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तीरंदाज- भय से अभय की ओर

हमारी उमंग भय-मुक्त होने की भी है। धर्म से टकराव और धर्मों में टकराव का कारण हमारे भय से अभय की ओर जाने की चेष्टा है- दंड की जगह प्रेम पाने का प्रयास है। धर्म के नर्क को मानवीय स्वर्ग में तब्दील करना इस उमंग की परकाष्ठा है।
उनके अनुसार धर्म का नाम आते ही पुजारी की आकृति उनके मन में उभरती थी, जो उन्हें अच्छी नहीं लगती।(Source: AP file Photo)

अमेरिका के एक पादरी ने कुछ दिनों पहले हाई स्कूल के बच्चों से पूछा कि अगर उन्हें एक नया धर्म बनाने को कहा जाए तो वे उसकी कल्पना किस प्रकार करेंगे? कोलंबिया और नार्थ कैरोलिना के स्कूली छात्रों ने जो जवाब लिख कर दिए वे बेहद रोचक थे। लगभग एकमत होकर उन्होंने कहा था- नो प्रीस्ट, नो हेल, नो पनिशमेंट। यानी उन्हें नए धर्म में पुजारी/ पादरी नहीं चाहिए, नर्क नहीं चाहिए और धर्म से सजा देने का अधिकार वे हटा देना चाहते हैं। उनके अनुसार धर्म का नाम आते ही पुजारी की आकृति उनके मन में उभरती थी, जो उन्हें अच्छी नहीं लगती। बच्चों को उनके तौर-तरीके भी आडंबर भरे दिखते थे और उनके होने का उनको कोई ठोस फायदा नजर नहीं आया। धर्म द्वारा उनके कृत्य पर सजा देना भी उनको नापसंद था, इसलिए उन्होंने उसे अपने काल्पनिक धर्म से बेदखल कर दिया।

‘धर्म हर समय हमको आंकता, परखता रहता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। यह अधिकार उसने सिर्फ अपने पास क्यों रखा हुआ है? अनुयायियों के पास भी धर्म को आंकने का अधिकार होना चाहिए।’ छात्रों का मानना था कि धार्मिक रीतियां एकतरफा हैं। नए धर्म में ऐसा नहीं होना चाहिए। पर उनके सबसे रोचक विचार नर्क के बारे में थे। उन्होंने मौजूदा धर्म के नर्क को पूरी तरह से नकार दिया था। मजे की बात है कि उन्होंने नर्क की बात तो तफसील से की थी, पर स्वर्ग के बारे में कुछ नहीं कहा था। अपने काल्पनिक धर्म से उन्होंने स्वर्ग को नहीं हटाया था और न ही उस पर कोई टिप्पणी की थी। पुजारी, सजा और नर्क धर्म के असरदार दंडात्मक पहलू हैं। प्रवचन सुनना और उसमें कहे पर अमल न करने पर दंडित करने की रिवायत एक तरफ तो अनुयायियों को जीते-जी परेशान करती है, तो दूसरी तरफ उन्हें मरणोपरांत नर्क का खौफ भी दिखाती है। ऐसे में छात्रों के दिमाग पर धर्म का खौफ हावी होना और उसके प्रेम के पहलू का लगभग लुप्त होना वाजिब है। वैसे अगर हम छात्रों की बात छोड़ कर उम्रदराज लोगों की राय जानना चाहें, तो दुनिया में अधिकतर लोग ऐसे होंगे, जो अपने को कट्टर धार्मिक नहीं मानते हैं। उनको आसमानी वजूद पर विश्वास धार्मिक की अपेक्षा आध्यात्मिक कारणों से है। वे पूजा-पाठ उतना ही करते हैं, जिससे उनके मन को शांति मिले और वे अपना जीवन सुख से बिता सकें। छात्रों की तरह वे भी धर्म के दंडात्मक चेहरे से कन्नी काट जाते हैं। इस जीवन में और उसके बाद नर्क में प्रताड़ित होने का खयाल उनके कृत्यों पर बहुत कम प्रभाव डालता है।

नर्क एक तरह से यूरोप और उत्तरी अफ्रीका की देन है। वहां प्राचीन काल से ही नर्क का बोलबाला रहा है। मध्यकाल में यह अपने चरम पर था। वैसे शुरुआती यहूदी धर्म में स्वर्ग और नर्क की कोई परिकल्पना नहीं थी। उसका मानना था कि लोग मर कर शेओल जैसी नीरस जगह चले जाते हैं, जहां वे अनंतकाल तक पड़े रहते हैं। प्राचीन ग्रीक धर्म गुरु भी ऐसा ही कुछ मानते थे। वे इस जगह को हेड्स कहते थे। पर सामाजिक जीवन की ग्रंथियों को सुलझाने के लिए इस जीवन और अगले जीवन में दंड और पुरस्कार की अवधारणा लाना जरूरी होता गया था। अच्छे व्यक्तिगत और सामाजिक कृत्यों को तुरंत पुरस्कृत करना लगभग असंभव था, पर इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देना जरूरी भी था। स्वर्ग बना और साथ में उसका उलट यानी नर्क की परिकल्पना भी बनी थी। लोगों को धार्मिक पंथवाद की तरफ हांकने के लिए नर्क का भीषण दंडात्मक रूप इसमें पेश किया गया था। पर शुरू से ही स्वर्ग और नर्क की परिकल्पना के बारे में विचारकों में बहस चलती रही है। कुछ लोग इनका होना ही नहीं स्वीकार करते हैं, तो कुछ इनके चिरकालीन होने पर प्रश्नचिह्न लगाते रहे हैं। वे मानते हैं कि स्वर्ग और नर्क है, पर हमेशा के लिए वहां वास नहीं होता है। मरने के बाद दंड या पुरस्कार कुछ अरसे तक आसमानी शक्ति हमें देती है। कुछ औरों का कहना है कि स्वर्ग और नर्क हमारे दिमाग में स्थित है- अपनी सोच से ही हम अपनी जिंदगी स्वर्ग या नर्क बना लेते हैं।

ईसाई धर्म के शुरुआती दौर में अलेक्सांद्रिया के विचारक ओरिगेन (254 ईपू) ने नर्क को नकार कर कहा था कि ईश्वर का प्रेम अनंत है। उसे हर प्राणी से प्रेम है। ऐसे में वह चिरकालीन नर्क किसी को दे ही नहीं सकता है। उनका मानना था कि मनुष्य की आत्मा अजर अमर है, जो शरीर धारण करने पर जो भी पाप या पुण्य कर्म करती है उसका लाभ या हानि उसे निरंतर जन्म लेने की प्रक्रिया में तब तक मिलता रहता है, जब तक वह पूर्ण पुण्य आत्मा होकर ईश्वर में लीन नहीं हो जाती। कहा जाता है कि ओरिगेन के विचार भारत में पूर्व प्रचलित सनातन धर्म और फिर बौद्ध धर्म से प्रभावित थे। पर हिप्पो शहर के अगस्टीन (354-430 ईपू), वे ईसाई धर्मगुरुओं के पितामाह माने जाते हैं, ने नर्क को पूरी तरह स्थापित करने में विशेष योगदान दिया था। उन्होंने चर्च को मनवा लिया कि मनुष्य को सिर्फ एक जिंदगी ईश्वर देता है और उसके दौरान किए गए कृत्य से उसको मरने के बाद चिरकालीन स्वर्ग या नर्क दिया जाता है। ईश्वर ने समाज के मूल्यों की सुरक्षा के लिए उद्दंड को दंडित करने के लिए नर्क बनाया है।नर्क की इस अवधारणा को आगे चल कर लगभग सभी धर्मों ने अपना लिया है। नर्क का दीर्घकालीन असर यह है कि स्वर्ग पाने की लालसा से ज्यादा नर्क की यातनाओं का डर सद्मार्ग पर चलने के लिए लोगों को प्रेरित करता है। तो क्या धर्म की बुनियाद डर है? और क्या उसका ऐसा ढांचा जानबूझ कर खड़ा किया गया है, जो डरावना हो? क्या धर्म और उसके गुरु भय-पोषण करते हैं? वैसे हर धर्म प्रेम और सद्भाव की बात करता है और उसके जरिए सही आचरण की ओर प्रेरित करता है, जिससे मानवीय और सामाजिक मूल्यों की रक्षा हो सके।

नर्क का डर दिखाने वाले धर्मानुयायियों के आलावा मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि मनुष्य का व्यवहार बहुत हद तक वास्तविक या काल्पनिक भय से संचालित होता है। नर्क की अवधारणा इस मानव प्रवृत्ति पर विशेषकर आधारित है। धर्म का प्रचलन भयभीत मनुष्य की वजह से है। पर स्कूली छात्रों की तरह हमारी उमंग भय-मुक्त होने की भी है। धर्म से टकराव और धर्मों में टकराव का कारण हमारे भय से अभय की ओर जाने की चेष्टा है- दंड की जगह प्रेम पाने का प्रयास है। धर्म के नर्क को मानवीय स्वर्ग में तब्दील करना इस उमंग की परकाष्ठा है।

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