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तीरंदाज: स्वाद महिमा

स्वाद से जिंदगी का हर पहलू जुड़ा हुआ है। हमारे अनुभव खट्टे-मीठे होते हैं। हम अकसर किसी घटना या आयोजन को यह कह कर खारिज कर देते हैं कि उसमें स्वाद नहीं आया था। भावनाएं भी अपना स्वाद छोड़ जाती हैं- चाहे वे मीठी यादें हों या फिर गुस्से की मिर्ची हो। एक तरह से हमारी अभिव्यक्ति के लगभग सभी पहलू कहीं न कहीं स्वाद से जुड़े हुए हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

सिर्फ स्वाद में ही इतना सामर्थ्य है कि वह अपने को चिर-स्मृति में स्वाभाविक रूप से स्थापित कर लेता है। स्मरण, आंखों और मस्तिष्क में, समय के साथ धुंधला होता जाता है, पर स्वाद अंत तक जुबान पर चढ़ कर बोलता है। वह जितना पुराना होता जाता है उतना ही खरा होता जाता है। शायद इसीलिए मुझे दादी की शक्ल ठीक से आज याद तो नहीं है, पर उनके हाथ के खाने का स्वाद ऐसे याद है जैसे थाली का आखिरी कौर मैंने एक पल पहले खाया हो। ऐसा नहीं है कि दादी बहुत अलग किस्म का खाना बनाती थीं। मीट-मछली से उन्हें परहेज था, जबकि घर में नॉनवेज के शौकीनों की भरमार थी। वह सादा खाना ही बनाती थीं- दिन में ज्यादातर अरहर की दाल और चावल और उसके साथ खूब घी में भुना हुआ आलू का भरता बनाती थीं। शाम को कोई हरी सब्जी बनाती थीं और उसके साथ सादे रसेदार आलू होते थे।

प्याज और टमाटर में भुने हुए सुर्ख रसेदार आलू वह हफ्ते में एकाध बार ही बनाती थीं, पर वह जब भी बनता था तो घरवाले जल्दी खाना परोसने की जिद करने लगते थे। प्याज के आलू के साथ वह रोटी नहीं बल्कि पराठे देती थीं और जाड़े के मौसम में बहुत सारी लाल मिर्च, गुड़ और लहसुन में लिपटा हुआ शलगम का अचार परोस देती थीं। दादी ने अपनी बहुओं को अपने जैसा खाना बनाना सिखाया था। वे अलग-अलग स्वाद वाले घरों से आई थीं, पर बहुत जल्दी उनके तरीके का खाना बनाना सीख गई थीं। मेरी मां पंजाबी थीं और उनके यहां आलू खाने का चलन बहुत कम था, पर ससुराल के आलू-भाव से वह फौरन जुड़ गई थीं। हमारे कुनबे का दिन में दो-तीन बार आलू खाए बिना काम नहीं चलता था और इसलिए हमारे पंजाबी रिश्तेदार हम लोगों को आलू के शेर कह कर चिढ़ाते थे। दादी को गुजरे हुए जमाना हो गया है, पर उनके हाथ के खाने का स्वाद आज भी ताजा है। इस ठेठ कुनबई शैली में बने खाने की स्मृति मुझको अपने घर-परिवार और उसके परिवेश से अटूट रूप से बांधती रही है। वास्तव में, ‘सहभाजीत’ स्वाद ही लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है और उसको बार-बार साझा करके ही तमाम समुदाय, और उनके साथ समाज, निर्मित हुए हैं। स्वाद की स्मृति ही शायद वह गारा है जो और तरह की स्मृतियों की र्इंटों को जोड़ कर समाज के ठिकाने को शक्ल देता है, उसको अपने तथा औरों के लिए विशिष्ट रूप से चिह्नित करता है। स्वाद से जिंदगी का हर पहलू जुड़ा हुआ है। हमारे अनुभव खट्टे-मीठे होते हैं। हम अकसर किसी घटना या आयोजन को यह कह कर खारिज कर देते हैं कि उसमें स्वाद नहीं आया था। भावनाएं भी अपना स्वाद छोड़ जाती हैं- चाहे वे मीठी यादें हों या फिर गुस्से की मिर्ची हो। एक तरह से हमारी अभिव्यक्तिके लगभग सभी पहलू कहीं न कहीं स्वाद से जुड़े हुए हैं। वास्तव में, हमारी जुबान का जायका हमारे अंदर तक घुल गया है, मानस में पूर्णत: स्थापित हो गया है।

वैसे तो हमारे पास पांच इंद्रियां होती हैं- आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा- पर इनमें से किसी का भी भोग जिह्वा के प्रयोग के बिना पूरा नहीं होता है। जो भी हम देखते, सुनते, सूंघते या स्पर्श करते हैं उसको अभिव्यक्तजुबान से ही करते हैं। इस अभिव्यक्तिके लिए हमें एक बार फिर जुबान के स्वाद का सहारा लेना पड़ता है। एक तरह से और इंद्रियों के अनुभव को हम अमूमन जुबान के स्वाद के जरिए ही परिभाषित करते हैं- जैसे किसी दुर्घटना को देख कर अनायास ही मुंह से निकल जाता है कि दिल कड़वा हो गया या बच्चे की हंसी मन में मिठास का स्वाद उभार देती है। समाज भी व्यक्तिया गुट के खालिस कृत्यों से नहीं बल्कि उनके कृत्यों के स्वाद से अपने को संचालित करता था। कोई कितना भी बड़ा काम क्यों न कर दे, पर उसका स्वाद अगर ठीक नहीं है तो उसकी विशिष्टता समाप्त हो जाती है। समाज-भाव या ‘पब्लिक सेंटिमेंट’ किसी भी राजनीतिक, सामाजिक या फिर आर्थिक कृत्य के स्वाद से बनता है। यह जरूरी नहीं है कि हर काम लोकलुभावन ही हो, कई बार जन-कल्याण के लिए कठोर कदम भी उठाने पड़ते हैं, पर उसका कुल मिलाकर स्वादानुसार होना जरूरी है।

अगर हम हाल-फिलहाल का इतिहास उठा कर देखें तो साफ हो जाएगा कि मुद्दे से सहमत होने के बाद भी लोग उससे अलग इसलिए हो गए क्योंकि मुद्दे से जुड़े क्रम का स्वाद उनको पसंद नहीं आया था। दूसरे शब्दों में, स्वाद वह मानक है जिससे लोक संवाद की सफलता और विफलता तय होती है। राजनैतिक कृत्य समाज के स्वादानुसार होने पर ही पोषित होते हैं। स्वाद-विहीनता किसी भी जन-समुदाय के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। रोजमर्रा के काम हों या फिर लंबे समय तक चलने वाले कृत्य, इनकी पूर्ति में अगर रस नहीं है या प्रक्रिया नीरस है तो अपेक्षित परिणाम नहीं आ सकते हैं। घोर परिश्रम भी स्वादहीन नहीं होता है, उलटे उसका ऐसा स्वाद होता है कि धूप और पसीने के बावजूद वह हमें लगे रहने के लिए ललचाता है। उसका कष्ट भूल कर हम उसके स्वाद को बार-बार याद करते हैं, उसको दुबारा चखना चाहते हैं। स्वादहीन समाज या राजनैतिक व्यवस्था असल में संवादहीन व्यवस्था होती है। दादी के चूल्हे के स्वाद की वजह से ही हम सब चौके में जमा होते थे और जायके के जरिए ऐसे घुल-मिल जाते थे कि हर मुसीबत आसान लगने लगती थी। स्वाद ने हमें ऐसा जोड़ा था कि पीढ़ियां गुजरने के बाद भी, उनकी ऊंच-नीच होने पर भी, हम अपने को उसी सलीके के जरिए परिभाषित करते रहे हैं। चेहरे धूमिल पड़ गए हैं, घटनाएं भूल गई हैं, लोग गुजर गए हैं, पर स्वाद आज भी बना हुआ है। हम एक-सा नमक खाते थे और शायद इसीलिए एक दूसरे को निभा ले जाते थे। वास्तव में हम एक इसीलिए थे, और हैं, क्योंकि हमारा साझा स्वाद है। इसके बिना परिवार और समाज सूना है, और ऐसा चलते रहना बेमानी है।

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