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दूसरी नजर : न्यूनतम सरकार, अधिकतम नुकसान

क्या 132 करोड़ की आबादी वाला देश अपनी उच्च न्यायपालिका में (उच्च न्यायालयों में और सर्वोच्च न्यायालय में) जजों के सिर्फ 1110 पदों में से 410 पद खाली रख सकता है? इसका फायदा केंद्र सरकार को हुआ है, जो सबसे बड़ी मुकदमेबाज है, जिसकी गैरकानूनी कार्रवाइयां और निष्क्रियताएं हजारों मुकदमों के सबब हैं और ये बरसों से लंबित हैं।

Author March 4, 2018 10:37 AM
(फाइल फोटो)

शासन के बारे में जिस प्रचलित उक्ति का सबसे ज्यादा बेजा इस्तेमाल हुआ है वह है ‘उस देश का शासन सबसे अच्छा है जो सबसे कम शासित है’। प्रचलित उक्तियों का इतना अधिक अवमूल्यन हुआ है कि वे अपना अर्थ खो बैठी हैं, मौजूदा शासन के संदर्भ में, यह अवमूल्यन पूरी तरह हुआ है। शासन के कई मॉडल हैं। एकात्मक हो संघात्मक, लेकिन राज्य-नियंत्रणकारी अर्थव्यवस्था में यह मॉडल केंद्र सरकार के पूर्ण नियंत्रण वाला है (जैसे, उत्तर कोरिया), या नियुक्त प्रांतीय सरकारों के साथ नियंत्रण में साझेदारी वाला (जैसे, पूर्व सोवियत संघ)। चीन ने अपने ढंग का एक विशिष्ट मॉडल पेश किया: इसने केंद्र सरकार का पूरा नियंत्रण रखा, लेकिन कारोबारियों को व्यापारिक निर्णय लेने की इजाजत दी। इसे चीन ने ‘चीनी विशेषताओं वाला समाजवाद’ कहा।

खुली, उदार अर्थव्यवस्थाओं ने- चाहे वे एकात्मक संविधान के तहत हों या संघीय संविधान के- भिन्न रास्ता चुना। प्रस्थान-बिंदु था- अहस्तक्षेप। आधुनिक पूंजीवाद के शुरुआती बरसों में, अहस्तक्षेप की नीति के तहत जो कुछ भी आता था उस सब को ठीक समझा जाता था। अमेरिका के तथाकथित लुटेरे सामंतों ने खुद को धनवान बनाया, पर उन्होंने समृद्धि और रोजगार भी पैदा किया। उस व्यवस्था ने भारी विषमताएं पैदा कीं। इसमें व्यापक नाकामी, श्रमिक संघ की हिंसक कार्रवाई और अन्य गड़बड़ियों के लिए काफी गुंजाइश थी।

नियंत्रण बनाम नियमन
जैसा कि जाहिर है, अहस्तक्षेप की हावी नीति जारी नहीं रह सकी, और राज्य मूकदर्शक नहीं रह सका। नियमन का युग शुरू हुआ। नियमन, नियंत्रण नहीं है। खुली, उदार और बाजार अर्थव्यवस्था वाले देशों ने नियंत्रण और नियमन के बीच फर्क तलाशने के लिए संघर्ष किया। उपयुक्त नियामकीय व्यवस्थाएं बनाने में उन्हें बरसों लगे, जो नियंत्रण जैसी न हों- और इसके लिए उन्होंने योग्य नियामकों की नियुक्ति की। दूसरी तरफ उन देशों ने जिन्होंने नियंत्रण से शुरू किया था और अब उदारीकरण की राह पर चल रहे हैं, जैसे कि भारत, ऐसे देश अब भी नियंत्रण और नियमन का फर्क तलाशने में जुटे हैं, और अकसर या तो दूर से सरकारी नियंत्रण का तरीका अख्तियार करते हैं या नियामक बिगड़ कर नियंत्रकों में बदल जाते हैं। यह निबंध उदार लोकतांत्रिक शासन के एक प्रकार के क्षरण से संबंधित है- सरकार राज्य के दूसरे अंगों और कानून के द्वारा स्थापित दूसरे नियामकों को सिकोड़ कर या पंगु बना कर, बड़े घातक रूप से नियंत्रण कायम करती जा रही है। राजग सरकार ने इसमें महारत हासिल कर ली है।

व्यवस्था में बढ़ते सूराख
देखें तालिका:
क्या 132 करोड़ की आबादी वाला देश अपनी उच्च न्यायपालिका में (उच्च न्यायालयों में और सर्वोच्च न्यायालय में) जजों के सिर्फ 1110 पदों में से 410 पद खाली रख सकता है? इसका फायदा केंद्र सरकार को हुआ है, जो सबसे बड़ी मुकदमेबाज है, जिसकी गैरकानूनी कार्रवाइयां और निष्क्रियताएं हजारों मुकदमों के सबब हैं और ये बरसों से लंबित हैं। यही बात अन्य प्राधिकरणों और संस्थाओं के बारे में भी कही जा सकती है। बैंकिंग निरीक्षण विभाग के प्रभार वाला रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर का महत्त्वपूर्ण पद 31 जुलाई 2017 से खाली है- फिर भी हम पंजाब नेशनल बैंक व अन्य बैंकों पर निरीक्षण की नाकामी का रोना रो रहे हैं! अहम नियामकों और अधिकरणों की गाड़ी दो या तीन पहियों से चल रही है।

छिपा हुआ एजेंडा
इस निबंध का मकसद यह सवाल उठाना है कि ‘क्या यही ‘न्यूनतम सरकार’ का वायदा था जो भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान किया था?’ इससे भी अहम सवाल यह है कि ‘निर्णायक नियामकों और प्राधिकरणों में पद खाली रखने से किसे फायदा हो रहा है’, और कि ‘आरटीआइ के कमतर खुलासों और कर संबंधी मामलों के कमतर निपटारों से किसके हित सध रहे हैं?’ जवाब साफ है। हमें आरएसएस और इसकी राजनीतिक शाखा यानी भाजपा के वास्तविक चरित्र के बारे में जानना चाहिए। आरएसएस एक निरंकुशतावादी संगठन है: एक उद्देश्य, एक विचार, एक विश्वास और एक नेता। जब यह अपनी राजनीतिक भुजा के द्वारा सरकार पर कब्जा कर लेता है, तो एक इतिहास, एक संस्कृति, एक भाषा (‘हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है’), एक धर्म (‘वे सभी लोग जो हिंदुस्तान में रहते हैं हिंदू हैं’), एक नागरिक संहिता, और एक चुनाव की अपनी खास सैद्धांतिकी लोगों पर थोपने लगता है। लोकतंत्र अपने सच्चे अर्थों में- उदार, विविध मत और विचार, और रोक व संतुलन- शासन के आरएसएस/भाजपा के तौर-तरीकों के विपरीत है। अगर लोकतंत्र की अन्य संस्थाएं कमजोर होती हैं, तो इससे वास्तविक और व्यावहारिक अर्थ में, सरकार की ताकत और बढ़ती है। लिहाजा, अन्य संस्थाओं को कमजोर और पंगु बनाने के लिए जान-बूझ कर प्रयास किए जा रहे हैं। और जब नियुक्तियां की भी जाती हैं, तो निर्णय पूरी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय का होता है, जो कि पृष्ठभूमि देख कर ही किया जाता है। इसके ताजा शिकार न्यायमूर्ति केएम जोसेफ हुए हैं। न्यूनतम सरकार का इरादा अधिकतम नियंत्रण कायम करने और उदार लोकतंत्र को बुरा बताने तथा उसे नुकसान पहुंचाने का है।
संवैधानिक/वैधानिक प्राधिकरण स्वीकृत पद खाली पद
सर्वोच्च न्यायालय 31 7
उच्च न्यायालयों के जज 1079 403
उच्च न्यायालयों के मुख्य जज 24 9
रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर 4 1
सेबी के सदस्य 9 2
प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण 3 1
राष्ट्रीय हरित अधिकरण 11 6
आयकर अपीलीय अधिकरण 126 34
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण 66 24
केंद्रीय सूचना आयोग
आयुक्त 11 4
अन्य कर्मचारी 160 117
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग
आयुक्त 7 2
अन्य कर्मचारी 197 79
केंद्रीय सतर्कता आयोग
आयुक्त 3 1
अन्य कर्मचारी 296 53
आइपीएस अधिकारी 4843 938
सीबीआइ 7274 1656
केंद्रीय विश्वविद्यालय
कुलपति 41 3
शैक्षणिक पद 17,106 5997

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