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बाखबर- सोची समझी नादानियां

ऐसी दीनता या मन की कि जनता का बजट और चैनलों ने जनता को मंगतों जैसा बना दिया। चार दिन पहले से जनता से पूछते रहे कि आपको क्या चाहिए, क्या उम्मीद करते हैं जेटली से, और मंगतों की तरह मांगते रहे कि जनता के नाम पर ये दे दे बाबा, वो दे दे बाबा!

Author February 4, 2018 8:16 AM
वित्त मंत्री अरुण जेटली।(फाइल फोटो)

जीत लिया भाई जीत लिया, अगला चुनाव जीत लिया। चार दिन तक आने वाले बजट का जयगान करने के बाद एक अंग्रेजी चैनल रो रहा था कि मधयवर्ग को कुछ नहीं दिया, उलटे चार फीसद उपकर लगा दिया! एक अंग्रेजी एंकर कह रहा था कि ‘मोदी केअर’ का आइडिया धांसू है, लेकिन इतनी बड़ी जनता के लिए सिर्फ दो हजार करोड़ से क्या होगा। मेडिकल बीमा कंपनियों की मानें तो एक लाख करोड़ चाहिए, तब सबको ‘मोदी केअर’ मिलेगी। दूसरा चैनल पूछे जा रहा था कि किसानों को राहत देना अच्छी बात है, लेकिन पैसा कहां से लाओगे? किसानों की परेशानी कहीं बड़ी है। टाइम्स नाउ के एंकर मध्यवर्ग के लिए मरे जाते थे कि मध्यवर्ग को कुछ नहीं दिया गया और अपने चेतन भगत जी कहे जाते थे कि जब भ्रष्टाचार खत्म हो गया, तब मध्यवर्ग को क्यों सताते हो? ऐसी दीनता या मन की कि जनता का बजट और चैनलों ने जनता को मंगतों जैसा बना दिया। उसके नाम पर चार दिन पहले से जनता से पूछते रहे कि आपको क्या चाहिए, क्या उम्मीद करते हैं जेटली से और मंगतों की तरह मांगते रहे कि जनता के नाम पर ये दे दे बाबा, वो दे दे बाबा! जेटली ने बजट में सत्तर फीसद हिंदी दी और सिर्फ तीस फीसद अंग्रेजी दी! हिंदी चैनलों ने इसे हाथों-हाथ लिया। पहली बार हिंदी चैनल बजट के लिए अंग्रेजी विशेषज्ञों पर निर्भर नहीं रहे और बजट की बेहतरीन हिंदी व्यख्या दे सके। हिंदी चैनलों के लिए यह ‘एक भाषा, एक बजट, एक नेशन’ की तरह आया! अगली सुबह एबीपी चैनल पर बजट सम्मेलन था, जिसमें मानव संसाधन मंत्री जावडेकर बजट पर विस्तार से बोले कि यह जनहितकारी बजट है। गरीब और किसानों का हितकारी है। किस तरह ‘मोदी केअर’ गरीबों को लाभ देने वाला है! मोदीजी की कथनी और करनी में फर्क नहीं होता। लेकिन इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने रामदेव के साथ ‘बजट संवाद’ दिखाया और बजट का आंकड़ा छाप बोरियत से पिंड छुड़ाया। बाबा रामदेव ने अपने ‘बजट योग’ में बजट की ‘हेल्थ केअर’ योजना का स्वागत किया! देखते-देखते बजट की ‘मेडिकल केअर’ योजना रामदेव छाप ‘आयुर्वेद केअर’ में बदल गई! उनको सुन कर लगा कि इस योजना का नाम ‘मोदी केअर’ की जगह ‘रामदेव केअर’ होता, तो शायद ज्यादा सही होता!

बजट से ऐन पहले रिवाज के अनुसार मुख्य आर्थिक सलाहकार ने देश की आर्थिकी पर जब एक लंबा-चौड़ा सर्वेक्षण दिया तब समझ में आया कि अर्थशास्त्र का विद्वान जब बोलता है तो इतना हिलता क्यों रहता है? हमें तो लगता है कि भरतनाट्यम् किए बिना अपने देश की जटिल आर्थिकी का परिचय नहीं दिया जा सकता। इस बीच राजस्थान में दो संसदीय और एक विधानसभा सीट कांग्रेस ने झटक ली थी, लेकिन बजट की खबर इस जीत को लील गई। सिर्फ एक हिंदी चैनल पर एक पत्रकार ने कांगे्रस प्रवक्ता से कहा कि अब तो आप राजस्थान जीत गए हैं। अब तो खुश हो जाइए! लेकिन खुशी प्रवक्ताओं के भाग्य में कहां?
बजट से दो दिन पहले राहुल ने ‘बरबरी’ की सत्तर हजार रुपए की एक जैकिट क्या पहन ली कि भाजपा प्रवक्ताओं की जगह एंकर ही पिल पड़े कि क्या यही है ‘सूट बूट की सरकार’ कहने वाले की परिणति? मेघालय की ठंड में क्या राहुल कच्छा-बनियान में जाते? एक भक्त चैनल का सुपर भक्त एंकर बजट आने के बाद स्टूडियो में गहरा नीला सूट पहन कर अपने ही सह-एंकर से पूछता रहा कि बजट पर विपक्ष की प्रतिक्रियाएं क्या हैं? राहुल ने क्या कहा? वह बोला कि राहुल पूछ रहे हैं कि नौकरियां कहां हैं? सीताराम येचुरी ने कहा, जुमला है। इस पर जोशीला भक्त बोला, ये सारी बातें एकदम बेकार और बेतुकी हैं, चिंदबरम की बात भी बेतुकी है। एंकर के एक झटके में सारा विपक्ष धराशायी होता नजर आया। इसे कहते हैं असली एंकरिंग!

बजट से पहले कासगंज खबरों में छाया रहा। एक से एक कटु-वचन-वीर कासगंज को अपने प्रिय घृणा-भाषणों से परिभाषित करते और चल देते। चैनल उनके घृण्य वचनों को ‘शॉकर’ कह कर ‘सम्मान’ देते और ‘हिंदू बरक्स मुसलमान’ और ‘इंडिया बरक्स पाकिस्तान’ की बहसों को दहकाने लगते। एक मुसलमान नेता आया और कई चैनलों में बोलता नजर आया कि एक और इसलामी राष्ट्र की मांग करनी चाहिए! और शुरू हो गई ‘देशभक्त’ बनाम ‘पाकिस्तान परस्त’ के बीच तू तू मैं मैं! इन दिनों सभी तरह का धर्म-तत्त्ववाद ज्यों का त्यों चैनलों में आ विराजता है और जनता का ध्रुवीकरण पैदा करता जाता है। इस पर भी एंकर महोदय पूछते रहते हैं कि कौन कर रहा है देश का ध्रुवीकरण? अरे भाई जी आप ही का चैनल तो बजा रहा है: ध्रुवीकरण ध्रुवीकरण! एक अंग्रेजी चैनल कासगंज के दो-दो वीडियो दिखाता रहा कि किस तरह मोटर साइकिल सवार हिंदुत्ववादी युवा तिरंगा रैली के लिए नारे लगाते हुए निकले। ये देखिए एक आदमी के हाथ में रिवॉल्वर है… बहस में रैलीपरस्त कहते थे कि जिसे गोली मारी गई, वह तिरंगे के लिए शहीद हुआ, उसे शहीद का दर्जा मिलना चाहिए। एक अंग्रेजी चैनल ने लाइन दी- उधर ‘अखलाक’ था तो इधर ‘चंदन’ है। एक दंगा कितना आसान! एक धार्मिक ध्रुवीकरण कितना आसान! एक चैनल ने लाइन दी: उधर ‘अखलाक’, इधर चंदन! हिसाब बराबर! ये आसानियां हैं कि सोची-समझी नादानियां हैं!

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