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तीरंदाज- वास्तविकता पर आभासी की बढ़त

अन्य पुराने कालों की तरह यह नवजात काल भी नई चुनौतियां हमारे सामने पेश कर रहा है, पर बीते कालों से कहीं ज्यादा तेज और प्रभावशाली तरीके से इस काल की हमारी सामाजिक संरचना बदलने की कुव्वत है।

प्रतीकात्मक तस्वीर। (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

आगुमेंटेड रियलिटी या संवर्धित वास्तविकता का दौर शुरू हो चुका है। अभी शैशव अवस्था में है, पर उसका संज्ञान लेना जरूरी हो गया है। कहा जाता है- पूत के पांव पालने में ही पहचान लेना अच्छा होता है, ताकि उसके लानन-पालन के लिए आवश्यक व्यवस्था की जा सके। साथ में वे हदें भी तैयार हो सकें जिसमें उसका समुचित विकास हो पाए। अन्य पुराने कालों की तरह यह नवजात काल भी नई चुनौतियां हमारे सामने पेश कर रहा है, पर बीते कालों से कहीं ज्यादा तेज और प्रभावशाली तरीके से इस काल की हमारी सामाजिक संरचना बदलने की कुव्वत है। साझेदारी तो अनजाने में इससे हो गई है, पर इस दौर का मूल्यांकन बेहद सावधानी और समझदारी से करके ही इसे पल्लवित और पुष्पित करना है। संवर्धित वास्तविकता का एक उदाहरण हमनवा किताब है। अभी हाल में किताब के कुछ अंश एक विशेष आयोजन में पढ़े गए थे। हमनवा पहला दस्तावेज है, जो संवर्धित वास्तविकता की सच्चाई को जिल्दबंद करता है। यह किताब दो अनजान लोगों के बीच फेसबुक पर हुई लगभग सवा साल लंबी बातचीत को संकलित कर के बनी है। बातचीत के एक सिरे पर साठ साल के वरिष्ठ अखबारनवीस राजीव मित्तल हैं, तो दूसरे पर मार्केटिंग प्रोफेशनल तीस साल की अनुपमा वर्मा। दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे, पर राजीव की सआदत हसन मंटो की कहानी पर की गई टिप्पणी पर अनुपमा ने अपनी राय जब जाहिर की तो दोनों के बीच संवाद शुरू हो गया।

हमनवा अनोखा बहीखाता है, फेसबुक अकाउंट पर अपनी ही तरह का खेल खेलने वाले दो फेसबुकियों का, जिनका परिवेश, शिक्षा, दिलचस्पी, और महत्त्वाकांक्षा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी, मगर दोनों की फेसबुकिया आभासी अकड़ दर्शनीय थी। दोनों ही अलग अलग वक्त में, अलग-अलग परिस्थित से गुजरे थे और एक-दूसरे को समझने के लिए उन्होंने अपने आंखें चुंधिया देने वाले सच पोस्ट किए थे। बेहद ईमानदारी और हिम्मत के साथ दोनों ने अपने जीवन में आए दबे-ढंके, गुनाह सरीखे किरदारों और घटनाओं का जिक्र किया है। एक तरह से यह किताब उनके जीवन की महरूमियों और ख्वाहिशों का कच्चा चिट्ठा कही जा सकती है, जो प्राइवेट और पर्सनल होने के बावजूद यूनिवर्सल है। सोशल मीडिया पर जन्मा दो इंसानों का आभासी रिश्ता संवर्धित वास्तिविकता में इस तरह से फला-फूला कि अपने बरगद तुल्य घनत्व से उसने दो वास्तविक जिंदगियों और उनके आसपास के पूरे माहौल को अपने प्रभाव में ले लिया।

हमनवा एक तरह से प्रेम कथा है- एक अनाम रिश्ता, जो आभासी तौर से शुरू होकर वास्तविक और रूहानी क्लाइमेक्स पर पहुंचता है। उसकी व्यापक दशा को हमेशा-हमेशा के लिए दस्तावेज बना कर लेखकों ने उस साहित्य को साकार कर दिया है, जो कहीं से परोक्ष, धुंधला या अस्पष्ट नहीं है।
हमनवा आगुमेंटेड रियलिटी या संवर्धित वास्तविकता को बेहद कलात्मक तरीके से जिल्दबंद करती है। अभी तक हमारे पास सोशल मीडिया की आभासी दुनिया थी, जिसमें हम सब इस पर अपने-अपने तरीके से खेला करते थे। प्रतीति छल की दुनिया को बहुत हद तक हम फेसबुक या ट्विटर पर साकार कर चुके हैं। लाइक या फिर कमेंट पाने की लालसा इस बात से प्रेरित है कि हमने जो भी पोस्ट किया है, उससे हमारी छवि में क्या निखार आ रहा है। दूसरे शब्दों में, यह अपनी वास्तविकता को लांघ कर स्वरचित कल्पना को आभासी जामा पहनाने की कोशिश है- अहंभाव का कभी शर्मीला-सा तो कभी निर्लज्ज प्रदर्शन है। फेसबुक फे्रंड्स बनाना और फिर उनको प्रभाव में लेने की कोशिश इस भाव की क्रिया है।

पर अब बात इससे आगे बढ़ गई है। अपनी धूल-मिट्टी से सनी सांस लेती रोजमर्रा की वास्तविकता को हम आभासी मखमली अनुभव से जोड़ कर चांद के उस पार ले जा रहे हैं, जहां पर कृष्ण और शुक्ल पक्ष का अस्पष्ट-सा विलय है। यानी हम टू डायमेंशन (द्विविमीय) को पीछे छोड़ कर तीसरे डायमेंशन में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें आभासी साधनों के जरिए अपने जीए हुए अनुभवों को खींच कर एक-दूसरे के सामने उघाड़ देते है। होंगे की सच्चाई या असच्चाई के मूल तक जाकर उसको संवर्धित करते हैं। रियलिटी, वर्चुअल रियलिटी और आगुमेंटेड रियलिटी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की निर्बाध प्रक्रिया नए रिश्तों, क्रियाकलापों और मानसिकता से जोड़ रही है। एहसास और गहरे पैठ रहे हैं, अंतरंगता जिस्मानी नजदीकियों की मोहताज नहीं है और वैध-अवैध जैसे लेबल बेमानी हो गए हंै। हमें बस संवर्धन चाहिए, जिससे हर दबी हुई सिसकी या हल्की-सी हंसी को भरपूर प्रतिध्वनि मिल सके। हमनवा किताब दो व्यक्तियों का आत्मिक दस्तावेज है, पर कहीं न कहीं थोडा-बहुत हम सब भी ऐसे ही अनुभवों से गुजर रहे हैं। व्यक्तिगत संवर्धित वास्तविकता से ज्यादा सामुदायिक संवर्धित वास्तविकता प्रचलित होती जा रही है, विशेषकर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में। इसके जरिए मैसेजिंग ऐसे की जा रही है, जिससे असत्य अनुभव भी सत्य प्रतीत होने लगे या फिर किसी अनुभव को खंड-खंड कर उसके एक खंड का संवर्धन ऐसा किया जा रहा है, जिससे अखंडता का आभास हो जाए।
फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि आभासी साधन हों या फिर नेताओं के भाषण, सब ऐसी आगुमेंटेड रियलिटी के जरिए सच का झूठ और झूठ का सच अपने-अपने तरीके से उघाड़ने में प्रयोग कर रहे हैं।

वैसे समाज और व्यक्ति विशेष दोनों के लिए अभिव्यक्ति जरूरी है और उन्हें हर वह संसाधन उपलब्ध होने चाहिए, जिससे बात कही जा सके, सुनी जा सके, मर्म का सच आपस में बांटा जा सके। पर यह कितना परिवर्धित हो या इसकी प्रतिध्वनि का कितना समूहीकरण हो जैसे मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। फेक न्यूज से फेक लाइफ, फेक ट्रुथ और फेक एक्सपीरियंस तक का सफर अब दो कदम भर का रह गया है। वास्तविक जिंदगी बड़ी तेजी से जाली जिंदगी में परिवर्तित हो रही है और समाज वास्तविक से ज्यादा आभासी वातावरण में सांस ले रहा है, जिसका धरातल काल्पनिक है। ऐसी स्थिति समाज और व्यक्ति दोनों के लिए खतरनाक है, क्योंकि बढ़ी-चढ़ी आभासी गूंज की चाहत वास्तविक परिस्थियों से पथभ्रष्ट कर सकती है। सामाजिक संस्थाओं को क्षतिग्रस्त कर सकती है। हमें अब एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना है।

 

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