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सिनेमा की सामाजिक प्रतिबद्धता

किताबों की तुलना में सिनेमा विचारों के संचार का ज्यादा सशक्त माध्यम है। इसका उदाहरण हम विज्ञान के नए दर्शन के संचार से देख सकते हैं।

Author January 15, 2017 4:32 AM
बॉक्स ऑफिस पर टकराएंगी दोनों स्टार्स की फिल्में।

मणींद्र नाथ ठाकुर

सिनेमा मनुष्य की एक अद्भुत उपलब्धि है। मनुष्य ने जितनी कलाओं को विकसित किया, उन सबका इसमें समावेश हो सकता है। इसमें समय के संकुचन और विस्तार दोनों की संभावना है। मसलन, आप किसी व्यक्ति के पूरे जीवन को तीन घंटे में दिखा सकते हैं और पूरा तीन घंटा उसके जीवन की एक छोटी-सी घटना पर ही लगा सकते हैं। कंप्यूटर ग्राफिक्स के इजाद ने मनुष्य की कल्पना को प्रत्यक्ष करने की असीम संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। ‘इंसेप्सन’ नामक फिल्म ने तो यहां तक दिखाने में सफलता पा ली कि एक आदमी दूसरों की चेतना में प्रवेश कर जाता है और वहां से सूचनाएं चुरा लेता है। ऐसा चेतना के एक नहीं, कई स्तरों पर हो सकता है। इस फिल्म में आखिर तक दर्शकों को पता ही नहीं चल पाता कि वह आदमी यथार्थ में लौटता है या नहीं।

प्रसिद्ध चिंतक हैबरमास सही कहते हैं कि सिनेमा के अविष्कार ने समाज में खास तरह का ‘पब्लिक स्फीयर’ बनाया है। इसके पहले स्थानीय संस्थाओं में सामाजिक विमर्श चलता था। कहीं ‘पब’, तो कहीं ‘मचान’ और कहीं ‘साहित्यकी’ जैसी संस्थाएं थीं, जहां लोग सामाजिक मुद्दों पर बहस किया करते थे। लेकिन सिनेमा ने इसमें एक विस्तार ला दिया है। कल्पना को प्रत्यक्ष दिखाने की यह प्रक्रिया भले आभासी हो, इसका प्रभाव प्रत्यक्ष जैसा ही है। इस क्षमता का उपयोग शायद पहली बार कृष्ण ने गीता में किया था। जब अर्जुन के सवालों का जवाब देते-देते थक गए तो कहा कि लो अब प्रत्यक्ष ही कर लो और अपना विराट रूप अर्जुन को दिखा दिया। अर्जुन चुप, आगे बिना बहस किए भगवान की सारी बातें मानने लगा। सिनेमा यही विराट रूप है, जिसमें आदमी अपना भूत और भविष्य देख और दिखा सकता है। जिन बातों को बड़े-बड़े विद्वान मोटी-मोटी किताबों से नहीं समझा सकते, तीन घंटे की फिल्म से समझ में आ जाती है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत की फेमिनिस्ट चिंतकों की किताबों का कुल मिला कर जितना प्रभाव समाज पर पड़ा होगा, उससे कहीं अधिक फिल्म ‘पिंक’ ने डाला होगा। मुझे याद है, जब राजकपूर की फिल्म ‘बॉबी’ सुनहले परदे पर आइ थी, तो हिंदी समाज में जैसे क्रांति आ गई थी। किसी ने उसे बीस बार देखा तो किसी ने तीस बार। एक ने तो अपने पिता को गाय बेच कर पैसे भेजने तक का आग्रह कर दिया, ताकि उस रास्ते पर चल सके।
इस माध्यम के प्रभाव के बारे में मनोवैज्ञानिक और न्यूरोवैज्ञानिक शोध में लगे हैं। खोजने की कोशिश हो रही है कि मनुष्य पर इस दृश्य-श्रव्य माध्यम का क्या असर पड़ता है। बिना शोध के भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि सिनेमा दिल और दिमाग के बीच की दूरी को खत्म कर देता है। जिन लोगों ने ‘तारे जमीन पर’ के दर्शकों पर ध्यान दिया होगा, उन्हें पता होगा कि शायद ही कोई होगा, जो बिना रोए सिनेमा हॉल से बाहर आया। रोने की प्रक्रिया का मनोविज्ञान यह है कि सिनेमा दर्शकों को उनके अपने जीवन से जोड़ देता है और दर्शक अपने आप को उसमें खोजने लगता है।

किताबों की तुलना में सिनेमा विचारों के संचार का ज्यादा सशक्त माध्यम है। इसका उदाहरण हम विज्ञान के नए दर्शन के संचार से देख सकते हैं। विज्ञान का जो दर्शन हमारे कॉमन सेंस में अभी तक अपना राज जमाए हुए है, पिछले कुछ दशकों में उससे इतर एक महत्त्वपूर्ण दर्शन विकसित हुआ है। अभी उसका प्रचार-प्रसार बैद्धिक जगत में भी ठीक से नहीं हो पाया है। मगर सिनेमा के माध्यम से तेजी से वह कॉमन सेंस का हिस्सा बनता जा रहा है। आपने अगर ‘आक्सफर्ड मर्डर’, ‘पाई’, ‘बटरफ्लाई इफेक्ट’, ‘केयॉस थिओरी’ जैसी हॉलीवुड फिल्में या फिर ‘तीन पत्ती’ जैसी बंबइया फिल्में देखी हों तो समझ सकते हैं कि जिन बातों को नोबेल पुरस्कार विजेता इलिया प्रिगोगिन अपनी किताब ‘मैन’स न्यू डॉयलॉग विद नेचर’ में कहना चाहते हैं, उससे कहीं ज्यादा प्रभावी तरीके से इन फिल्मों ने कही है। भौतिक जगत के लिए नाभिकीय ऊर्जा जितना महत्त्वपूर्ण है, चेतना जगत के लिए सिनेमा उससे कम नहीं है। मगर इसके साथ ही यह भी मानना जरूरी है कि मनुष्य के पास यह एक खतरनाक माध्यम भी हो सकता है। इसका उपयोग मनोरंजन के लिए तो हो ही सकता है, ‘कल्पना की राजनीति’ के लिए भी हो सकता है। इसका मतलब यह भी है कि इस सशक्त माध्यम से हमारी चिंतन की क्षमता और कल्पना की दुनिया पर भी कब्जा किया जा सकता है। इस विषय पर कई बड़े चिंतकों ने विमर्श किया है। मार्क्सवादी चिंतक अलथूसे तो इसे वैचारिक कंट्रोल के लिए राज्य के एक यंत्र के रूप में ही मानते हैं। मनोवैज्ञानिक लाकां भी इसके इस प्रभाव से सहमत हैं। फ्रैंकफर्ट स्कूल के चिंतकों ने तो इस विषय में काफी अध्ययन कर इसे सांस्कृतिक उद्योग का हिस्सा माना है।

अगर सिनेमा इतना महत्त्वपूर्ण माध्यम है तो इसका संचालन किसके हाथ में होना चाहिए। हॉब्स की इस बात से असहमत होना मुश्किल है कि अगर शासक वर्ग को यह लगे कि त्रिभुज के तीन कोणों का योग एक सौ अस्सी डिग्री होता है जैसा ध्रुव सत्य भी उनके हित के खिलाफ है, तो वे ज्यामिति की सारी पुस्तकें जला देंगे। ऐसे में अगर राज्य और उसके नियंताओं के हाथ में इसका नियंत्रण हो तो आप समझ सकते हैं कि इस कला माध्यम से तानाशाही की आलोचना कतई संभव न होगी। और वे भी निर्धारण करने लगेंगे की क्या राष्ट्रवादी है और क्या सांस्कृतिक। भारतीय सिनेमा में राज्य की आलोचना जितनी प्रखर थी, आप खुद देख सकते हैं कि धीरे-धीरे सेंसर बोर्ड नामक संस्था ने उसका क्या हाल कर दिया है।

दूसरा उपाय है बाजार। आमतौर पर बाजार और सिनेमा का गहरा संबंध है। चूंकि यह एक महंगा माध्यम है, इसे बाजार में बिकने लायक माल बनाना ही होगा। लेकिन कला जब बाजार में बिकने लगती है तो कलाकार की स्वायत्तता खत्म हो जाती है। हमने भारतीय फिल्म उद्योग में ‘समांतर सिनेमा’ का हाल देखा है। बेहतरीन फिल्मों के कलाकारों को अंत में हास्य कलाकार तक का काम करना पड़ा है। हास्य कलाकार होने में कोई बुराई नहीं है, पर कहना केवल इतना है कि अगर बाजार के दबाव में उसे यह करना पड़ रहा है, तो उचित नहीं है, क्योंकि यह उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं है। समांतर सिनेमा ने भारत में सामाजिक आलोचना की एक नई परंपरा शुरू की थी, जिसका महत्त्व सामाजिक परिवर्तन के लिए था, लेकिन बाजार ने उसे खारिज कर दिया। इसलिए जरूरी नहीं कि जो समाज के लिए जरूरी है, उसे बाजार भी स्वीकार करे। इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि बाजार मनुष्य के दुर्गुण से उपजी कमजोरियों का व्यापार ज्यादा सफलता से करता है। किसी फिल्म ने इसे बखूबी सांकेतिक तौर पर कहा है कि ‘मोहब्बत अब तिजारत हो गई है’। कला और व्यापार के बीच का फर्क अगर खत्म हो जाए, तो संप्रेषण का इतना शक्तिशाली माध्यम खतरनाक भी हो सकता है। इसलिए मनुष्य को संभल कर इसके उपयोग के तरीके खोजने होंगे।

 

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