ताज़ा खबर
 

मुद्दा: गरीबी का पैमाना

भले भारत के दुनिया में सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का दावा किया जाता हो, पर जब तक सबसे गरीब और कमजोर व्यक्तियों के लिए सस्ते या मुफ्त भोजन के प्रबंध बंद नहीं हो जाते, तब तक किसी भी आर्थिक वृद्धि का कोई अर्थ नहीं है।

दुनिया भर में बढ़ती असमानता और चुनौतियों के बीच आम जनता के लिए कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।

केंद्र सरकार के ग्राम पंचायत एवं विकास मंत्रालय ने नए सिरे से गरीबी रेखा तय करने के लिए ‘वर्किंग पेपर’ जारी किया है। अब इस पर्चे में गरीबी रेखा के नीचे मौजूद नागरिकों के घर, शिक्षा, वाहन, स्वच्छता आदि जानकारियां दर्ज की जाएंगी। दरअसल, विश्व बैंक ने भारत को ‘निम्न मध्यम आय’ श्रेणी में रखा है। विश्व बैंक के दिशा निर्देशों के अनुसार इस श्रेणी के लोगों का प्रतिदिन औसत खर्च पचहत्तर रुपए होना चाहिए। चूंकि भारत में गरीबी रेखा के दायरे में आने वाले लोगों की आय पचहत्तर रुपए प्रतिदिन नहीं है, इसलिए गरीबी रेखा के वर्तमान मानदंडों में नीतिगत बदलाव लाया जाना आवश्यक हो गया है।

विडंबना है कि गरीबों की आमदनी तय करने की अनेक कोशिशें हो चुकी हैं, लेकिन गरीबी की अब तक कोई एक कसौटी नहीं बन पाई है। इस यक्ष प्रश्न को सुलझाने की जवाबदेही जाने-माने अर्थशास्त्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगड़िया को सौंपी गई थी। गरीबी रेखा तय करने के लिए सोलह सदस्यीय कार्यबल का भी गठन किया था। चूंकि नीति आयोग देश के ढांचागत विकास और लोक-कल्याणकारी योजनाओं की भूमिका तैयार करता है, इसीलिए उसके पास आधिकारिक सूचनाएं और आंकड़े भी होते हैं, गोया उम्मीद थी कि कार्यबल एक सर्वमान्य फॉर्मूला सुझाएगा, पर लंबी जद्दोजहद के बाद उसने गरीबी रेखा की कसौटी सुनिश्चित करने से इनकार कर दिया था।

गरीबी रेखा तय करने की कवायद 1960 से निरंतर चल रही है। कोई सरकार एक रेखा तय करती है, तो विपक्ष उस पर प्रश्न खड़े कर देता है, पर उसी विपक्ष पर जब कसौटी तय करने की जिम्मेदारी आती है, तो बगलें में झांकने लगता है। सरकार चाहे यूपीए की रही हो, या राजग की इनके भीतरी एजेंडे में गरीबी दूर करना शामिल नहीं रहा है।

आक्सफेम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के तिरसठ अरबपतियों के पास केंद्रीय बजट से अधिक संपत्ति है। इसी तरह क्रेडिट सुइसे एजेंसी के अनुसार वैश्विक धन के बंटवारे के बारे में जारी रिपोर्ट से खुलासा हआ है कि भारत में सबसे धनी एक फीसद आबादी के पास देश का तिरपन प्रतिशत धन है। इसके उलट पचास फीसद गरीब जनता के पास देश की सिर्फ 4.1 प्रतिशत धन-संपत्ति है। साफ है कि सामाजिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और शैक्षिक न्याय के सरकारों के तमाम दावों के बावजूद असमानता सुरसा-मुख की तरह बढ़ रही है।

नतीजा है कि 2000 में देश के सबसे धनी दस फीसद लोगों के पास 36.8 प्रतिशत धन-संपदा थी, जो आज 65.9 फीसद से भी ऊपर पहुंच चुकी है। सरकार चाहे किसी भी विचारधारा की रही हो, आर्थिक रुझान, आर्थिक रूप से सक्षम तबके को और धनी बनाने के ही रहे हैं। इस आर्थिक असमानता को केवल गरीबी और अमीरी के नजरिए से देखना, व्यापक राष्ट्रहित नहीं है, क्योंकि बढ़ती विषमता की इसी कोख में अशांति, हिंसा, अराजकता और राजनीतिक उथल-पुथल के बीज अंगड़ाई ले रहे हैं।

भारत में लोक-कल्याणकारी नीतियां दलीय एजेंडों में शामिल रहती हैं, लेकिन जब दल सत्तारूढ़ होते हैं, तो इन नीतियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। दरअसल, भारत में गैर-बराबरी अमेरिका से कहीं ज्यादा है। भारत में जितना राष्ट्रीय धन पैदा हो रहा है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा चंद पूंजीपतियों की तिजोरी में बंद हो रहा है। क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट के मुताबिक 2000-15 के बीच भारत में 2.284 खरब डॉलर धन पैदा हुआ, जिसका इकसठ प्रतिशत हिस्सा अधिकतम धनी महज एक प्रतिशत पूंजीपतियों के पास चला गया। बीस प्रतिशत धन अन्य नौ फीसद पूंजीपतियों की जेब में गया। शेष बचा महज उन्नीस प्रतिशत देश की नब्बे फीसद आबादी में बंटा। देश की यही बड़ी आबादी फटेहाल है।

शायद इस हकीकत को अनुभव करने के बाद ही पूर्व राष्ट्रपति केआर नारायणन (1997-2002) को कहना पड़ा था कि देश में बड़ी मात्रा में खाद्यान उपलब्ध हैं। बावजूद कोई नागरिक भूखा सोता है, तो इसका मतलब है कि उसके पास अनाज खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं है। यह स्थिति आज भी बरकरार है, क्योंकि 2019 की भूख सूचकांक रिपोर्ट में भारत चौरानबेवें स्थान पर है। जबकि 2018 में एक सौ दो स्थान पर था। देश में चौदह प्रतिशत आबादी अब भी कुपोषित है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना प्रकोप के चलते आठ करोड़ अतिरिक्त लोग भारत में गरीब हो जाएंगे। मसलन, गरीबी और भुखमरी का दायरा और बढ़ जाएगा।

मनमोहन सिंह सरकार ने जब देश में गरीबी रेखा निर्धारित करने के लिए सुरेश तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट को आधार बनाया था, तब उसकी खिल्ली उड़ाई गई थी। इस समिति ने विश्व बैंक की गरीबी मापने की कसौटी को आधार बनाया था। इसके तहत तब खरीदने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए सवा डॉलर प्रतिदिन खर्च क्षमता को गरीब होने या न होने की कसौटी माना गया।

इस समिति ने पैमाना दिया कि गांव में रोज सत्ताईस और शहरों में इकतीस रुपए खर्च क्षमता से नीचे के व्यक्ति को गरीब माना जाए। इसी आधार पर यूपीए सरकार ने घोषणा कर दी थी कि देश में सिर्फ इक्कीस फीसद, यानी सताईस करोड़ लोग गरीब हैं। विपक्ष की तीखी आलोचना के बाद सरकार ने इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया और अर्थशास्त्री आर. रंगराजन की अध्यक्षता में गरीबी रेखा तय करने के लिए नई समिति बना दी। इस समिति की रिपोर्ट राजग सरकार बनने के बाद तैयार हुई।

इसमें गांवों में रोजाना बत्तीस और शहरों में सैंतालीस रुपए खर्च की क्षमता रखने वाले व्यक्ति को गरीब माना गया। इस हिसाब से करीब छत्तीस करोड़ लोग गरीबी रेखा के दायरे में आते। मगर वर्तमान सरकार ने गरीब हितैषी रुख दिखाते हुए रिपोर्ट को गरीबी की सटीक कसौटी मानने से इंकार तो किया ही, संवेदनशीलता जताते हुए यह प्रश्न भी खड़ा किया कि बत्तीस और सैंतालीस रुपए मात्र से कोई व्यक्ति खाद्य वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग कैसे कर सकता है? फिर यही जिम्मेवारी अरविंद पनगड़िया को सौंपी गई थी। उनकी समिति भी कोई परिणाम नहीं दे पाई। हालांकि पिछली दो रिपोर्टों से यह जाहिर हुआ कि समितियों ने गरीबी के बजाय भुखमरी की रेखा मापने में कहीं ज्यादा कशमकश की।

बहरहाल, समितियों के नतीजों से यह तो साफ हुआ है कि गरीबी दूर करना सरकारों के एजेंडे में ही नहीं रहा है, क्योंकि आज जो भी नए सर्वे आ रहे हैं, उनसे यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि देश में उत्तरोत्तर सरकारों का मकसद केवल गरीबों को जीवित रखना रह गया है, इसीलिए राज्य सरकारें सस्ते अनाज से लेकर सस्ती थाली और सस्ते भोजनालयों का इंतजाम कर रही हैं। बुंदेलखंड में गरीबों की स्थिति इतनी बदतर है कि उन्हें ठीक से एक वक्त का भोजन भी नसीब नहीं हो रहा है, इसीलिए समाजसेवी संस्थाओं ने ‘रोटी बैंक’ तक खोल दिए हैं। घर-घर से रोटी लाकर ये लोग जैसे-तैसे गरीबों का पेट भरते हैं। भले भारत के दुनिया में सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का दावा किया जाता हो, पर जब तक सबसे गरीब और कमजोर व्यक्तियों के लिए सस्ते या मुफ्त भोजन के प्रबंध बंद नहीं हो जाते, तब तक किसी भी आर्थिक वृद्धि का कोई अर्थ नहीं है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दूसरी नजर: उन्हें चुप्पी तोड़नी होगी
2 दूसरी नजर: बिना वृद्धि के सुधार
3 बाखबर: संभल जाओ चमन वालों
यह पढ़ा क्या?
X