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दूसरी नजर: बदलाव का आरंभ शब्दों और विचारों से

भाजपा सरकार ने 2014-15 में आधार वर्ष को बदल कर 2011-12 कर दिया, साथ ही हिसाब का तरीका भी बदल दिया। जो फेरबदल किए गए, मैं उनके विस्तार में नहीं जाऊंगा; इतना कहना काफी है कि जब केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय स्थिर कीमतों पर 7.5 फीसद वृद्धि दर की सूचना देता है, तो बहुत-से अर्थशास्त्री और विश्लेषक यह मानते हैं कि यह शायद यूपीए सरकार के समय के 5.5 फीसद के बराबर होगा।
Author March 25, 2018 05:25 am
वित्तमंत्री अरुण जेटली।

आर्थिक वृद्धि का आकलन एक टेढ़ा काम है। यह और भी बड़ी समस्या बन जाता है जब आप खेल के बीच में नियम बदलते हैं। जीडीपी है सकल घरेलू उत्पादन। बारीकियों को किनारे कर दें, तो यह एक वित्तवर्ष में देश में वस्तुओं तथा सेवाओं के समस्त उत्पादन का कुल मूल्य होता है। उत्पादन को मौजूदा कीमतों के अलावा स्थिर कीमतों (जिनकी संगति महंगाई से बिठाई जाती है) पर भी आंका जाता है। स्थिर कीमतों पर आकलन करने के लिए ‘आधार वर्ष’ का सहारा लिया जाता है। यूपीए सरकार के पहले साल में यानी 2004-05 में जीडीपी की गणना 1999-2000 को आधार वर्ष मान कर की गई थी। कुछ साल बाद आधार वर्ष को बदल कर 2004-05 कर दिया गया, पर गणना-विधि वही रही।

गंभीर शंकाएं
भाजपा सरकार ने 2014-15 में आधार वर्ष को बदल कर 2011-12 कर दिया, साथ ही हिसाब का तरीका भी बदल दिया। जो फेरबदल किए गए, मैं उनके विस्तार में नहीं जाऊंगा; इतना कहना काफी है कि जब केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय स्थिर कीमतों पर 7.5 फीसद वृद्धि दर की सूचना देता है, तो बहुत-से अर्थशास्त्री और विश्लेषक यह मानते हैं कि यह शायद यूपीए सरकार के समय के 5.5 फीसद के बराबर होगा। इस शंका के निवारण का एक बहुत आसान तरीका है; केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय को 2004-05 से पुरानी और नई विधियों के तहत वृद्धि दर का हिसाब जारी करना चाहिए, ताकि लोग और आंकड़ों का उपयोग करने वाले अपने निष्कर्ष निकाल सकें। न जाने किन कारणों से सरकार और केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय को यह कतई मंजूर नहीं है। लिहाजा, संदेह कायम हैं। यह बिलकुल स्वाभाविक है कि किसी को लगे कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.5 फीसद या उसके आसपास नहीं है, क्योंकि अन्य आंकड़े विपरीत दिशा में संकेत करते हैं। पिछले चाल सालों में कृषि क्षेत्र ने औसतन 2.7 फीसद की फीकी वृद्धि दर दर्ज की (यूपीए के दस सालों के दौरान की चार फीसद वृद्धि दर से तुलना करें), और किसान काफी मुसीबत में हैं। आर्थिक सर्वे ने साफ तौर पर यह स्वीकार किया है कि ‘वास्तविक कृषि जीडीपी और वास्तविक कृषि राजस्व पिछले चार सालों में ठहराव के शिकार रहे हैं।’ पिछले चार सालों में, हरेक साल, जिन्सों का निर्यात 2013-14 में हासिल किए गए 314 अरब डॉलर के स्तर को पार नहीं कर सका। कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ), मौजूदा कीमतों पर, लगातार गिरा है- 2013-14 में 31.3 फीसद से पिछले चार सालों के दौरान 30.08 फीसद, 28.47 फीसद, 28.53 फीसद और 28.49 फीसद।

वैकल्पिक नजरिया
जमीनी स्तर पर अहसास यह है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मामूली है, क्योंकि बेरोजगारी बढ़ रही है और नए रोजगार नहीं हैं। कुछ दिन पहले डॉ रघुराम राजन ने कहा कि साढ़े सात फीसद की वृद्धि दर आवश्यक रोजगार-सृजन नहीं कर सकती, और उन्होंने वृद्धि दर को दस फीसद पर ले जाने का आह्वान किया। जो बात अनकही रही वह यह कि अर्थव्यवस्था पिछले वर्षों की ‘साढ़े सात फीसद की दर’ से नहीं बढ़ रही है, जब अन्य संकेतक भी उसी दिशा में संकेत करते थे, और खासी संख्या में रोजगार पैदा हुए; मौजूदा ‘7.5 फीसद की दर’ रोजगार सृजन नहीं कर रही है, और इसलिए यह दर अपने आप में सवालों के घेरे में है। अगले बारह महीनों में इस सरकार से मुझे इससे कुछ ज्यादा की उम्मीद नहीं है। लोगों को मौजूदा सरकार से परे जाकर और एक वैकल्पिक नजरिए की तरफ देखना होगा। कांग्रेस पार्टी ने पिछले सप्ताहांत में संपन्न हुए अपने पूर्ण अधिवेशन में आर्थिक सिद्धांतों के बीच के अंतरों का समाहार इस प्रकार किया: ‘कांग्रेस पार्टी समावेशी आर्थिक वृद्धि के लक्ष्य को निजी उद्यम और प्रतिस्पर्धी तथा कारगर सार्वजनिक क्षेत्र और मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र और सशक्त कल्याणकारी राज्य के जरिए हासिल करने में विश्वास करती है। भाजपा का विश्वास दबावकारी आर्थिक तंत्र में है जो मुट्ठी भर लोगों पर मेहरबान है, जिसमें मध्यवर्ग को बस रिस-रिस कर मिलने वाली वृद्धि (ट्रिकल डॉउन) नसीब होती है और अति गरीबों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।’ कुछ बीज जो पहले बोए गए थे, पिछले सप्ताहांत कांग्रेस के पूर्ण अधिवेशन में अंकुरित नजर आए। मैं उस संकल्प के कुछ बिंदुओं की तरफ ध्यान दिलाना चाहता हूं।

नए विचार, नए आग्रह
’कांग्रेस अपने इस दृढ़ विश्वास को दोहराती है कि हर भारतीय के लिए उत्तम प्राथमिक शिक्षा और उत्तम स्वास्थ्य सुुविधा सुनिश्चित करने में राज्य को महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी।
’भारत का निजी क्षेत्र कारोबार, मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण और निर्यात के जरिए काफी तादाद में अच्छे तथा उत्पादक रोजगारों का सृजन कर सकता है।
’कांग्रेस यह संकल्प लेती है कि वह भारत के उद्यमियों को आर्थिक स्वतंत्रता वापस दिलाएगी, खासकर सूक्ष्म, छोटे तथा मझोले उद्यमों में लगे लोगों को; उन्हें उत्पीड़न से बचाएगी और स्थिर कारोबारी माहौल मुहैया कराएगी। चिह्नित की गई चुनौतियों में से कुछ इस प्रकार हैं:
’करोड़ों युवाओं के लिए उत्पादक रोजगार पैदा करना;
’सशक्त ऋण वृद्धि की बहाली, नए निवेश को प्रोत्साहन और मैन्युफैक्चरिंग की गाड़ी पटरी पर लाना, ताकि वह घरेलू तथा विश्व बाजार की मांग के मद््देनजर अपेक्षित गुणवत्ता के साथ अपेक्षित मात्रा में उत्पादन कर सके।
कांग्रेस का आर्थिक नीति सिद्धांत जिन बातों पर निर्भर करेगा उनमें से कुछ इस प्रकार हैं :
’शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में राज्य की तरफ से बड़े पैमाने पर निवेश और कारगर सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
’कारोबारी आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए अनुकूल सामाजिक और नीतिगत माहौल, जोखिम उठाने का प्रतिफल और भविष्य की सुरक्षा का भरोसा दिलाते रोजगार को प्रोत्साहन।

हो सकता है इनमें से अनेक शब्द प्रचलन में हों, पर आग्रह भिन्न है। कुछ नए शब्द और नए पद भी हैं, जो नए नजरिए को निखारने का काम करेंगे। भारत के निजी क्षेत्र का जिक्र प्रमुखता से किया गया है; अच्छे व उत्पादक रोजगारों का सृजन लक्ष्य है; व्यापार, मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण और निर्यात को अर्थव्यवस्था के अग्रणी क्षेत्रों के तौर पर चिह्नित किया गया है; भारत के उद्यमियों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता की बहाली का वादा किया गया है; आर्थिक उत्पीड़न, कर-आतंकवाद और उद्धत नियमन के भय को निर्मूल करना एक लक्ष्य है; और कारोबारी आत्मविश्वास को बढ़ाना तथा जोखिम उठाने का प्रतिफल दिलाना नीति होगी।
मैं मानता हूं कि बदलाव का आरंभ शब्दों और विचारों से होता है।

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