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प्रसंगवश: उपनिवेश-दर-उपनिवेश

शिक्षा हो या साहित्य, सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र की उस संस्कृति का अभाव है, जो हमारे संवेदनतंत्र को जाति, धर्म, वर्ग और विचारधारा की कैद से मुक्त करे। शिक्षा का स्तर अगर प्राथमिक से विश्वविद्यालय तक गिरा है, तो उसके पीछे शिक्षकों-प्राध्यापकों का अपने कर्म और कर्तव्य के प्रति वफादार और ईमानदार न होना है।

Author February 18, 2018 2:02 AM
प्रतीकात्म तस्वीर।

आज का भारत खुद भारत का उपनिवेश है? क्या हमारी शिक्षा इसी भारत-उपनिवेश का अंग है? अगर शिक्षा का स्वरूप उपनिवेशवादी है तो फिर यह प्रश्न अन्य संस्थाओं के बारे में क्यों नहीं किया जाता? क्या पुलिस का रूप और कर्म लगभग वैसा नहीं, जैसा अंग्रेजी हुकूमत में था? क्या अदालतें भी उसी उपनिवेश की बनाई संहिताओं के कानून से नहीं चल रहीं? क्या हमारे दफ्तर, हमारे समस्त कर विभाग, यहां तक कि संसदीय प्रणाली, उसी उपनिवेशवाद की देन नहीं है? फर्क है तो सिर्फ इतना कि पहले अंग्रेजी उपनिवेश था, और अब भारतीय उपनिवेश। इस भारतीय उपनिवेश की उच्च स्तरीय भाषा वही अंग्रेजी है, जो पहले भी थी। उच्च-उच्चतम न्यायालय हो, कर-विभाग हों, केंद्रीय संस्थान हों, उच्च तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा हो, कानून की शिक्षा हो, यहां तक कि अनेक संसदीय बहसें हों, अगर ये सब अंग्रेजी भाषा के उपनिवेश से लदे हैं, तो फिर क्या यह नहीं कहा जा सकता कि भारत खुद भारत का ही एक उपनिवेश है?

प्रश्न अब यह है कि आखिर क्या खराबी है हमारी भाषाओं में, उनमें रचे गए साहित्य, हमारी शिक्षा-प्रणाली में, जो हम किसी भी क्षेत्र में विश्व-स्तर के नहीं माने जाते? हमारी शिक्षा हो या साहित्य, शिक्षक हों या साहित्यकार, सभी को स्वयं हमने इतनी हिकारत से देखा कि उनमें हीनता भाव, आत्म-विश्वासहीनता समा गई। जब हमारा दिमाग ही एक प्रकार का उपनिवेशवादी संस्करण है, तो हम स्वयं से भी स्वतंत्र कहां हुए? भारतीय बौद्धिक का मन या तो उपनिवेशवादी है या अधिकार-ग्रस्त, प्रभाव-प्रमत्त सामंतवादी। जो लोग समाजवादी, मार्क्सवादी, प्रगतिवादी आदि वादों का तमगा गले में डाल कर जन-शिक्षा और लोक-साहित्य या यथार्थवादी, कलावादी खेमों के खंभे पकड़ कर खड़े हैं, वे अंदर से घोर सामंत हैं, अनुदार हैं और ऐसा लगता है जैसे वे ही साहित्य के तानाशाह हैं, जो अपने समर्थकों को छोड़ कर बाकी के लिए सदा किसी यंत्रणा-शिविर की कामना करते रहते हैं। चूंकि हमारे साहित्यकार सरकारी या प्राइवेट नौकरी करते हैं, तो उनका अफसरवाद, नौकरवाद उन्हें मुक्त होने ही नहीं देता। लगता है जैसे वे दफ्तरी फाइलों के अंदर भटक-भटक अपनी साहित्यिक उदारता ही खो बैठे हैं।

जहां तक शिक्षा का प्रश्न है, यहां हर स्तर पर विभाग-वाद और शिक्षकों के बीच पदों का वर्गवाद है। विभाग ही तो सबसे बड़ा उपनिवेश है, जो कुर्सी पर बैठ कर तरह-तरह के भय पैदा करता रहता है। शिक्षा की गर्दन ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यकाल से आज तक तरह-तरह के पदों की कुर्सियों में फंसी हुई है। शिक्षा को कुर्सी मुक्त करने के प्रयास स्वतंत्र भारत में राधाकृष्णन आयोग से लेकर आज तक होते रहे, मगर कुर्सीधारी आयोगों ने शिक्षा को कुर्सी-मुक्त नहीं किया। अब तो यह भी मान्यता फिर घर करने लगी है कि तथाकथित कुर्सी के उपनिवेश से मुक्त करने के बावजूद, पाठ्क्रमों में बदलावों के बावजूद, देश भर में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, संस्थानों का जाल बिछा देने के बावजूद, शिक्षा का रूप, उसकी गंध, उसकी गति, उसकी प्रगति सबमें ऐसा परिवर्तन क्यों नहीं हुआ कि जिससे यह लगता कि भारतीय शिक्षा एक महान लोकतंत्र के महान चिंतन और चिंतकों की शिक्षा है?

शिक्षा हो या साहित्य, सभी क्षेत्रों में लोकतंत्र की उस संस्कृति का अभाव है, जो हमारे संवेदनतंत्र को जाति, धर्म, वर्ग और विचारधारा की कैद से मुक्त करे। शिक्षा का स्तर अगर प्राथमिक से विश्वविद्यालय तक गिरा है, तो उसके पीछे शिक्षकों-प्राध्यापकों का अपने कर्म और कर्तव्य के प्रति वफादार और ईमानदार न होना है। हम कितने भी उदाहरण अमेरिका के नासा या सिलिकॉन वैली के दें, विदेश में भारतीय प्रतिभाओं के वर्चस्व की गौरव गाथा गाएं, सच तो यह है कि जिस देश में करोड़ों छात्र-छात्राएं हों, उस देश में एक करोड़ प्रतिभाएं भी ऐसी क्यों नहीं, जो अपने देश में रह कर देश के उत्थान में योगदान दें? कहा जा सकता है कि यहां उच्च नौकरियों का अभाव है, करिअर बनाने के मौके कम हैं, वेतनमान प्रतिभा के अनुरूप नहीं हैं, कामकाज में सरकारी और नौकरीशाही हस्तक्षेप या अड़ंगे अधिक हैं, सुविधाओं और साधनों का अभाव है, ऐसे में यहां रह कर क्या किया जाए? ‘एज्यूकेशन इन डिफिकल्ट सिचुएशंस’ को अपना कर कई देशों ने चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों से संघर्ष किया है, तभी जाकर कई गरीब, विकासमान और पिछड़े देश उन्नत हुए हैं, जिसके उदाहरण पूर्व सोवियत रूस, पूर्वी यूरोप के देश, चीन, क्यूबा, कोरिया, विएतनाम आदि रहे हैं। क्या वैसा समर्पण, वैसी शैक्षिक राष्ट्रीयता हमारे देश में पैदा हुई? हम शिक्षा से पद, प्रभाव और अधिकार तो चाहते हैं, मगर कर्तव्य, सेवा और कर्म नहीं चाहते। क्या यह हमारी उपनिवेशवादी सोच नहीं है?

कहा जाता है कि साहित्य सबके हित की संभावना रचता है। साहित्य हमें संवेदनशील, उदार, मानवीय और सृजनशील बनाता है। हम साहित्य में विचार रचते हैं, सौंदर्य, यथार्थ, कल्पना के अनेक रंग रचते हैं और भाषा को उसके नाना रूपों में प्रकट करते हैं। साहित्य अगर विराट संज्ञा है, तो उसके साथ साहित्यकार के ओछेपन, कट्टरपन और संकीर्णता के विशेषण क्यों जुड़े हुए हैं? उसका चिंतन और सृजन अगर सार्वभौम है, तो वह तरह-तरह के वादों के गली-कूचो में क्यों भटकता रहता है? जो वामपंथी है वह भी मनुष्य है, जो दक्षिण पंथी है वह भी मनुष्य है। अल्पसंख्यक हो, दलित हो, पिछड़ा हो या अगड़ा, सभी तो मनुष्य हैं। अगर समाज में शोषण है, असमानता, असंयम, असहिष्णुता और अन्याय-उत्पीड़न है, तो उसके विरोध में राजनीतिक, सामाजिक या लोकमंच हैं। साहित्यकार का काम वामपंथ या दक्षिण पंथ से राजनीतिक वफादारियां पैदा करना नहीं है। वे बजाय राजनीतिक नारेबाजी का साहित्य रचने के, किसी को संस्कृतिवादी और किसी को संस्कृति-विरोधी कहने का फतवा देने के, अगर श्रेष्ठ रचनाएं करें, समाज को भाषा, विचार, अध्ययन और अच्छे पाठक बनने के आयोजन, आंदोलन करें, पढ़े-लिखे वर्ग में छात्र-छात्रों से लेकर आम नागरिक तक अपना साहित्य पहुंचाएं और उन्हें पढ़ने के प्रति आकर्षित करें तो समाज अपने आप संवेदनशील बनेगा, सहिष्णु, भाषा और साहित्य का प्रेमी बनेगा।

साहित्यकार को पार्टीबाजी और सरकारी चापलूसी से ऊपर उठना होगा। पुरस्कारों-सम्मानों की प्रायोजित प्रतियोगिताओं से बाहर आना होगा। जब सम्मान या पुरस्कार लॉबिइंग से हासिल होते हैं, तो वह वफादारी का ईनाम हुआ, प्रतिभा को सम्मान कहां? ऐसा क्यों होता है कि जिस विचारधारा की सरकार होती है, उसके कार्यकाल में केवल उसकी विचारधारा के साहित्यकार ही पुरस्कृत होते हैं, चाहे वे कितने भी प्रतिभाहीन, स्तरहीन क्यों न हों। क्या ऐसा करना उसी मनोवृत्ति का परिचायक नहीं है, जो उपनिवेशकाल में थी जब राजा, महाराजा, सेठ-साहूकारों को रायसाहब या नाइटहुड की पदवी दी जाती थी। हमें पुरस्कारों के इस उपनिवेशवाद से भी मुक्त होना होगा और श्रेष्ठता का वह स्तर कायम करना होगा कि आप पुरस्कार तक दौड़ कर न जाएं, बल्कि पुरस्कार आप तक नम्रता से चल कर आए। शिक्षा और साहित्य अगर अपने उपनिवेशवादी सोच और कर्म से मुक्त हुए तो भारत एक सच्चा लोकतंत्र लगेगा, वरना ऐसा लगेगा जैसे भारत स्वयं अपना उपनिवेश है।

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