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समाज- हर जगह होकर भी

रचनाकार अपने नजरिए से घटना को देखता और प्रस्तुत करता है। उसी घटना को कोई अन्य प्रत्यक्षदर्शी प्रस्तुत करेगा तो वह पहले वाली प्रस्तुति से अलग होगी।
Author January 21, 2018 04:54 am
प्रतीकात्मक चित्र।

गंगा सहाय मीणा

तमाम रचनाकार लेखन में अपने अनुभवों का कच्चे माल की तरह उपयोग करते हैं। उन्हीं को पुनर्सृजित कर विभिन्न विधाओं में अभिव्यक्त करते हैं। जाहिर है, साहित्य की रचना प्रक्रिया से गुजरने के बाद अनुभव या घटनाएं वही नहीं रहतीं, जिस रूप में वे घटी होती हैं। घटनाओं के चयन, व्याख्या और पुनर्प्रस्तुति से लेकर भाषा और विधा विशेष में बांधने तक में रचनाकार की विश्वदृष्टि और कल्पना अपनी भूमिका निभाती है और रचनाकार विशेष के व्यक्तिगत या साझे अनुभव एकदम नए रूप में पाठकों के सामने होते हैं। इसके बावजूद साहित्य में कुछ ऐसी विधाएं भी हैं, जिनकी एक प्रमुख प्रवृत्ति घटनाओं को हूबहू प्रस्तुत करना है, इनमें आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण आदि प्रमुख हैं। पाश्चात्य जगत में पहले संस्मरण को आत्मकथा और जीवनी का ही एक अंग माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे इसने अपनी स्वतंत्र जगह बनाई है।संस्मरण यानी स्मृतियों का समुच्चय। किसी व्यक्ति या घटना को याद करना। स्मृतियों का समुच्चय तो आत्मकथा और जीवनी में भी होता है, लेकिन कहा जा सकता है कि संस्मरण विशिष्ट स्मृतियों का समुच्चय है। आत्मकथा और जीवनी में किसी व्यक्ति का संपूर्ण जीवन या जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा होता है, जबकि संस्मरण उसके जीवन की किसी या किन्हीं खास स्मृतियों के बारे में होता है। रचनाकार अपने नजरिए से घटना को देखता और प्रस्तुत करता है। उसी घटना को कोई अन्य प्रत्यक्षदर्शी प्रस्तुत करेगा तो वह पहले वाली प्रस्तुति से अलग होगी। यही बात किसी व्यक्ति पर केंद्रित संस्मरण के बारे में कही जा सकती है। संस्मरण व्यक्ति पर केंद्रित हो या घटना पर, उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु रचनाकार का उस घटना या व्यक्ति से निकट संबंध होना होता है।

हृदय और मस्तिष्क के आपसी संतुलन के साथ स्वतंत्र विचरण के संदर्भ में संस्मरण निंबंध के भी करीब है। संस्मरण और रिपोर्ताज भी एक-दूसरे में कई स्तरों पर गुंथी हुई विधाएं हैं। रिपोर्ताज को एक साहित्यकार का रिपोर्ट लेखन या एक पत्रकार की साहित्यिक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। यानी इसमें समाज को प्रभावित करने वाली कोई घटना होना अनिवार्य है। रिपोर्ताज है तो रिपोर्ट, पर वहां तथ्यों से ज्यादा उनकी प्रस्तुति महत्त्वपूर्ण होती है। लेखक का दृष्टि-बिंदु महत्त्वपूर्ण होता है। मसलन, फणीश्वरनाथ रेणु का ‘ऋणजल-धनजल’ बिहार की बाढ़ और अकाल की रिपोर्ट होने के बावजूद लेखकीय दृष्टिबिंदु और संवेदनशील प्रस्तुति के कारण अखबारी रिपोर्ट से एकदम अलग है। यह यात्रा संस्मरण से भी अलग है। लेखक ने अकाल प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा जरूर की, लेकिन उसके लिए प्रस्तुति के वक्त वह यात्रा महत्त्वपूर्ण नहीं है, अकाल से प्रभावित लोगों की मार्मिक प्रस्तुति और लेखकीय जिम्मेदारी का निर्वहन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, जिसके तहत वह विभिन्न कोणों से अकाल और बाढ़ की विभीषिकाओं को दिखा पाने में सफल रहा। एक अखबारी रिपोर्ट अकाल और बाढ़ से जुड़े तथ्यों पर केंद्रित रहती, एक संस्मरण इन घटनाओं से जुड़ी लेखक के व्यक्तिगत स्मृतियों पर ध्यान केंद्रित करता, जबकि रिपोर्ताज इससे आगे बढ़ कर पूरी घटना के कार्य-कारण संबंधों की पड़ताल तक जाता है और पाठक को ये प्राकृतिक आपदाएं मनुष्य-जनित आपदाएं अधिक लगने लगती हैं।

संस्मरण हमेशा आत्मकथात्मक शैली में लिखा जाता है। रचनाकार जगहों और व्यक्तियों के नामों को यथावत बनाए रखते हुए परोक्ष तौर पर घटनाओं की सत्यता और प्रामाणिकता का दावा करता है। इसके बावजूद संस्मरण में विचार और कल्पना के लिए जगह होती है। घटनाओं के पुनर्सृजन के वक्त रचनाकार अपने भावों और विचारों से संस्मरण को मुक्त नहीं रख पाता, बल्कि वह अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने के लिए स्मृति विशेष, अनुभव विशेष का सहारा लेता है। साहित्यिक संस्मरण में घटना गौण हो जाती है, रचनाकार की अनुभूति और विश्लेषण महत्त्वपूर्ण हो जाता है।साहित्य की दुनिया में संस्मरण जीवित महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ के अनुभवों और मृत निकट परिचितों और खास व्यक्तित्वों को याद करते हुए भी लिखे जाते हैं। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा के संस्मरणों को याद किया जा सकता है, जो अपनी संवेदनशील प्रस्तुति और रचनात्मकता के कारण हिंदी साहित्य में काफी लोकप्रिय हैं। जीवित महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के साथ के अनुभवों को साझा करने का उद्देश्य उनके व्यक्तित्व के किन्हीं दिलचस्प पहलुओं से परिचित कराना होता है। इसमें भी रचनाकार आत्म को केंद्र में रखता है। वह बता सामने वाले के बारे में रहा होता है, लेकिन इस बात को ध्यान में रखता है कि सामने वाले के फलां व्यवहार, फलां आदत से मुझे कैसा लगा, मेरे ऊपर क्या प्रभाव पड़ा!

कई बार संस्मरण और रेखाचित्र को एक मान लिया जाता है। दोनों एक-दूसरे के काफी करीब अवश्य हैं, लेकिन साथ ही स्वतंत्र विधाएं भी हैं। रेखाचित्र में किसी व्यक्ति या वस्तु का रेखांकन किया जाता है। रामचंद्र तिवारी ने ठीक ही कहा है कि ‘जिस प्रकार कुछ थोड़ी-सी रेखाओं को प्रयोग करके रेखाचित्रकार किसी व्यक्ति या वस्तु की मूलभूत विशेषता को उभार देता है, उसी प्रकार कुछ थोड़े से शब्दों का प्रयोग करके साहित्यकार किसी व्यक्ति या वस्तु को उसकी मूलभूत विशेषता के साथ सजीव कर देता है।’ संस्मरण और रेखाचित्र की निकटता के कारण सामान्यत: दोनों की चर्चा एक साथ होती है।  यों संस्मरण के मूल में स्मृतियों के बहाने अतीत के चित्र होते हैं, लेकिन रचनाकार के व्यक्तित्व की छाप इन्हें वर्तमान और भविष्य से जोड़े रखती है।  संस्मरण और कहानी में भी काफी दिलचस्प रिश्ता है। अनुभव को संस्मरण बनाना तुलनात्मक रूप में आसान है। इसमें ज्यादा बदलाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। अनुभव को कहानी में तब्दील करना पूरी रचना-प्रक्रिया से गुजरना है। अनुभव को कहानी बनाते वक्त रचनाकार केवल स्थान और व्यक्तियों के नाम नहीं बदलता, वह उसमें जीवन-दर्शन भी भरता है और इस प्रक्रिया में कई बार पूरी घटना एकदम बदल जाती है। कहानी में रचनाकार आत्मानुभूति को धीरे-धीरे आत्म से मुक्त करने की कोशिश करता है। कई बार रचनाकार ऐसे अनुभवों से गुजरता है जिन पर कहानी लिखना बहुत कठिन होता है, लेकिन उसे वे अनुभव महत्त्वपूर्ण और साझा करने योग्य लगते हैं, तो वह उन अनुभवों को संस्मरण की शक्ल में अभिव्यक्त करता है। अल्पज्ञात लेकिन रोचक व्यक्ति या परिवेश के बारे में संस्मरण तो लिखा जा सकता है, कहानी नहीं। मसलन, उत्तर भारत का कोई रचनाकार आदिवासी दुनिया से अपने सीमित संपर्क के बारे में रोचक संस्मरण तो लिख सकता है, लेकिन आदिवासी दुनिया के मन से सीमित परिचय या अपरिचय के कारण अच्छी कहानी नहीं लिख सकता। यानी संस्मरण भले किसी घटना पर केंद्रित हो, भले उसमें लोगों की उपस्थिति हो, वह होता लेखक की आत्माभिव्यक्ति ही है, जिसका लक्ष्य उसकी अनुभूति को साझा करना है

आत्माभिव्यक्तिपरक कथेतर गद्य होने की वजह से संस्मण में लेखकीय ईमानदारी एक अहम सवाल है। यह इसलिए भी विचारणीय है कि संस्मरणों को इतिहास लेखन का प्रामाणिक स्रोत मानने की वकालत की जाती रही है। चूंकि संस्मरण एक साहित्यिक विधा है, इसलिए सत्य घटना पर आधारित होने के बावजूद सामान्यतया पाठक उसकी सत्यता की पड़ताल करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाते। हां, कई बार अलग-अलग लेखकों के संस्मरणों में जब एक ही व्यक्ति या घटना की भिन्न छवियां बनने लगती हैं तो जरूर पाठक की रुचि घटना की सत्यता की पड़ताल की ओर जाती है। मगर तब भी वह व्यक्ति या घटना की भौतिक पड़ताल के बजाय अपने आलोचनात्मक विवेक से उसकी भिन्न अभिव्यक्तियों में ही सत्यता की खोज करता है। कहना न होगा कि हर मायने में संस्मरण लेखक की ईमानदारी बहुत जरूरी है।

 

 

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