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साहित्य और आंदोलनधर्मिता – बैठे ठाले का शगल

मौजूदा दौर में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में आंदोलनों की अनुपस्थिति का एक बड़ा कारण हिंदी समाज की जड़ों से इसका उस तरह जुड़ाव न होना है जिस तरह तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयाली, मराठी और बांग्ला भाषा के साहित्य का उसके अपने समाज से है। आज हिंदी समाज की मुख्यधारा के बौद्धिकों द्वारा लेखन और विचार की न वैसी चुनौती दरपेश है और न वैसा जोखिम वे उठा रहे हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर।

साहित्य और कलाओं में वैचारिक आंदोलनों को सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों को रेखांकित, स्थापित करने के लिए आवश्यक उपादान की तरह देखा जाता रहा है। वैचारिक आंदोलनों ने साहित्य और कलाओं को अनेक बार नई दिशा दी है। मगर पिछले कुछ सालों से न सिर्फ हिंदी, बल्कि दुनिया की बहुत सारी भाषाओं में कोई साहित्यिक आंदोलन नहीं दिखाई देता। तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाना चाहिए कि साहित्य कहीं ठहर गया है, उसकी कोई दिशा नहीं है, वह सामाजिक सरोकारों, मानवीय मूल्यों से विमुख, स्वच्छंद हो चुका है? या इसके पीछे कोई और कारण हैं? इस बार की चर्चा इसी मुद्दे पर। – संपादक

हिंदी साहित्य का वर्तमान परिदृश्य इन दिनों जितना बहस-मुबाहिसों से रिक्त और हलचल विहीन है, उतना इसके पूर्व संभवत: कभी नहीं था। स्वाधीनता पूर्व के वर्षों में छायावाद बनाम प्रगतिवाद से लेकर ‘कला कला के लिए’ या ‘कला जीवन के लिए’ की बहसों ने हिंदी साहित्य को वैश्विक संदर्भों से जोड़ कर नया आयाम दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक प्रभाव के चलते जहां अस्तित्ववाद और आधुनिकता की बहसें तेज हुर्इं, वहीं मार्क्सवादी प्रभावों के चलते साहित्य में प्रगतिशीलता और प्रतिबद्धता भी नई साहित्यिक चेतना के संवाहक हुए। साठ के दशक में इलाहाबाद में परिमल और प्रगतिशील लेखक संघ के बीच वाद-विवाद और टकराहट के स्रोत भी इसी वैचारिकता के परिणाम थे। थोड़े बाद के वर्षों में नई कहानी, अकहानी, श्मशानी पीढ़ी, समांतर कहानी, नई कविता, अकविता सरीखे आंदोलनों ने भी अपने समय में एक हलचल पैदा की थी। सत्ता बनाम साहित्य, सेठाश्रय बनाम राज्याश्रय, व्यावसायिक बनाम लघु पत्रिका की बहसों ने भी प्रर्याप्त उत्तेजना का वातावरण उस दौर में सृजित किया था। भारत भवन की गतिविधियों ने भी अस्सी के दशक में साहित्यिक खेमेबंदी को वैचारिक संदर्भ प्रदान किए थे। लेकिन आज हिंदी साहित्य में न किसी साहित्यिक प्रवृत्ति या मुद्दे को लेकर गरमाहट है और न ही कोई आंदोलन।

हाल के वर्षों में जिन कुछ मुद्दों को लेकर विवाद और विरोध का वातावरण बना भी वे व्यक्तिगत आचरण और तात्कालिक उत्तेजना के अधिक रहे, वैचारिक और दीर्घकालिक महत्त्व के कम। यहां तक कि असहिष्णुता के विरुद्ध पुरस्कार वापसी की मुहिम भी हिंदी साहित्य समाज को प्रर्याप्त रूप से वैचारिक एकजुटता प्रदान करने में विफल रही। दलित और स्त्री विमर्श भी एक धरातल पा लेने के बाद हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में जैसे ठहर से गए हैं। हालांकि इस बीच दलित लेखकों ने अपनी पत्रिकाओं और मंचों द्वारा हाशिए के समाज के मुद्दों को नया विस्तार दिया है, लेकिन चिंता की बात है कि ज्यों ज्यों दलित लेखकों ने ‘स्वानुभूति बनाम सहानुभूति’ की बहस तेज करते हुए अपने लेखन को आक्रामक तेवरों से युक्त किया है, त्यों त्यों मुख्यधारा के गैर-दलित लेखकों द्वारा दलित मुद्दों पर लेखन का सिलसिला क्षीण होता जा रहा है। यह अनायास नहीं है कि विगत दो दशकों में गैर-दलित लेखकों द्वारा इक्का-दुक्का अपवाद को छोड़ कर न तो ‘हरिजन गाथा’ और ‘सिर पर मैला ढोती औरतें’ सरीखी कविताएं लिखी गर्इं और न ‘धरती धन न अपना’, ‘महाभोज’, ‘परिशिष्ट’ और ‘मोरी की र्इंट’ सरीखे दलित केंद्रित मुकम्मल उपन्यास ही। यह आशंका निर्मूल नहीं है कि प्रगतिशील आंदोलन ने वर्ग और जाति से मुक्त होकर लेखन की जिस प्रगतिशील परंपरा का सूत्रपात किया था, कहीं यह उसकी वापसी का दौर तो नहीं है! कहीं ऐसा तो नहीं कि मुख्यधारा के लेखक ‘डि-कास्ट’ और ‘डि-क्लास’ होने के बजाय अपनी जाति और वर्ग में वापस लौटने की प्रक्रिया में हैं! यह शंका इसलिए भी निर्मूल नहीं लगती, क्योंकि लक्ष्मणपुर बाथे, ऊना, सहारनपुर, कोरेगांव, खैरलांजी और मिर्चपुर के इस दौर में हिंदी की मुख्यधारा के लेखकों द्वारा सांप्रदायिकता के विरोध में तो विपुल लेखन किया गया, लेकिन दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार और प्रतिरोध के सामाजिक संदर्भ प्राय: नेपथ्य में ही रहे हैं। यह इसलिए भी ध्यान देने योग्य है, क्योंकि अन्य भारतीय भाषाओं, यहां तक कि अंग्रेजी में भी दलित मुद्दा रचनात्मक केंद्रीयता के साथ-साथ विमर्शकारी है। अरुंधति राय का तो यह तक कहना है कि भारतीय साहित्य में जाति शोषण के यथार्थ से विमुख होना उसी तरह का अंधत्व है जैसा दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए नस्लवाद का नकार।

दरअसल, सच यह भी है कि हिंदी साहित्य में सांप्रदायिकता विरोध को लेकर जो सर्वसहमति का भाव रहा है वह दलित मुद्दों को लेकर नहीं रहा है। यही कारण है कि जहां हिंदी साहित्य में ‘धर्मनिरपेक्षता’ का विमर्श निरापद है वहीं हिंदू धर्म के वर्णाश्रमी जातिभेद को प्रश्नांकित करना शुरू से ही जोखिम भरा रहा है। प्रेमचंद को इसीलिए ‘घृणा का प्रचारक’ कहा गया, तो निराला को ‘ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत’ होने का दंश झेलना पड़ा। बाबरी मस्जिद ध्वंस पर लिखित ‘आखिरी कलाम’ सरीखा उपन्यास हिंदी समाज में अगर अपेक्षित ‘खड़मंडल’ नहीं कर पाया तो इसका एक कारण धर्मनिरपेक्षता से आगे जाकर धर्म और ब्राह्मणवाद का इसके कथ्य में खुला प्रश्नांकन ही था। मौजूदा दौर में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में आंदोलनों की अनुपस्थिति का एक बड़ा कारण हिंदी समाज की जड़ों से इसका उस तरह न जुड़ा होना है जिस तरह तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयाली, मराठी और बांग्ला भाषा के साहित्य का उसके अपने समाज से है। आज हिंदी समाज की मुख्यधारा के बौद्धिकों द्वारा लेखन और विचार की न वैसी चुनौती दरपेश है और न वैसा जोखिम उठाना पड़ रहा है। आज अगर ‘मुर्दहिया’ और ‘जूठन’ सरीखी कृतियां वर्चस्वशाली ताकतों की नींद उड़ाती रहती हैं तो यह उनकी प्रतिरोधी विषय-वस्तु और सामर्थ्य का ही परिचायक है।
यहां यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि पहले हिंदी साहित्य के जिन मुद्दों को लेकर वैचारिक टकराहट थी और जो बहस-मुबाहिसों के प्रस्थान बिंदु थे, उन पर इन दिनों व्यावहारिक चुप्पी का भाव है। एक समय में कबीर और तुलसी को लेकर जो वैचारिक मुठभेड़ के संदर्भ थे, आज वे दृश्य ओझल हैं। कुछ विद्वान तो हाशिए के समाज के बीच कबीर की लोकप्रियता और तुलसी के प्रश्नांकन से इन दिनों इतने दुखी हैं कि अब वे विचार को परे रख कर सिर्फ ‘कविताई’ की कसौटी पर उनका मूल्यांकन करने के पक्षधर हैं। वे तुलसी के प्रतिगामी विचारों के आच्छादन के लिए कबीर में कुछ कमियां तलाश कर दोनों को समान धरातल पर प्रस्तुत कर देते हैं। साहित्य के रण में यह वैचारिक संदर्भविहीनता जहां आस्वादपरकता का नया स्वीकार है, वहीं जनपक्षधर साहित्यिक मूल्यों और प्रतिरोधी चेतना का नकार भी।

प्रेमचंद ने साहित्य की जिस कसौटी को बदला था, यह उसका प्रत्याख्यान भी है। यह यों ही नहीं है कि जहां एक ओर ‘प्रेमचंद की परंपरा’ को खारिज करने के प्रयास इस बीच तेज हुए, वहीं शताब्दी वर्ष में अज्ञेय के सर्वस्वीकार की मुहिम भी चलाई गई। यह सब वैचारिक प्रश्नों से मुक्त होकर ही किया जा सकता था। मुक्तिबोध शताब्दी वर्ष में मुक्तिबोध को उनकी वैचारिकी और ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ सरीखी चिंता को भुला कर ‘धूप, दीप, नैवेद्य’ की परंपरा में उनका उत्सवीकरण, मुक्तिबोध के वृहत्तर साहित्यिक-सामाजिक सरोकारों का नकार ही है। कहना न होगा कि सुखासीन अभिजन समाज साहित्य और संस्कृति को हमेशा बैठे ठाले का शगल बनाता रहा है। कभी-कभार वह जनतांत्रिकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खोल में आंदोलनकारी होने का छद्म भी रचता है, लेकिन प्रथम अवसर पर ही विचारधारा को खारिज कर वह अपनी हस्तिदंतमीनार की सुरक्षा में कैद हो जाता है। दरअसल, मुक्तिबोध जब ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने’ की बात करते थे या जब प्रेमचंद ‘साहित्य को समाज के आगे चलने वाली मशाल’ कहते थे, तो उनका आशय साहित्य की वृहत्तर सामाजिक भूमिका से ही था। यह भूमिका आंदोलनधर्मी भी थी और परिवर्तनकामी भी। स्वाधीनता आंदोलन अगर इसका प्रस्थानबिंदु था, तो भारतीय समाज के अंतर्विरोध इसके नियामक। आज बाजार का शोर और कॉरपोरेट संस्कृति का उत्सवीकरण साहित्य को उसके मूल वृहत्तर सरोकारों से विच्छिन्न कर किताब को ‘बेस्टसेलर’ और लेखक को ‘सेलेब्रिटी’ बनाने को उद्यत है। हिंदी साहित्य की इस सामाजिक विच्छिन्नता में ही समाहित हैं इसकी आंदोलन विहीनता के सूत्र। सच तो यह है कि जो साहित्य अपने समाज के अंतर्विरोधों से संबोधित नहीं है, वह अपनी आंतरिक टकराहटों के बल पर न आंदोलनात्मक हो सकता है और न दीर्घजीवी।

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