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दूसरी नजर- स्वास्थ्य पर बजट का जुमला

सरकार ने 2017-18 में 21,46,735 करोड़ रु. खर्च करने का अनुमान पेश किया था, पर आखिरकार उसने 22,17,750 करोड़ रु. खर्च किया- जो कि अनुमान से 71,015 करोड़ रु. ज्यादा था। यह अतिरिक्त धन कहां से आएगा?

Author February 11, 2018 4:38 AM
वित्त मंत्री अरुण जेटली।(फाइल फोटो)

वित्तवर्ष 2018-19 के बजट को लेकर कई सारे सवाल उठाए गए हैं। मुझे एक सवाल केंद्र सरकार के खर्च पर उठाने दें। सरकार ने 2017-18 में 21,46,735 करोड़ रु. खर्च करने का अनुमान पेश किया था, पर आखिरकार उसने 22,17,750 करोड़ रु. खर्च किया- जो कि अनुमान से 71,015 करोड़ रु. ज्यादा था। यह अतिरिक्त धन कहां से आएगा? यह अतिरिक्त धन उधार से आएगा (सरकार 48,309 करोड़ रु. सीधे उधार लेगी और 37,000 करोड़ रु. ओएनजीसी से, जो कि सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर उधार लेगा)।

उधार और खर्च
अतिरिक्त उधार किस मद में खर्च होगा? 1,07,371 करोड़ रु. की वृद्धि राजस्व व्यय में होगी। नतीजतन पूंजीगत व्यय में 36,356 करोड़ रु. की कटौती होगी। यह दोहरी मार है। एक तरफ सरकार राजस्व मद में व्यय के लिए भारी उधार ले रही है, और दूसरी तरफ, जरूरी धन के जुगाड़ में वह पूंजीगत व्यय में कटौती कर रही है। क्या अतिरिक्त राजस्व व्यय का बड़ा हिस्सा 2017-18 में ‘स्वास्थ्य’ को गया? शायद ही। देखें तालिका:
खर्च (करोड़ रु. में)
बजट अनुमान – संशोधित अनुमान
स्वास्थ्य 48,878 – 53,198
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन 27,131 – 31,292
जैसा कि देखा जा सकता है, स्वास्थ्य-मद के व्यय में बढ़ोतरी, बजट अनुमान के बरक्स, केवल 4,320 करोड़ रु. की हुई, जो कि 71,015 करोड़ रु. के कुल अतिरिक्त व्यय का एक छोटा-सा हिस्सा है, और 1,07,371 करोड़ रु. के अतिरिक्त राजस्व का तो और भी छोटा हिस्सा है।

बाल स्वास्थ्य की दशा
स्वास्थ्य स्थिति के एक हिस्से पर नजर डालें: देश में बच्चों की सेहत और बच्चों के पोषण पर। मैंने 2005-06 से 2015-16 के आंकड़ों पर नजर डाली है।
– जन्म के समय लिंगानुपात- जो कि प्रति एक हजार बच्चों पर बच्चियों की संख्या से जाना जाता है- तनिक सुधर कर 914 से 919 हो गया। सुधार की इस गति से तो लिंगानुपात पूरी तरह ठीक होने में कई दशक लग जाएंगे।
– शिशु मृत्यु दर कम होकर 57 से 41 पर आ गई। इस मामले में विश्व का औसत 30.5 और विश्व का सर्वोत्तम 2 है।
– पांच साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर कम होकर 74 से 50 पर आ गई। इस मामले में विश्व का औसत 41 और विश्व का सर्वोत्तम 2.1 है।
– वर्ष 2015-16 में सिर्फ 62 फीसद बच्चों का पूरी तरह टीकाकरण हुआ।
– पांच साल से कम आयु के बच्चों में, प्रत्येक दो में से एक खून की कमी का शिकार है; प्रत्येक तीन में से एक अपेक्षित वजन से कम और कुपोषित है; और प्रत्येक पांच में से एक दुर्बल है।

चूंकि हमने बच्चों के पोषण और उनकी सेहत की परवाह नहीं की है, इसलिए हमारे मानव संसाधन की गुणवत्ता शोचनीय है। आर्थिक वृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर तकनीकी प्रगति और सामाजिक सौहार्द तक, सब कुछ मानव पूंजी की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। डॉक्टरों पर हमारे मानव संसाधन को पल्लवित-पुष्पित करने का उत्तरदायित्व है, खासकर हमारे बच्चों के संदर्भ में, पर डॉक्टर बहुत कम हैं। भारत में 1681 लोगों पर एक डॉक्टर है (2016 का आंकड़ा) और 11,528 लोगों पर एक सरकारी डॉक्टर, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। हम हर साल सिर्फ पचपन हजार स्नातक चिकित्सक और पच्चीस हजार परास्नातक चिकित्सक तैयार करते हैं। हर चिकित्सक पर कम से कम दो चिकित्सकों के काम का भार है।
हमारी स्वास्थ्य-व्यवस्था मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित है: सार्वजनिक/सरकारी अस्पताल, मुनाफे के लिए चलने वाले निजी अस्पताल, और मुनाफाखोरी से दूर रहने वाले निजी अस्पताल। उदासीन प्रशासन के कारण सरकारी अस्पताल (नई दिल्ली का एम्स, पुदुच्चेरी का जेआइपीएमईआर और कुछ अन्य उल्लेखनीय अपवाद हैं) अक्षम बने हुए हैं, जो मरीजों की अनदेखी करते हैं, और इलाज के दौरान सामान्य जोखिम उठाने से भी मना कर देते हैं। तालुका और जिला स्तर के बहुतेरे अस्पताल मरीज को इलाज के लिए कहीं और ले जाने का सुझाव देने वाले अस्पताल होकर रह गए हैं।
दूसरी तरफ, मुनाफे के लिए चलने वाले अस्पतालों (इनमें भी कुछ उल्लेखनीय अपवाद हैं) की नजर अमूमन मुनाफे पर ही रहती है, जो गैरजरूरी जांच तथा प्रक्रियाओं और अनावश्यक उपचार कराने को कहते हैं और गरीब मरीजों से मुंह मोड़ लेते हैं।

बिना धन की योजना
मुफ्त सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य बीमा की उपलब्धता के बावजूद, लगभग हरेक मरीज को इलाज का अधिकांश खर्च खुद उठाना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों के लोग (2014 का आंकड़ा) सरकारी अस्पताल में भरती रहने के दौरान औसतन 5,636 रु. खर्च करते हैं और निजी अस्पताल में भरती रहने के दौरान औसतन 21,726 रु.। शहरी आबादी के संदर्भ में यह आंकड़ा क्रमश: 7,670 रु. और 32,375 रु. है। ये और कुछ अन्य आंकड़े यह सवाल उठाते हैं कि क्या भारत में स्वास्थ्य व्यवस्था दिनोंदिन और विषमता-भरी होती जा रही है? इस पृष्ठभूमि में अवश्य ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना को आलोचनात्मक नजरिए से देखा जाना चाहिए, जिसकी घोषणा बजट में धूम-धड़ाके से की गई। यह ‘सरकार द्वारा वित्तपोषित दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य-योजना नहीं है’, यह बिना धन आबंटित किए, स्वास्थ्य पर सरकार का सबसे बड़ा ‘जुमला’ है। वर्ष 2016-17 के बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना की घोषणा की गई थी, जिसके तहत छह करोड़ परिवारों को एक लाख रु. के स्वास्थ्य बीमा का लाभ देना था। कोई योजना न तो मंजूर की गई न लागू की गई न ही धन आबंटित हुआ, और इसे चुपचाप दफना दिया गया। और अब, उससे भी बड़ी एक योजना के जरिए दस करोड़ परिवारों को पांच लाख रु. के स्वास्थ्य बीमा का लाभ देने की घोषणा की गई है, पर एक रुपया भी मुहैया नहीं कराया गया है।

बीमा करने वालों ने संकेत दिया है कि एक से तीन फीसद प्रीमियम पर पचास हजार करोड़ रु. से डेढ़ करोड़ रु. सालाना का खर्च आएगा, और बजट में घोषणा करने से पहले उनसे कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया। चर्चा है कि चालीस फीसद खर्च राज्य उठाएंगे, पर घोषणा करने से पहले इस बारे में राज्यों से विचार-विमर्श करने की कोई जरूरत नहीं समझी गई। इसके अलावा, बहुत-से राज्यों की अपनी योजनाएं हैं और यह मानने की कोई वजह नहीं है कि वे नई योजना का भार उठाने को राजी हो जाएंगे। बिना ठीक से सोचे-विचारे, या बिना तैयारी के, या बिना धनराशि के, एक भारी-भरकम योजना का एलान करना लोगों की समझ का मखौल उड़ाना है। इस घोषणा के बाद, सरकार अपनी ऊर्जा, अपना वक्त और मानव संसाधन पहले से ही एक मरी हुई परिकल्पना में जान फूंकने के लिए लगाएगी। इस बीच, स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा जारी रहेगी।

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