ताज़ा खबर
 

जगमोहन सिंह राजपूत : अंकों की दौड़ में प्रतिभा का अवमूूूल्यन

अगर इस प्रकार के स्कूल स्थापित हों और लगातार इनकी संख्या बढ़ती रहे तो अनेक दृष्टिकोण परिवर्तन संभव हो सकेंगे।

प्रतिकात्मक तस्वीर

हर साल की तरह इस बार भी बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित और चर्चित हुए। एक तरफ ऊंचे और अच्छे अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी और उनके परिवार सफलता का समारोह पूर्वक आनंद लेते हैं, तो दूसरी तरफ अधिकतर विद्यार्थी जो उम्मीद के अनुरूप अंक और श्रेणी प्राप्त नहीं कर पाते, अनेक बार हताशा की स्थिति में पहुंच जाते हैं। अवसाद की यह अवस्था उन्हें अनेक वर्षों तक घेरे रह सकती है और आत्महत्या तक के प्रकरण इसी का परिणाम होते हैं।

इधर एक अन्य आश्चर्यजनक स्थिति यह आई है कि अवसाद की अवस्था में पहुंचने वालों में वे विद्यार्थी भी शामिल हैं, जिन्होंने परीक्षा में प्रथम श्रेणी और उसमें भी काफी ऊपर अंक प्राप्त किए होते हैं, मगर जानते हैं कि अब इन अंकों में भी उन्हें उच्च शिक्षा में अपने मनचाहे पाठ्यक्रम या संस्था में प्रवेश दिलाने का दम नहीं बचा है। आज से पचास साल पहले प्रथम श्रेणी प्राप्त करना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, मगर आज उपलब्धि तब मानी जाती है जब बच्चे के अंक अट्ठानबे-निन्यानबे प्रतिशत से अधिक हों! ऐसी स्थिति में भी यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसे विद्यार्थी को वह महाविद्यालय या विश्वविद्यालय मिल ही जाएगा, जिसमें वह प्रवेश चाहता है!

इधर अधिक अंक प्राप्त करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इससे अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा हो रही हैं, जिनमें सबसे प्रमुख उच्च और व्यावसायिक शिक्षा में प्रवेश प्राप्त करने को लेकर पैदा हो रही हैं। बड़ा प्रश्न यह है कि इसके समाधान के लिए क्या किया जा सकता है? सबसे पहले सीबीएसइ को लेकर चर्चा करना तर्कसंगत होगा, क्योंकि इसी बोर्ड से देश के सारे अन्य बोर्ड दिशा-निर्देश और प्रेरणा लेते हैं। इसकी अपनी साख बची हुई है और इसके स्तर को सारे देश में सराहा जाता है। यह अपेक्षा की जाती है कि शिक्षा के क्षेत्र में जो कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया होगा, उपयोगी होगा, सीबीएसइ उसका अध्ययन करेगा और अपने पाठ्यक्रम में उचित परिवर्तन करेगा तथा अन्य बोर्डों के सामने उसे विचार के लिए प्रस्तुत करेगा। अपेक्षा तो यही है कि एनसीइआरटी जैसी संस्थाओं से संपर्क स्थापित कर सीबीएसइ शैक्षिक समस्याओं का समाधान निकालने के लिए नवाचार, शोध और सर्वेक्षण करेगा तथा अन्य को करने को प्रेरित करेगा। 2004 के बाद यह संस्था नौकरशाही के आधिपत्य में ही चली है और इसके अपने मूल और मुख्य उद्देश्य इसी के सामने धुंधले हो गए हैं।

इधर इस संस्था को राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रकार की प्रवेश और योग्यता परीक्षाएं लेने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। स्पष्ट है कि इसका ध्यान इन्हीं पर अधिक केंद्रित होकर रह गया है, जिससे उसके निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति में बाधा पड़ी है। इसकी अपनी परीक्षा को लेकर इस पर 2004 के बाद मंत्रालय से लगातार दबाव डाला गया कि बच्चों पर ‘बस्ते का बोझ’ कम किया जाए, परीक्षा के महीनों पहले से जो तनाव बच्चों पर आ जाता है उसे भी कम किया जाए। इस सब पर शैक्षिक और शोध आधारित फैसले करने के स्थान पर सीबीएसइ ने सबसे अधिक अपेक्षित परिणाम देने वाला रास्ता चुना- उसने ऐसे प्रश्नपत्र तैयार कराए, जिन्हें बिना तनाव के हल किया जा सके! उसी निर्णय का परिणाम है कि बोर्ड परीक्षा में अब नब्बे प्रतिशत से ऊपर अंकों की चमक फीकी पड़ गई है। इसके अनेक प्रकार के अस्वीकार्य प्रभाव पड़ रहे हैं। ट्यूशन पर जोर बढ़ा है और कोचिंग संस्थान चांदी काट रहे हैं, जिनमें गए बच्चे लगातार आत्महत्याएं करने को मजबूर हो रहे हैं।

परीक्षा परिणामों के बाद मीडिया आनन-फानन ‘टापर्स’ के घर पहुंचता है। केवल अंकों को ही संपूर्ण शिक्षा मान कर वह यह पूरी तरह भुला देता है कि प्रथम स्थान पाने वाला ही सर्वश्रेठ विकसित व्यक्तित्व का उदाहरण भी हो ऐसा आवश्यक नहीं है। सीबीएसइ इस दिशा में कार्य कर सकता है कि श्रेष्ठता का आधार केवल अंक नहीं होंगे, व्यक्तित्व विकास के अन्य आयाम भी इसमें योगदान करेंगे और हो सकता है केवल सत्तर-पचहत्तर प्रतिशत अंक पाने वाला सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व का धनी हो, मगर अपनी रुचि के क्षेत्र जैसे संगीत, खेल, साहित्य में अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर चुका हो, जिसका आचार, विचार, व्यवहार सर्वप्रिय रहा हो! उसे ही टॉपर क्यों न घोषित किया जाए!

ऐसा करने के लिए ठोस अकादमिक और शैक्षिक आधार के साथ-साथ पूर्ण व्यक्तित्व विकास के अनेक आयामों को भी निर्मित कर महत्त्व देना होगा। वैसे उन बच्चों को आवश्यक सुविधाएं देने का प्रावधान प्रारंभ से ही होना चाहिए, जिनकी विशेष रुचि खेलों में, संगीत, साहित्य, कलाओं और हस्त कौशल में पहचानी जा चुकी हो। देश को हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली युवाओं की आवश्यकता है और ऐसी प्रतिभाओं के विकास को हतोत्साहित करने वाली अधिक अंकों की दौड़ से बचाना ही होगा। इसके लिए देश में संगीत स्कूल, भौतिकी स्कूल, कविता स्कूल, कला स्कूल, और ऐसे ही विषयों के नवोदय विद्यालय की संरचना के आधार पर विशेष स्कूल खोल कर प्रतिभावान बच्चों को वहां लाकर उनका पूरा भार उठाना चाहिए।

यहां बच्चे स्कूल बोर्ड का सारा पाठ्यक्रम वैसे ही पढ़ेंगे जैसे अन्य स्कूलों में पढ़ाया जाता है। इसके साथ-साथ वे अपनी रुच विशेष के क्षेत्र में अलग से प्रवीणता हासिल करने की सब सुविधाएं भी प्राप्त कर सकेंगे। अगर देश में पांच वर्ष तक प्रतिवर्ष ऐसे सौ स्कूल खोलें जाएं तो इसके दूरगामी सार्थक परिणाम कुछ ही वर्षों में सबके सामने होंगे। इन चयनित बच्चों को नवाचार करने, प्रयोग करने, मूर्धन्य विद्वानों से संपर्क करने के अवसर आसानी से प्रदान किए जा सकते हैं। इनकी जिज्ञासु प्रवृत्ति को पंख मिलेंगे और इनकी सर्जनात्मकता अंकों के बोझ तले दब कर पंगु नहीं होगी।

प्रतिभा विकास के लिए वातानुकूलित स्कूल और बसों की आवश्यकता नहीं होती, उसके लिए पसीना बहाने की क्षमता को पहले विकसित करना होता है। समाज के हर तबके को जानने, समझने और उससे संवेदनात्मक स्तर पर जुड़ने की आवश्यकता भी चाहिए। एक अच्छे स्तर पर केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय इसकी पुष्टि करते हैं। इस समय देश को इस से अधिक सुविधा-संपन्न विद्यालयों की कोई आवश्यकता नहीं है। चुनौती तो यह है कि हर सरकारी स्कूल को इस स्तर तक लाया जाए।

अगर इस प्रकार के स्कूल स्थापित हों और लगातार इनकी संख्या बढ़ती रहे तो अनेक दृष्टिकोण परिवर्तन संभव हो सकेंगे। माता-पिता मेडिकल, इंजीनियरिंग, सिविल सर्विस के अलावा अन्य विकल्प भी तलाशेंगे। वे अपनी महत्त्वाकांक्षा बच्चों पर लादने पर कई बार सोचेंगे। ट्यूशन का बढ़ता खेल कमजोर पड़ेगा। बच्चों को भयभीत करने वाले कोचिंग उद्योग की रफ्तार धीमी तो पड़ ही जाएगी। प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश की जो मारामारी बढ़ रही है उससे भी लोगों को विरक्ति होगी। सरकारी स्कूलों के अध्यापक इन स्कूलों में प्रवेश के लिए विद्यार्थियों को तैयार करने में रुचि लेंगे और उन्हें इसमें सफलता के लिए पुरुष्कृत भी किया जा सकता है। ऐसी किसी भी परियोजना निर्माण और क्रियान्वयन के लिए साहसी निर्णय की आवश्यकता होगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App