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दूसरी नजर – अच्छा डॉक्टर, बिगड़ैल मरीज

आर्थिक सर्वे बताता है कि कुछ सालों से बचत तथा निजी निवेश में लगातार कमी आई है। इन्हीं दो इंजनों के सहारे अर्थव्यवस्था ने 2000 के दशक के मध्य में उड़ान भरी थी, पर अब ये तब के मुकाबले धीमी गति से चल रहे हैं। लिहाजा सरकार को निजी निवेश को पटरी पर लाने की योजना घोषित करनी चाहिए।

Author February 4, 2018 04:56 am
वित्त मंत्री अरुण जेटली। (PTI Photo/TV Grab/2 Feb, 2017)

वित्त मंत्रालय में यह एक असामान्य, मगर समय की कसौटी पर खरी साबित हुई व्यवस्था है। कई सचिवों के अलावा, मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) का भी पद है। वह सरकार द्वारा नियुक्त किए गए होते हैं, पर एक मायने में वह सरकार से स्वतंत्र भी होते हैं। वह सरकार से भिन्न नजरिया रख सकते हैं और उसे (संयत भाषा में) व्यक्त भी कर सकते हैं। वह सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना (नम्र भाषा में) कर सकते हैं। आर्थिक सर्वे को तैयार और प्रस्तुत करने तथा सरकार को सलाह देने में उन्हें काफी स्वतंत्रता हासिल रहती है- यह स्वतंत्रता सरकार के दूसरे सचिवों को नहीं रहती। बेशक, सरकार चाहे तो सीईए की सलाह को खारिज कर सकती है। मैं सीईए को ऐसे डॉक्टर के तौर पर देखता हूं जो आवास पर तैनात रह कर रोजाना सेहत की जांच करता है और बीमार पड़ जाने पर अपने मरीज को उपचार तथा दवाएं बताता है। लेकिन अगर बिगड़ैल मरीज हो तो वह बताई हुई दवाएं नहीं लेगा, इसके बजाय वह अपना ही निदान और नुस्खा बताएगा।

आर्थिक सर्वे बनाम बजट
अक्टूबर 2104 में सीईए के रूप में अपनी नियुक्ति के समय से डॉ अरविंद सुब्रमण्यम अच्छे डॉक्टर रहे हैं। लेकिन राजग सरकार का व्यवहार एक भयभीत कर देने वाले मरीज का रहा है। एक अच्छे डॉक्टर और एक बिगड़ैल मरीज का यह अजीब रिश्ता आर्थिक सर्वे तथा बजट के अलग-अलग सुर में सबसे अच्छी तरह झलकता है।

1. आर्थिक सर्वे का जोर चार ‘आर’ पर है (रिकॉग्नीशन, रिजोल्यूशन, रिकैपिटलाइजेशन ऐंड रिफॉर्म्स- पहचान, समाधान, पुनर्पूंजीकरण और सुधार), और सर्वे कहता है कि इनमें से पहले तीन पूरे हो चुके हैं, पर बैंकिंग सुधार का काम अभी हाथ में नहीं लिया गया है। बजट, सुधारों को रेखांकित करने और उनका समय निर्धारित करने का मौका था। यह तो नहीं हुआ, पर हमें बताया गया कि ‘एनहैंस्ड एक्सेस ऐंड सर्विस एक्सीलेंस’ (ईज) नाम से एक महत्त्वाकांक्षी सुधार एजेंडा बनाया गया है।’ यह एक और उदाहरण है कि कोई कार्यक्रम अपने आद्याक्षरों से बने नाम से जाना जाएगा।

2. आर्थिक सर्वे की निगाह में रणनीतिक विनिवेश का अर्थ है ‘सरकार के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना ताकि वह गैर-रणनीतिक कारोबार से बाहर निकल सके और क्षमता-संवर्धन तथा पेशवेर प्रबंधन के जरिए कारोबारियों के लिए अधिक से अधिक आर्थिक संभावनाएं तलाश सके।’ सरकार ने रणनीतिक विनिवेश का अपना सबसे बड़ा उदाहरण पेश किया ओएनजीसी से 37,000 करोड़ रु. वसूल करके! तेल की खोज करने वाली कंपनी ने सरकार को यह राशि एचपीसीएल शेयरों के बदले उधार लेकर दी, जो कि राजकोषीय घाटे को 0.2 फीसद कम कर देगी। यह कपट-योजना थी, न कि कोई रणनीति।

3. आर्थिक सर्वे तैयार करने वाले डॉक्टर ने निर्यात बढ़ाने की दवाएं बताई थीं। मरीज ने उन्हें एक वाक्य में खारिज कर दिया और कहा कि वह पूरी तरह चंगा और स्वस्थ है: ‘हमारा निर्यात 2017-18 में पंद्रह फीसद बढ़ने का अनुमान है।’ हाल के महीनों में निर्यात में हुई थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी ने सरकार को यह तसल्ली दी होगी। लेकिन यह तसल्ली निराधार है, क्योंकि जिन्सों का निर्यात मुश्किल से कुछ साल पहले के स्तर पर वापस आया है। इसके अलावा, वित्तमंत्री ने गलतबयानी की। अप्रैल-दिसंबर 2017 के दौरान, उससे पहले के साल की समान अवधि की तुलना में, निर्यात में वृद्धि 11.24 फीसद थी, न कि 15 फीसद।
अतिरंजित राजस्व अनुमान

4. कर राजस्व की बाबत आर्थिक सर्वे ने ध्यान दिलाया है कि ‘यह उल्लेखनीय है कि केंद्र का कर-जीडीपी अनुपात 1980 के दशक से ज्यादा नहीं है’, और साथ ही कहा है कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि राजस्व वसूली कितनी अच्छी हुई है और यह भी कि अगले साल की बाबत क्या अनुमान है। संशोधित अनुमान के मुताबिक ऐसा लगता है कि कुल राजस्व और जीडीपी का अनुपात 2017-18 में 11.6 फीसद होगा। फिर भी, सरकार की भविष्यवाणी है कि 2018-19 में आय कर संग्रह 19.8 फीसद बढ़ेगा, जीएसटी में 67 फीसद की भारी बढ़ोतरी होगी और कुल कर राजस्व 16.7 फीसद बढ़ेगा। इसके बाद भी डॉक्टर चिंतित है कि काफी बीमार व्यक्ति में प्रबल इच्छाशक्ति नहीं दिख रही।

5. आर्थिक सर्वे ने वृद्धि की राह में आने वाली मुश्किलों की पहचान की है: भूमंडलीकरण के प्रति काफी लोगों की नकारात्मक धारणाएं, संसाधनों को कम उत्पादकता से अधिक उत्पादकता की तरफ स्थानांतरित करने की कठिनाइयां, सघन तकनीक वाले कार्यस्थल की मांग के अनुरूप कामगार के स्तरोन्नयन की कठिनाइयां और जलवायु बदलाव के संकट से प्रभावित कृषि। सरकार ने यथार्थ की जमीन छोड़ कर आकाश में विचरण करते हुए घोषित किया ‘भौतिक तथा साइबर व्यवस्थाओं को जोड़ दें तो उनमें न सिर्फ विविध काम करने वालों की विशाल संख्या को, बल्कि हमारी अर्थव्यवस्थाओं तथा हमारी जीवन शैली को भी रूपांतरित करने की प्रचुर संभावना है। रोबोट तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग, बड़े पैमाने पर आंकड़ों के विश्लेषण, क्वांटम संचार, आदि में शोध, प्रशिक्षण और कौशल-संवर्धन के लिए निवेश करना…उत्कृष्टता के केंद्र स्थापित करने के लिए साइबर फिजिकल सिस्टम मिशन शुरू करना होगा।’ मैं समझता हूं कि वित्तमंत्री को यथार्थ की कठोर जमीन का अहसास हो, इसके लिए हमें उनके अंतरिक्ष अभियान से लौट आने का इंतजार करना चाहिए।

6. आर्थिक सर्वे बताता है कि कुछ सालों से बचत तथा निजी निवेश में लगातार कमी आई है। इन्हीं दो इंजनों के सहारे अर्थव्यवस्था ने 2000 के दशक के मध्य में उड़ान भरी थी, पर अब ये तब के मुकाबले धीमी गति से चल रहे हैं। लिहाजा सरकार को निजी निवेश को पटरी पर लाने की योजना घोषित करनी चाहिए। पर वित्तमंत्री ने बजट में बचत तथा निजी निवेश की चिंताजनक स्थिति का स्वीकार तक नहीं किया है।
जुबानी जमाखर्च

7. आर्थिक सर्वे ने प्रतिस्पर्धात्मकता को बनाए रखने के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा के महत्त्व पर प्रकाश डाला है। वित्तमंत्री दोनों मुद््दों पर विस्तार से बोले, पर जब राशि आबंटित करने की बारी आई तो उन्होंने यह किया:
सरकार लगातार हकीकत से कन्नी काट रही है। यह अर्थव्यवस्था की वस्तुस्थिति को नकार रही है। यह कृषि संकट से आंख चुरा रही है। यह रोजगार-विहीनता को नकार रही है। यह विपक्ष के तर्कों को नकार रही है। और अब यह निदान को, तथा उस डॉक्टर की दवाओं को नकार रही है जिसे इसने 2014 में नियुक्त किया था।

खर्च करोड़ रु. में

2017-18 संशोधित अनुमान और 2018-19 बजट अनुमान
शिक्षा 81,869 और 85,010
स्वास्थ्य 53,198 और 54,667
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन 31,292 और 30,634
राष्ट्रीय शिक्षा मिशन 29,556 और 32,613

 

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