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प्रसंग : निजता का वैध-अवैध

सविता झा खान वैवाहिक बलात्कार विधेयक को लेकर तमाम चर्चा-परिचर्चाओं में निजता और राज्य के अधिकार क्षेत्र का द्वंद्व एक बार फिर सतह पर है। आखिर इस विधेयक को पारित कराने का क्या मकसद हो सकता है और इससे प्रभावित कौन-कौन होंगे? इसके प्रत्यक्ष प्रतिभागी हैं: स्त्री, पुरुष, राज्य, पति-पत्नी, परिवार, घर, समाज, संस्कृति, परंपरा, […]
Author May 24, 2015 12:16 pm

सविता झा खान

वैवाहिक बलात्कार विधेयक को लेकर तमाम चर्चा-परिचर्चाओं में निजता और राज्य के अधिकार क्षेत्र का द्वंद्व एक बार फिर सतह पर है। आखिर इस विधेयक को पारित कराने का क्या मकसद हो सकता है और इससे प्रभावित कौन-कौन होंगे? इसके प्रत्यक्ष प्रतिभागी हैं: स्त्री, पुरुष, राज्य, पति-पत्नी, परिवार, घर, समाज, संस्कृति, परंपरा, मान्यताएं, विवाह और बच्चे। दूसरा प्रश्न है कि इसका लक्ष्य क्या है: स्त्री को सशक्त बनाना, विवाह संस्था में सुधार, पुरुषों को दंडित करना, निजी और सार्वजनिक की दूरी को मिटाना, स्त्री देह का स्वामित्व पूरी तरह राज्य को देना या फिर भारतीय परंपरा में चली आ रही स्त्री-पुरुष पूरक की मान्यता को पलट कर स्त्री और पुरुष को सदा के लिए दो समांतर रेखाएं, पक्ष-विपक्ष बना देना? क्या स्त्रीवादी सोच यहीं जाकर ध्वस्त नहीं हो जाता है?

डीडी कोसंबी, राहुल सांकृत्यायन और देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय जैसे मनीषी जब पंथनिरपेक्षता, बुद्धिवाद और वैज्ञानिक प्रशिक्षण की तलाश में प्राचीन दार्शनिक परंपरा (लोकायत) को खंगालते नजर आते हैं तो जाहिर है कि प्राचीन दर्शन की समीचीन व्याख्या हो सकती है। फिर क्या जरूरी है कि हम विमर्श का संदर्भ सिर्फ वही बनाएं कि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े (पचहत्तर प्रतिशत विवाहित महिलाएं बलात्कार की शिकार रही हैं) क्या कहते हैं? क्या न्याय और स्त्री संदर्भ में हम सिर्फ आंकड़ों में उलझे और उलझते चले जाएं? क्या इन तथ्यों का स्रोत भी सवालों के घेरे में नहीं आ जाता? क्या कानून की नई और पाश्चात्य अवधारणा स्त्री मुक्ति की तलाश कर पाई है? अगर हां, तो देश में स्त्री सुरक्षा के नाम पर निर्भया जैसे कांड नहीं हो रहे होते और ऐसे मामलों में सजा की दर सिर्फ चार प्रतिशत (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो 2012) नहीं होती।

मामला कुल मिला कर वैसा ही जान पड़ता है, जैसा उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्री विमर्श के संदर्भ में हो रहा था, जहां स्त्री तो उपनिवेशवाद बनाम राष्ट्रवाद की बहस के हाशिये पर थी, पर विमर्श जारी रहा और कानून बनते रहे। उसका स्त्रियों को कितना फायदा मिला, बताने की जरूरत नहीं। क्या आज फिर संयुक्त राष्ट्र की संदेहास्पद पचहत्तर प्रतिशत वाले आंकड़े का जवाब हम भारतीय हिंदू विवाह को पवित्र बता कर वही टेक नहीं दोहरा रहे हैं! क्या पाश्चात्य सभ्यता ने लैंगिक विमर्श की दुकानदारी और समझ सिर्फ भारतीय स्त्रियों की असुरक्षा और बलात्कार पर टिका रखी है? यह तो वैश्विक समस्या है।

अगर मसला लैंगिक विमर्श पर संजीदा चिंतन का है, तो यहां सांख्य दर्शन की चर्चा समीचीन होगी। इस दर्शन ने अखिल भारतीय धर्म, कला, साहित्य, आयुर्विज्ञान और लैंगिक बनावट को प्रभावित करने में बड़ी भूमिका अदा की। यहां पुरुष और प्रकृति की अवधारणा दो पूर्ण स्वतंत्र यथार्थ के तौर पर की गई और प्रारंभिक भारतीय समाज में इस दर्शन के इर्द-गिर्द स्त्री-पुरुष की भूमिका को बांधा गया। मुक्ति का मार्ग भी दोनों का साथ-साथ निकलता है। तो क्या विवाह के दो अभिन्न अंगों का रास्ता मुक्तिद्वार तक अलग-अलग दिशा से जा सकता है?

बेचैनी के इस दौर में जब देह को संतुष्टि का एकमात्र साधन समझा जा रहा है, स्त्री बाजार और राज्य दोनों के लिए सबसे आसान माध्यम नजर आ रही है और इन दोनों पर काबिज तथा इनका सबल प्रतिनिधि पुरुष उसे सब्जी-भाजी जैसा समझ रहा है। ऐसा हो भी क्यों नहीं! स्त्री ने आखिर ना कहा किसे और कब? सहमति तो उसकी जन्म से लेकर विवाह तक कितनी बार ध्वस्त होती रही। वह बाजार, परिवार और संस्थाओं के सामने बिना स्वतंत्र सोच के, हमेशा स्वीकृति की मुद्रा में नजर आई। फिर घर की चारदीवारी में, पुरुष उसकी निजता को अचानक कैसे स्वीकार कर ले, जब उसे ‘कार्येषु दासी, शयनेषु रंभा’ के रूप में ही पत्नी दिखाई पड़ती हो? जब सप्तपदी के सारे शपथ एक-एक करके आज तार-तार हो रहे हों, तो फिर कानून, विवाह संस्था को ही अवैध क्यों न करार दे दे, सवाल यह भी है। पुरुष को दंडित करना ही एकमात्र लक्ष्य हो, तो इससे विवाह कैसे बच और सुधर जाएगा?

एक और आयाम इस विमर्श का हिस्सा है कि क्या यह कानून पितृसत्ता को चुनौती देकर उसे तोड़ेगा और स्त्रियों को परंपरा के चंगुल से मुक्ति दिलाएगा? लतामणि कहती हैं कि जब भी स्त्री अधिकार की चर्चा होगी तो वह अपने आप में परंपरा को बचाने के नाम पर पितृसत्ता को बढ़ावा और वैधता देगी। साथ ही आधुनिकता के नाम पर यह राज्य की शक्ति में असीम बढ़ोतरी करेगी। फिर सवाल है कि क्या हम निजता के परित्याग, सुरक्षा और स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर राज्य को एक दानव तो नहीं बना रहे, जो नागरिक व्यभिचार में वैसे ही कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा? क्या यही अभी राज्य के ‘भारतीय विवाह पवित्र’ पद में दिखाई नहीं दे रहा? दरअसल, यह परंपरा और पितृसत्ता का समवेत बचाव पक्ष है।

सवाल यह भी है कि विवाह जैसी संस्था, जो निजी संपत्ति और राज्य के वितरण, संतति की वैधता और उत्तराधिकार आदि के लिए एक नियामक संस्था और सामाजिक-आर्थिक इकाई के तौर पर काम कर रही है तो उसमें सुधार के बजाय ऐसे कानूनों के जरिए आखिर हम क्या हासिल करना चाहते हैं। किसी भी कानून का औचित्य उसकी समीचीनता, उपयोगिता और जमीनी हकीकत से होना चाहिए। (यहां न्याय-वैशेषिक के संदर्भ की चर्चा उचित रहेगी, जो व्यवहार में उतरे ज्ञान को अपने आप में संपूर्ण मानता है, उसे किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं होती)।

अभी तक तो हमने अपनी बेटियों से यह नहीं कहा कि बाप भी व्यभिचारी हो तो उसके हाथ-पांव तोड़ दो, इसके कानूनी प्रावधान भी नहीं बनाए। सहजीवन (जो आजकल शहरों में जीवन की नई पद्धति के तौर पर उभर रही है) में हो रहे अतिक्रमण को भी सामने नहीं लाया गया। विवाह असहज, अस्वीकार्य हो तो शुरू में ही सहमति मत दो, बीच में ही तोड़ दो। तलाक लेकर भी स्वछंद और सहज महसूस कर सकती हो। फिर वह बलात्कार को साबित करने का दम कहां से दिखा पाएगी, वह भी जब वह पति-परमेश्वर द्वारा किया गया हो! विवाह उसके बाद रहेगा या टूटेगा?

इन सबके बीच बच्चे क्या कर रहे होंगे? बलात्कार करने या बलात्कार से बचने की तैयारी? आने वाली पीढ़ी आखिर विवाह को एक बलात्कार संस्था क्यों नहीं मानेगी? फिर विकल्प क्या होंगे? क्या यह सब सोचना हमारा कर्तव्य नहीं होना चाहिए? क्या समाज इस विकट संक्रमण के दौर में तमाम तरह के रिश्तों का अतिक्रमण करता हुआ, बौखलाया-सा और दिशाहीन नहीं लग रहा? क्या यह सिर्फ भारतीय राज्य का दायित्व है कि इन व्यापक विमर्शों पर ढाल लिए हुए हांफता नजर आए? अगर एक पल को उसे ऐसा करने के योग्य भी समझ लिया जाए, तो यह वाजिब नहीं लगता।

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