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बाख़बर : कुछ सांस्कृतिक अमर्ष

कांग्रेस की मनचीती हुई। बिना किसी विवाद के प्रियंका की राजनीति में एंट्री हो गई। चैनलों ने बिना किसी प्रश्न के लाइनें लगार्इं कि यूपी में सपा-कांग्रेस के समझौते के पीछे प्रियंका का हाथ है!

Author नई दिल्ली | January 29, 2017 4:03 AM
जल्लीकट्टू तमिलनाडु में पोंगल के त्योहार के हिस्से के तौर पर मट्टू पोंगल के दिन आयोजित किया जाता है। (फाइल फोटो)

जल्लीकट्टू हुआ। कल्चर जीती, कानून देखता रह गया। भीड़ जीती कि उसे जिताया गया? चैनलों को लगा कि वे जीते। उत्साहित चैनलों ने लाइन मारी कि कल्चर जीती। तमिल प्राइड जीता। सेलीब्रेट करो। जब वे सेलीबे्रट करने नहीं गए, तो पुलिस की ज्यादती को बताने लगे! चैनलों ने नजर फेरी तो जल्लीकट््टू फोकस से बाहर हुई! लेकिन ‘स्पर्धात्मक अंध-संस्कृतिवाद’ के मुंह खून लग गया। तुरंत कर्नाटक को अपनी कल्चर की याद आई और चैनलों ने दिखाना शुरू किया कि लोग कंबला की कल्चर मांग रहे हैं। कंबला यानी बैलों की जोड़ी की दौड़! जब किसी राज्य का सीएम खुद कहे कि हमें कंबला की कल्चर चाहिए, यह हमारी कल्चर है, तो आंदोलन क्यों न खड़ा हो! सो, आंदोलन-सा दिखाई देने लगा है। हजारों-हजार युवा चेहरे कंबला के लिए मचलते दिखने लगे। लोग कहते दिखे कि तमिलनाडु में जल्लीकट््टू बहाल किया जा सकता है, तो हमको क्यों नहीं? ‘बहादुर सरकार’ भीड़ों के आगे इसी तरह झुकने लगी, तो कानून का राज तो चल लिया! कल्चर की बात चली, तो असली घी की बात कैसे पीछे रह सकती थी? सो, असली घी की बात चलने लगी। सबसे पहले अखिलेश यादव ने एलान किया- यूपी में एक किलो प्रति महीने मिली करेगा। इसकी महक पंजाब पहुंची, तो वहां एलान हुआ कि पंजाब में भी असली घी दिया जाएगा!

कांग्रेस की मनचीती हुई। बिना किसी विवाद के प्रिंयका की राजनीति में एंट्री हो गई। चैनलों ने बिना किसी प्रश्न के लाइनें लगार्इं कि यूपी में सपा-कांग्रेस के समझौते के पीछे प्रियंका का हाथ है! एक ही दिन, एक ही शहर जलंधर में दो-दो महारथी- एक ओर राहुल, दूसरी ओर मोदीजी और एक से एक जोरदार भाषण! पहले राहुल बोले। जितनी देर बोले, गुस्से में अधिक बोले! इसलिए बेहद बेमजा रहे। राहुल जब शांत होकर चुटकी लेते हुए बोलते हैं तभी मजेदार बोलते हैं, सुने-सराहे भी जाते हैं, लेकिन गुस्से में बोलते हैं तो बेकार हो जाते हैं।
मोदीजी बोले तो अपने गर्जन-तर्जन वाले अंदाज में बोले! मगर ताली एकाध बार ही सुनाई पड़ी! मोदी-मोदी का कोरस भी सिर्फ दो-तीन बार सुनाई पड़ा, वह भी तब जब नोटबंदी की चर्चा की! जब कहा कि ‘ये मोदी है, जो किसी के खिलाफ झुकता नहीं है’, तो इस पर सबसे ज्यादा ताली बजी और मोदी-मोदी के नारे लगे!

एक चैनल का नया सर्वे! सर्वे में ज्यादातर सवाल मोदी केंद्रित थे। एंकर चहकता रहा कि मोदी का जादू बरकरार है। तीन साल बाद भी उनकी छवि जस की तस बनी हुई है। अगर आज चुनाव हो जाएं, तो तीन सौ साठ सीटें मिल सकती हैं। अब तक के सर्वोत्तम पीएम मोदी ही हैं। उन्नीस के चुनाव भी पीएम जीतेंगे, क्योंकि किसी के पास मोदी का विकल्प नहीं है! पैंसठ फीसद लोगों की नजर में मोदी अगले सर्वाेत्तम पीएम हैं! सर्वे की व्याख्या हो रही थी कि भविष्यवाणी की जा रही थी? यह समझ से परे था!आसन्न पांच राज्यों की जनता क्या सोच रही है, इसे बताने की जगह अभी से सन उन्नीस का नजीता निकाल दिया है! एंकर बोला कि इसका कारण टीना फैक्टर, यानी विकल्पहीनता है। पीएम की ताकत सोशल मीडिया में है। इस कथा की प्रति-कथा कैसे बने, यही समस्या है? इससे पहले एक मंत्रीजी से एंकरजी झाड़ खा चुके थे और कथन वापसी की मांग करने लगे थे। इसके बाद की चर्चा में एंकर मोदी को दबंग लीडर बताने लगे!

कल्चर की बात चली तो ओवैसी अपनी फार्म में आए और एक चैनल पर आकर कहने लगे कि तमिल जनता ने कल्चर की बात की, सबको अपनी कल्चर की चिंता करनी चाहिए!
लेकिन जिस तरह एक भाजपा नेता ने फिल्मी आलोचना के क्षेत्र में अपना हाथ आजमाया, उसे देख कर लगता है कि आगे से फिल्मी आलोचकों को अपनी दुकान बंद कर लेनी चाहिए, क्योंकि अब इस फील्ड में भाजपा के एक नेता सबसे बड़े फिल्म आलोचक बन कर मैदान में आए हैं। आते ही कहा कि शाहरुख की ‘रईस’ के मुकाबले रितिक रोशन की ‘काबिल’ देशभक्ति की पिक्चर है! सब चैनलों पर उनकी समीक्षा छाई रही। आलोचक चर्चा करते रहे। अब मसंद आदि को अपनी दुकान बढ़ा लेनी चाहिए, क्योंकि आगे से पिक्चरों की समीक्षाएं सांप्रदायिक तेवर में ही हुआ करेंगी!

जब बड़ी खबरें नही बनतीं, तो उनकी जगह फुटकल खबरें लेती हैं। ऐसी दो फुटकल खबरें अपेक्षित चर्चा का विषय नहीं बन पार्इं। एक खबर मेघालय के महामहिम राज्यपाल संबंधी रही। राज्यपाल को लेकर एक चैनल ने कांग्रेस के मार्फत लाइन लगाई: मेघालय के राजभवन को ‘रासलीला भवन’ बना दिया गया है! कैसा आश्चर्य कि ऐसा आरोपित ‘कदाचार’ और चैनल इस पर अटके तक नहीं। ‘शिवसेना ने भाजपा से नाता तोड़ा’ निश्चय ही एक बड़ी झटके वाली खबर थी! एक चैनल पर तो उद्धव ठाकरे मराठी में ललकारते दिखाए गए थे, लेकिन अवसर होते हुए भी इस गठबंधन के टूटने की चर्चाएं जम के नहीं जमाई गर्इं! किस कारण साथी?

‘ब्लेकबक’ के केस में सलमान, सैफ अली खान, तब्बू, नीलम आदि कई एक्टर फिर से राजस्थान के कोर्ट में हाजिर थे। चैनल कवरेज में लगे थे, लेकिन जैसा शो सलमान के पिछली हाजिरी पर दिखा, वैसा इस बार और उतनी देर नहीं दिखा! दो चैनल बजट से पूर्व बजट की भूमिका जमाए जा रहे हैं। एक चैनल अपने चुनिंदा नागरिकों को बुला कर उनको वित्तमंत्री का मुखौटा लगवाते हैं कि वित्तमंत्री से उनको क्या उम्मीदें हैं? जिस वक्त बजट की ड्राफ्टिंग लगभग खत्म हो चुकी हो और अनुमानत: वह छपने की प्रक्रिया में हो, तब उसके बारे में सुझाव दिला कर किस जनता को बनाते और भरमाते हैं आप?

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