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अप्रासंगिक : विवादास्पद का पक्ष

अपूर्वानंद आइआइटी-मद्रास में आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल (एपीसीएस) की मान्यता रद्द करने के प्रशासन के निर्णय पर बहस हो रही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस समूह पर घृणा प्रचार का आरोप लगाती एक बेनामी शिकायत संस्थान को इस अनाम टिप्पणी के साथ भेजी कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आइआइटी का ऐसा इस्तेमाल हो रहा […]

Author May 31, 2015 4:03 PM

अपूर्वानंद

आइआइटी-मद्रास में आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल (एपीसीएस) की मान्यता रद्द करने के प्रशासन के निर्णय पर बहस हो रही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस समूह पर घृणा प्रचार का आरोप लगाती एक बेनामी शिकायत संस्थान को इस अनाम टिप्पणी के साथ भेजी कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आइआइटी का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है। प्रशासन ने आव देखा न ताव, एपीसीएस की मान्यता रद्द कर दी। हालांकि बाद में उसने कहा कि यह एक अस्थायी कार्रवाई है और समूह का पक्ष सुन कर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। ‘टेलीग्राफ’ ने बताया कि केंद्रीय सतर्कता आयोग का निर्देश है कि किसी भी बेनामी शिकायत का मंत्रालय या विभाग संज्ञान न लें। तो मंत्रालय का यह कदम ही नियमविरुद्ध था। दूसरे, मंत्रालय के पत्र पर बिना किसी स्थानीय जांच की प्रक्रिया के आइआइटी-मद्रास का यह अति उत्साहपूर्ण अनुशासनात्मक कदम दरअसल रघुवीर सहाय की याद दिलाता है जिन्होंने ऐसा दिमाग खोज लाने को कहा था जो आदतन खुशामद न करता हो।

यह मानने का कारण और प्रमाण नहीं है कि मंत्री ने यह निर्देश दिया होगा। आखिर एके रामानुजन के निबंध को पाठ्य-सूची से हटाने का फैसला दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत-परिषद ने किसी मंत्रालय के निर्देश पर नहीं किया था। परिसरों को अधिक से अधिक विवादरहित रखने की शैक्षिक प्रशासकों की प्रवृत्ति का ही सबसे ताजा उदाहरण आइआइटी-मद्रास ने पेश किया है।

परिसर शांत रहें, अपने मां-बाप और राज्य के खुद पर किए गए निवेश के सदुपयोग के लिए छात्र ज्ञानार्जन में ध्यान लगाएं और राजनीतिक या विचलनकारी गतिविधियों में हिस्सा न लें, यह आम समझ है। इधर उच्च शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘एम्पलॉयबिलिटी’ घोषित किए जाने के बाद से यह फिक्र और बढ़ गई है कि छात्र अपना वक्त फालतू के कामों में बर्बाद न करें। इस स्तंभ में कभी सीवी रमण और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के दीक्षांत भाषणों की प्रेमचंद द्वारा की गई तुलना का जिक्र किया गया था जिसमें लेखक ने वैज्ञानिक के भाषण को इसलिए निराशाजनक बताया था कि वह छात्रों को अनुशासित दायरे में रखने की वकालत भर था।

ये फालतू के काम क्या हैं? मसलन, आजादी के आंदोलन के दौरान छात्रों से कक्षाओं से निकल आने की अपील खुद गांधी ने की थी। पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक में एक मुक्तिकारी स्वप्न के आकर्षण में अपनी कक्षाओं के सबसे प्रतिभाशाली छात्र परिसरों के इत्मीनान से निकल कर हथियारबंद संघर्ष में कूद पड़े थे। इसी वक्त प्राय: सारी दुनिया में परिसर छात्र-प्रतिरोध के केंद्र बन गए थे। विएतनाम का मुक्ति-संग्राम सिर्फ उसका नहीं है, संपूर्ण मनुष्यता का है, यह परिसरों में गूंजते नारों ने ही बताया था। और आपातकाल में या उसके पहले के छात्र आंदोलन की बात करने की जरूरत ही क्या!

कुछ वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलानुशासक के दफ्तर से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के एक आंदोलन में शामिल शिक्षकों की भूमिका के बारे में पूछते हुए उनके पास फोन आया। तब कई शिक्षकों ने एक अपील की थी कि परिसर में निर्माण-कार्य में लगे हुए श्रमिकों के हक के लिए आंदोलनरत छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को जेएनयू प्रशासन वापस ले ले। परिसर में विवाद करने वाले छात्रों को अपने शिक्षकों का समर्थन मिलते देख विश्वविद्यालय विचलित हो उठे।

परिसरों में भवन बनाते मजदूरों को देखते सब हैं या उसकी सुरक्षा में लगे कर्मियों के बगल से गुजरते हैं, लेकिन कुछ ही ऐसे छात्र होते हैं जो यह जानकर कि इन्हें पूरी दिहाड़ी नहीं मिल रही या इनके साथ बेईमानी हो रही है, विश्वविद्यालय को परिसर में न्यूनतम मजदूरी के संवैधानिक अधिकार के पालन की उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाने की मुहिम छेड़ देते हैं। अंकउगाहू छात्र इन सिरफिरों को विस्मय से देखते हैं और कुंजियों में सिर गाड़ लेते हैं।

अब प्रयास यह हो रहा है कि छात्र ऐसे गैर-शैक्षणिक भटकावों के शिकार न हों। वे ‘एक्स्ट्रा-कर्रिकुलर’ गतिविधियों में तो भाग लें जो ‘पर्सनालिटी-डेवलपमेंट’ में मददगार हैं, जिनमें वाद-विवाद प्रतियोगिताएं सबसे ऊपर हैं, जिनका मकसद छात्रों को वाक्पटु बनाना है, लेकिन विवादास्पद मुद्दों में समय व्यर्थ न करें! वाक्पटु छात्र जो किसी भी मत के पक्ष या विपक्ष में जोरदार तर्क कर सके, लेकिन यह वह तय न करे कि उसका पक्ष कौन होगा। पक्ष उसे दिया जाएगा और उसका काम उसके लिए तर्क जुटाने का या अपनी वाग्मिता के सहारे उनका सिक्का जमाने भर का है, क्योंकि तर्क भी उसे दे दिए जाएंगे। फिर भी सारी कोशिशों के बावजूद ऐसे छात्र निकल आते हैं जो अपना पक्ष तय करने का हक मांगते हैं और वर्चस्वशाली सत्ता से विवाद के तर्क भी खुद जुटाते हैं।

जाहिर है, वही पक्ष विवादास्पद होगा जो प्रभुत्वशाली सत्ता के खिलाफ है। अमेरिका में यह फिलस्तीनियों के हक का पक्ष है या ‘मुक्त’ बाजार का विरोधी पक्ष, ईरान में वह इस्लामी कट्टरताविरोधी मत है, वह भारत में विवादास्पद या तो दलित पक्ष होता है या अल्पसंख्यक या स्त्री पक्ष। कुछ वर्ष पहले आइआइटी और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के खिलाफ जब सवर्ण छात्रों ने आंदोलन किया तो उसे घृणा फैलाने वाला नहीं माना गया, बल्कि प्रशासन ने उस आंदोलन को प्रश्रय और संरक्षण दिया। जबकि उस आंदोलन में खुलेआम दलितों और पिछड़ों के खिलाफ बातें कही गईं, उन पर फब्तियां कसी गईं और भद््दे मजाक प्रचारित किए गए। इस ओर ध्यान दिलाने पर कहा गया कि यह अपने साथ अन्याय के अहसास के चलते प्रतिभाशाली छात्रों में पैदा हुए सहज क्षोभ की अभिव्यक्ति है और इसे घृणा-प्रचार नहीं माना जाना चाहिए।

इस साल की शुरुआत में कैलिफोर्निया के पित्जर कॉलेज में ‘पित्जर स्टूडेंट्स फॉर जस्टिस इन पेलेस्टाइन’ ने परिसर में इजराइल की ‘अपार्थाइड वॉल’ की अनुकृति लगाने की अनुमति मांगी। इसके माध्यम से वे इजराइल की फिलस्तीन-विरोधी नीतियों के प्रति परिसर को शिक्षित करना चाहते थे। कॉलेज प्रशासन ने दो आधारों पर अनुमति नहीं दी। इसे कॉलेज की ‘एस्थेटिक्स कमिटी’ ने परिसर के सौंदर्यपूर्ण सामंजस्य में बाधा बताया और प्रशासन ने आशंका जताई कि यह प्रदर्शन यहूदी-विरोधी कृत्य हो सकता है। इस तरह इसे यहूदी-विरोधी घृणा-प्रचार मान कर इसकी अनुमति नहीं दी गई।

‘पेलेस्टाइन सॉलिडैरिटी लीगल सपोर्ट’ (पीएसएलएस) ने पित्जर कॉलेज के इस निर्णय को चुनौती दी और उसे याद दिलाया कि प्रदर्शन की अनुमति न देने वाले खत में उसने लिखा है कि कॉलेज मुक्त वैचारिक अन्वेषण और ज्ञान के सामूहिक संधान के लिए संकल्पबद्ध और बंधनहीन उन्मुक्त अभिव्यक्ति की हिफाजत के लिए प्रतिबद्ध है। फिर वह इस प्रदर्शन को मना कैसे कर सकता है? पीएसएलएस ने लिखा कि नागरिकों की अभिव्यक्ति के अधिकार की हिफाजत करने वाला अमेरिका का ‘फर्स्ट अमेंडमेंट’ कॉलेज परिसर में स्थगित नहीं हो जाता।

इक्कीसवीं सदी के परिसर बीती सदी के इत्मीनान से बहुत अलग किस्म की बेचैनियों से भर गए हैं। वे दावा नहीं कर सकते कि वे छात्रों को जिन अनुशासनों में दीक्षित कर रहे हैं, वे उनके जीवनयापन में सदा उपयोगी रहेंगे। राष्ट्र के साथ-साथ पूंंजी का दबाव उन पर बढ़ता जा रहा है कि वे उन्हें अनुशासित, लचीले और निरंतर उत्पादक कार्यबल की आपूर्ति करें। ऐसी स्थिति में छात्रों या अध्यापकों का राजनीतिक होना एक ही संदर्भ में स्वीकार्य है कि वे राष्ट्रवादी या विकासवादी राजनीति करें। कोई भी दूसरी राजनीति स्वभावतया विभाजनकारी, विवादास्पद और इसलिए घृणा-प्रचार के दायरे में आ जाएगी।

इन परिसरों के प्रमुख उस दौर के नहीं हैं जो स्वतंत्रता का अभ्यासी था। वे अपना कॅरियर ज्ञानार्जन में नहीं, प्रशासन में देखते हैं, इसलिए विचारमुक्त अनुशासन में विश्वास भी करते हैं। वे खुद सत्ता के द्वारा अनुशासित हैं, वरना यह कैसे मुमकिन था कि देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय का प्रमुख, जो अपने सहकर्मियों और छात्रों की गुहार, अपील, प्रतिरोध के बावजूद अडिग रहा, मंत्रालय के हुक्म पर अपने फैसले को बदलने को ही तैयार न हुआ, आगे उसके हर हुक्म की तामील करने में पेश-पेश रहने लगा, चाहे दो अक्तूबर को झाड़ू उठाना हो या पटेल जयंती पर दौड़ लगानी हो या बड़े दिन को सुशासन दिवस मनाना हो। रघुवीर सहाय आदतन खुशामद न करने वाला दिमाग तलाश रहे थे। वह खोज परिसरों के प्रशासन के संदर्भ में व्यर्थ है, यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है।

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