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वक्त की नजर : इतिहास बदलने की बेकली

अगर नई समिति ने इतिहास को सुधारने के बहाने हिंदुत्ववादी प्रचार और झूठ लिखना शुरू किया तो वह और भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। राजस्थान के स्कूलों में अब अकबर को हारते हुए दिखाया गया है हल्दीघाटी के युद्ध में, ताकि राणा प्रताप को विजेता के रूप में पेश किया जा सके। ऐसे संशोधन किसी को लाभ नहीं पहुंचा सकते।

Author March 11, 2018 4:41 AM
पीएम नरेंद्र मोदी (पीटीआई फाइल फोटो)

इतिहास को विजेता लिखते हैं। अंग्रेजी की यह पुरानी कहावत है। सो, ऐसा भारत में भी हुआ है। अंग्रेजों ने जब भारत में अपने राज की जड़ें मजबूती से गाड़ीं तो उन्होंने यह भी तय किया कि हमारा इतिहास क्या था। तय किया कि जिन लोगों ने दुनिया को संस्कृति दी, आयुर्वेद, गणित और योग का ज्ञान दिया वे भारत आए थे यूरोप से। यानी भारत में सभ्यता थी ही नहीं। अब यह ऐसी बात है जिसको सुन कर कई राष्ट्रवादी भारतीयों का खून खौलने लगता है। खासकर हिंदुओं का, क्योंकि अंग्रेजों की दृष्टि में अगर कोई सभ्यता थी उनके आने से पहले तो वह भी बाहर से मुसलमान लाए थे अपने इस प्राचीन देश में। ऊपर से हमारे लिए अपने इतिहास का सच तय करना वैसे भी मुश्किल था, क्योंकि इतनी बार आक्रमण हुए विदेशियों के कि जिस तरह हमारे मंदिर गायब कर दिए गए थे, उसी तरह हमारे प्राचीन दस्तावेज भी गायब कर दिए गए, ताकि साबित कर सकें हमारे विदेशी हमलावर कि यहां न कभी सभ्यता थी, न संस्कृति। जब संस्कृति ही हमें यूरोप से मिले तो संस्कृति का क्या सवाल?

स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत सरकार का पहला काम होना चाहिए था इतिहास की किताबों में संशोधन लाना, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं, सो प्राचीन भारतीय संस्कृति अदृश्य ही रही है काफी हद तक आज भी। अजीब बात है कि आधुनिक भारत जिन चीजों के लिए जाना जाता है दुनिया में- योग, आयुर्वेद, ध्यान- सब प्राचीन भारत की देन हैं, लेकिन हम नहीं जानते कि वे लोग कौन थे जिनकी देन हैं ये। अंग्रेजों के इतिहासकारों ने तय कर दिया था कि ये लोग भारत भूमि पर पैदा नहीं हुए थे और उन्हीं की किताबों से सीखे भारतीय वामपंथी इतिहासकार, सो उनकी नजरों में गजनी और गोरी सिर्फ लुटेरे थे। मुसलमान होने के नाते हमारे मंदिर तोड़े उन्होंने, इस मकसद से नहीं कि हम बुतपरस्त काफिर थे और हमारे मंदिर हराम। इन बातों को आज भी सिखाया जाता है हमारे बच्चों को स्कूलों में। सो, अगर मोदी सरकार ने इतिहास की किताबों में संशोधन लाने के लिए समिति गठित की है, तो अच्छी बात है, लेकिन अच्छी बात मानी नहीं जा रही है। पिछले हफ्ते रायटर समाचार सेवा ने इस समिति के बारे में जब लिखा तो इस नजरिए से कि हिंदुत्ववादी मोदी सरकार ने समिति गठित की है सिर्फ इस बात को तय करने के लिए कि भारत के पहले वासी हिंदू थे। असदुद्दीन ओवैसी का इंटरव्यू किया और उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि समिति का मुख्य लक्ष्य ही है कि मुसलमानों को दूसरे दर्जे के नागरिक होने पर मजबूर किया जाए। ओवैसी साहब, जो खुद कट्टरपंथी मुसलमान हैं, के मुंह से उन्होंने कहलवाया कि ‘आज के दौर में मुसलमान जितने खौफजदा हैं, पहले कभी न थे।’ पिछले हफ्ते सोनिया गांधी विशेष मेहमान थीं इंडिया टुडे के कान्क्लेव में और उन्होंने अपने भाषण में आरोप लगाया मोदी सरकार पर कि वे इतिहास को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। इनके इस इशारे पर जाहिर है कि अन्य ‘सेक्युलर’ राजनीतिक दल भी यही करने लग जाएंगे। कहने का मतलब यह है कि अगर मोदी सरकार की इस समिति ने साबित करने की कोशिश की कि सरस्वती नदी के दायरे में एक प्राचीन भारतीय सभ्यता थी, जिसका नामो-निशान अब मिट गया है तो फौरन मुसलमान उसको झूठ कहने लग जाएंगे। ऐसा अगर होता है ऐसे समय जब राम मंदिर का फैसला भी आने वाला है सर्वोच्च न्यायालय से तो अशांति देश भर में फैल सकती है। सो, क्या इस समिति को अपना काम समाप्त कर देना चाहिए? ऐसा मैं नहीं मानती हूं।

मेरा मानना है कि बहुत जरूरी हो गया है प्राचीन भारत पर रोशनी डालना। बहुत जरूरी हो गया है स्कूल जाने वाले भारतीय बच्चों को इतिहास का सच सिखाना। इन दिनों कई इतिहासकार हैं, जो प्राचीन भारत पर किताबें लिख रहे हैं, लेकिन स्कूलों में कौन-सी इतिहास की किताबें होनी चाहिए, सिर्फ सरकारें तय कर रही हैं। अभी तक इन किताबों को लिखा है वामपंथी इतिहासकारों ने, जिन पर कांग्रेस की सरकारें शुरू से मेहरबान रही हैं। समस्या यह है कि अगर मोदी सरकार की इस नई समिति ने इतिहास को सुधारने के बहाने हिंदुत्ववादी प्रचार और झूठ लिखना शुरू किया तो वह और भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। राजस्थान के स्कूलों में अब अकबर को हारते हुए दिखाया गया है हल्दीघाटी के युद्ध में, ताकि राणा प्रताप को विजेता के रूप में पेश किया जा सके। ऐसे संशोधन किसी को लाभ नहीं पहुंचा सकते।

यहां यह भी कहना जरूरी है कि भारत के बच्चों को उनकी सभ्यता, उनके इतिहास के बारे में तकरीबन कुछ नहीं सिखाया जाता है। पहले ऐसा होता था सिर्फ उन इंग्लिश मीडियम स्कूलों में, जहां अमीर मां-बाप अपने बच्चों को भेजा करते थे तगड़ी फीस देकर। अब हाल यह है कि देहातों में रहने वाले गरीब मां-बाप भी अपने बच्चों को गांव के इंग्लिश मीडियम स्कूल में भेजना पसंद करते हैं, इस उम्मीद से कि अंग्रेजी सीखने से नौकरी मिलना आसान हो जाएगा। मैं जब इन देहाती स्कूलों के बच्चों से मिलती हूं तो रोना आता है, क्योंकि वे न तो अंग्रेजी बोल या पढ़ पाते हैं और न ही अपनी मातृभाषा अच्छी तरह सीख रहे हैं। सो, इस इतिहास में संशोधन लाने वाली समिति के साथ एक और समिति भी होनी चाहिए, जो हमारे शिक्षा के पूरे ढांचे में संशोधन लाने के लिए बिठाई जाए। वर्तमान स्थिति यह है कि भारत के देहातों में प्राइवेट स्कूलों में भी जो बच्चे पढ़ कर निकल रहे हैं वे न सिर्फ अशिक्षित, बल्कि बेजुबान भी हैं। सो, प्रधानमंत्री जी, एक नजर इधर भी।

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