यक्तियों और उनके समूहों को तुरंत जोड़ने का सामर्थ्य रखती है।
वैसे अगर देखा जाए तो आपसी प्रेम एक कल्पना मात्र है। अगर वास्तविकता होती तो यह लोगों को स्थायी स्तर पर जोड़ने में सफल रही होती। पर इतिहास में कोई भी प्रकरण ऐसा नहीं है, जिसमें प्रेम और मानवतावाद की बुनियाद पर स्थिर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक या फिर धार्मिक व्यवस्था कायम की गई हो। इसके विपरीत घृणा के आधार पर, जिसमें जान, माल और मान के मसले अमान्य रहे हैं, कई व्यवस्थाए लंबे समय तक पनपी हैं। इनमें सबसे भयावह धार्मिक व्यवस्थाएं रही हैं, जिन्होंने सर्व-प्रेम के आसमानी महल बांधे हैं और फिर उनमें ऐसे तानाशाह बैठा दिए हैं, जो इंसान की हर क्रिया का मूल्यांकन पूरी बेरहमी से करते हैं।

ऐसी स्थिति में सर्व-प्रेम भाव का कोई औचित्य नहीं है, पर फिर भी इस पर चर्चा केंद्रित रहती है, क्योंकि हम घृणा से ध्यान भटकाना चाहते हैं। यह हमारा हथियार है, जिसको हम छिपा कर रखते हैं। ठीक वैसे ही जैसे की लॉस वेगास का शूटर अपने हथियार सूटकेसों में छिपा कर ले गया था और फिर अपने अंधेरे बंद कमरे से उसने निरीह लोगों पर वार किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि घृणा हमारी मानसिकता की वास्तविकता है, जबकि प्रेम भाव वह कल्पना है, जिससे हम अपने कड़वे सच को निगलने से बचते रहते हैं। घृणा हमारी सामान्य स्थिति है। इसकी प्रक्रिया सहज है। हमको जल्दी समझ में आ जाता है कि हम दूसरे से नफरत क्यों करें और हमारी नफरत क्यों वाजिब है। घृणा स्वहित की प्राकृतिक उपज भी है। जैसे ही स्वहित को कोई काल्पनिक या वास्तविक खतरा महसूस होता है, वह उससे बचने के लिए घृणा की उत्पत्ति करता है। निज स्वार्थ हो, समूह संस्कृति हो, आर्थिक मसले हों या फिर अथाह ईश्वरीय आनंद की लोलुपता, घृणा सभी स्थितियों में कारगर हथियार है।वास्तव में हमें अब सर्व-प्रेम की डगर से हट कर सर्व-घृणा की राह का अन्वेषण करना चाहिए। यह खोज आज निहायत जरूरी हो गई है, क्योंकि दूसरा विकल्प एक छल साबित हुआ है। इसके मोहपाश ने हमें बेचारेपन तक ला दिया है। इस तथ्य को स्वीकार करना मुश्किल जरूर है, शायद असंभव भी है, क्योंकि बहुत लोगों की इसमें आस्था है और आस्था अमूमन तथ्यों से परे होती है, पर हमें असंभव को संभव करना ही होगा।

हमें स्वीकार करना होगा कि घृणा हमारी प्रकृति विशेषता है और ऐसे में इसका जड़मूल से विनाश नहीं हो सकता है। इसको मैनेज भर किया जा सकता है। ऐसे में हमें घृणा प्रबंधन के तरीकों पर विचार करना होगा। हमें उन सब परिस्थितियों का बारीकी से अध्ययन करना होगा, जिनसे निज और समूह स्वार्थ आंदोलित होते हैं और फिर आपसी घृणा में परिवर्तित हो जाते हैं। इसमें सर्वप्रथम धर्म की जांच जरूरी है, क्योंकि धर्म की आंच में सभी सिंक रहे हैं। घृणा पैदा करने का यह सबसे बड़ा कल-कारखाना है, जिसकी कार्य विधि मानव प्रकृति के भेद्य कच्चे माल पर चलती है। दूसरा बड़ा कारण आर्थिक है। आर्थिक विषमताएं आपसी द्वेष पैदा करती हैं। इनसे हमको प्रभावी तरीके से निपटना होगा। दोनों ही कारण बहुत विषम हैं और उनका उपाय मार्क्सवाद लेकर आया भी था, पर उसका प्रतिफल संतोषजनक नहीं रहा है। हमें अब और कारगर सैद्धांतिक और व्यावहारिक उपाय तलाशने होंगे, जिनमें पहले की तरह आपसी प्रेम-प्रवचन घृणा का विकल्प न हो, बल्कि जिनसे घृणा के मूल कारणों का उचित और वास्तविक प्रबंधन हो सके।

 

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