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चर्चाः स्त्री सुरक्षा का सवाल: कहीं तो थमना होगा हमें

बलात्कार का मामला अब सिर्फ औरत, मर्द या क्षणिक वासना-उन्माद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शहजोरी पर आ गया है, जिसका सबसे बड़ा कारण सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें न संतुलन रह गया है न अनुशासन और न ही उचित न्याय।

पिछले कुछ दिनों से महिलाओं के खिलाफ शोषण और हिंसा की खबरें लगातार आती रही हैं। हालांकि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए अनेक स्तरों पर जन-जागरूकता कार्यक्रम चल रहे हैं, शोषण, बलात्कार आदि से जुड़े कानूनों को सख्त बनाया गया है, पर ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल बना हुआ है। एक तरफ तो समाज में भौतिक सुविधाओं का विकास हो रहा है, पढ़ाई-लिखाई का स्तर ऊंचा उठ रहा है, दूसरी तरफ महिलाओं के साथ नृशंस व्यवहार भी सामने आ रहे हैं। इसके पीछे क्या वजहें हैं, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

नासिरा शर्मा

यह समय जागरूकता का है, न कि थके हुए वक्तव्यों के उलझाव का। मानवाधिकार की चेतना लेकर ही इंसान इस धरती पर आंखें खोलता है, मगर कुछ लोगों में यह चेतना समय के साथ घटते-घटते शून्य हो जाती है। ऐसा भी होता है कि जो अपने कठिन समय में समझौता करने पर मजबूर किए जाते हैं उनके जीवन की दो सच्चाइयां होती हैं। या तो हर मोड़ पर समर्पण करना ही उनका जीवन दर्शन बन जाता है या फिर उनके अंदर आक्रोश की लपटें सुलगती रहती हैं और उनकी चेतना में यह वाक्य उन्हें हमेशा चैकन्ना रखता है कि आगे किसी की मजबूरी से कोई फायदा न उठाए। शोषण शारीरिक रूप से केवल औरत या मासूम बच्चियों का नहीं, बल्कि बच्चों और किशारों का भी होता है, जो खबरों की सुर्खियां नहीं बन पाता है। इसका कारण क्या है, यह तो पुरुषवर्ग ही बता सकता है। खासकर पत्रकार और समाज आलोचक, कि इस लापरवाही की क्या वजह है?

इस संसार में औरत-मर्द का रिश्ता बहुत पेचीदा है। कब किसका किसके साथ नजदीकी रिश्ता बन जाता है। उसकी आलोचना भी होती है, चूंकि यह रिश्ता दोनों की मर्जी से यदि पनपता है तो उसके गंभीर परिणाम के वे दोनों जिम्मेदार हैं। उसमें उनके परिवार वालों के दुख भी शामिल होते हैं। माना कि बहुत कुछ बेहूदा और घृणा भरा इस मानव भूमि पर शुरू से चला आ रहा है। अजीबो-गरीब रीति-रिवाज, जड़ मान्यताएं, संकीर्ण विचार आदि। मगर समय के साथ विवेक के बढ़ते आयाम के कारण इनमें परिवर्तन भी आते रहे हैं। उसी तरह यह दौर भी चेतना की जागरूकता का है। बदलाव का है और इस बात को दृढ़ता से समझने का है कि आप अपनी मर्जी और इच्छाओं के चलते किसी दूसरे को हानि नहीं पहुंचा सकते हैं, आपको अपनी बेजा करतूतों पर प्रतिबंध लगाना होगा। आखिर आप जानवर नहीं हैं कि पेट (जिस्म) की भूख मिटाने के लिए किसी का भी शिकार कर लें। आपको किसने यह अधिकार दिया है कि बिना किसी की मर्जी के आप उसका शीलभंग करें? मासूम बच्चियों की बेबसी से अपने अपराधी स्वभाव को खुराक दें और सबूत मिटाने के लिए हिंसा पर उतर आएं और जान से मार डालें?

सामूहिक रूप से मानसिक रोगों से पीड़ित और अपराधी मानसिकता के इन व्यक्तियों के साथ क्या सुलूक किया जाए? सजा-ए-मौत, आजीवन कारावास या हमेशा की तरह कुछ दे-दिला कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना, उचित सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर देना या फिर लड़की के आचार-व्यवहार पर तोहमत मढ़ देना! यह सारी लीपापोती और स्त्री के शीलभंग के अपराध को हल्के में लेना दरअसल बलात्कारियों के हौसले बुलंद करता है कि बच जाने की पतली गली तो है। सच तो यह है कि बलात्कार का मामला अब सिर्फ औरत, मर्द या क्षणिक वासना-उन्माद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि शहजोरी पर आ गया है, जिसका सबसे बड़ा कारण सामाजिक व्यवस्था है, जिसमें न संतुलन रह गया है न अनुशासन और न ही उचित न्याय। जनता एक संदेह भरे वातावरण में सांस लेने पर दिन-प्रतिदिन मजबूर होती जा रही है और यह सिलसिला स्वतंत्रता मिलने के कुछ वर्षों बाद से शुरू हो गया था।

जो सबका दुश्मन था उसे भारतीय एकता ने मिल कर बाहर निकाल दिया। मगर असंख्य लोगों के अंदर का जोश और उबाल बाद में भी मौजें मारता रहा। यह लावा शांत होने की जगह आपस में आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे सिलसिले में ढल गया, जिसकी उम्र सत्तर साल पुरानी हो गई है। इस बोसीदा जर्जर वृद्ध हुए बेतुके सिलसिले को मौत की नींद सुला देना जरूरी हो गया है। पिछले कई वर्षों में कुछ चैनल, समाचार पत्र, अनेक संस्थाएं, अचानक उभरे असंख्य विचारक और ज्ञानी, वाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर अपनी समझ और क्षमता के अनुसार बोल और लिख रहे हैं। बात केवल आसाराम और राम रहीम तक सीमित नहीं रह गई है और न ही केवल कठुआ और उन्नाव में हुए बलात्कार और हिंसक घटनाओं तक। अगर हम अतीत में जाएं तो स्वतंत्रता के बाद हुए दंगे-फसाद में महिलाओं पर जो कहर तोड़ा गया था (कुछ के तो वीडियो भी बने थे) उसका सिलसिला किसी न किसी रूप में एकल घटनाओं में उसी शिद्दत से नजर आता है।

हकीकत यह है कि अब पानी सिर से ऊंचा जा चुका है, बात एक दो घटनाओं या चंद नामों की नहीं, बल्कि लाखों अपराधियों, अपमानित औरतों और नाबालिग बच्चियों की है, जो अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती हैं। अफसोस तो यह है कि सबको अपनी आवाज और चेहरे से बेहद प्यार हो गया है। इसलिए टिप्पणियों की बारिश नजर आती है, मगर इतने महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर उचित और अनुशासित फैसला क्यों नहीं लिया जा रहा है। आखिर कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिन पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए, न कि सोच-विचार। जल्दबाजी में ऐसा कोई कानून नहीं बनना चाहिए, जिससे दूरगामी समाधान न होकर केवल वक्ती लीपापोती कर दी जाए। पर जहां चश्मदीद गवाह और पकड़-धकड़ के साथ सबूत भी हाथ लग जाते हैं वहां न्याय मिलने में इतनी देर हो जाती है कि जनता दूसरी दर्दनाक घटनाओं से एक बार फिर अचंभित और ठगी-सी रह जाती है और इस बीच पुराने मामलों के आरोपी शक और सबूत के अभाव में छोड़ दिए जाते हैं और ज्यादातर मामलों में औरत को ही कसूरवार ठहराने की साजिश भी शामिल कर दी जाती है।

कुछ वक्तव्य भी बलात्कार पर ऐसे आए, जिनमें थकन, ऊब और हारने जैसी ध्वनि निकलती है जैसे यह होता रहता है। अब इस होते रहने को बदलने और रोकने की सख्त जरूरत है, क्योंकि इसमें हिंसा भी जुड़ चुकी है। हमारी हमदर्दी अपराधी की सजा की तरफ नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह हरकत किसी भी हत्या से बढ़ कर है, किसी को जीते जी मार डालना। क्योंकि बाकी जिंदगी वह इस कलंक से उबर नहीं पाएगी, परिवार, समाज, मित्र उसको ऐसी नजर से देखेंगे, जिसे सहना उसके लिए कठिन है। इसलिए बलात्कारियों को ऐसे दंड से गुजारना चाहिए, ताकि वे भी सारी जिंदगी आत्मप्रताड़ना से गुजरें और उन्हें अपनी हरकत पर आत्मग्लानि हो, और सारा जीवन आंखें झुका कर रहना पड़े, ताकि दूसरों के लिए ऐसा उदाहरण बन जाए कि आसपास वाले मनचले जीवन की इस लंबी प्रताड़ना को झेलने के भय से अपने तौर-तरीकों पर रोक लगा सकें।

जबसे होश संभाला है, बेटी पढ़ाओ, महिला सशक्तीकरण जैसे नारों से पाला पड़ता रहा है। सरकारी योजना और समर्थन, टूटता अंधकार, बदलती मानसिकता यह सब कुछ नजर आ रहा है और औरत का बदला रूप भी। लेकिन ऐसी सक्षम स्त्रियों और विश्वास से भरी लड़कियों के लिए क्या समाज ने वह जगह बनाई है जहां वे सुरक्षित रह सकें? उनको बलात्कार का भय न सताए। सरकारी दफ्तरों और निजी क्षेत्रों में उनका शारीरिक शोषण न हो! आखिर यह होगा कैसे? ऐसी कौन-सी बुनियादी नब्ज है, जिसका सिरा हमको पकड़ना होगा, क्योंकि कानून का खौफ, मौत की सजाओं से एक दुर्घटना का समाधान तो हम कर सकते हैं, मगर इसको रोकें कैसे? हनुमान जैसे ब्रह्मचारी को पूजने वाले देश में यह हिंसक वासना क्यों बेकाबू हो रही है, इसका मनोविज्ञान क्या है? आखिर राखी जैसे त्योहार, भाई-बहन के प्यार को संजोने वाले समाज में ऐसा हिंसात्मक प्रदर्शन क्यों, जो दूसरे देश हमारी निंदा में कहें कि वह तो बलात्कारियों का देश है।

बलात्कार के अपराधियों पर काम करने की जरूरत है, उनका मनोविज्ञान समझना होगा। उनका सामाजिक और देश के स्तर पर खुला इंटरव्यू लेना चाहिए जैसा कि दूसरे देशों में सियासी कैदियों, अपराधियों और आतंककारियों का लिया जाता है। या फिर ऐसी मानसिकता रखने वालों का इलाज भी जरूरी है। सरकार हार गई। औरतें लिख कर विरोध कर हार गर्इं, मगर ऐसे कुंठितों की मानसिकता नहीं बदल पाई, जिन्हें घर और बाहर छूट मिली है और कभी बदनामी, तो कभी रिश्तों को बचाने के लिए औरतें भी जबान पर ताला डाल लेने पर मजबूर हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में मर्दों को अब मोर्चा संभालना होगा कि वे अपने पुरुष समाज में ऐसे रोगियों का उपचार कैसे करें। उन्हें भी अपने शरीर की मर्यादा रखनी चाहिए और पुरुषों को उस मानसिकता से निकलना होगा कि हर प्रतिशोध की अभिव्यक्ति औरत का शरीर नहीं होती और न ही यह बहादुरी, बल्कि कायरता है। मर्दों के व्यक्तित्व के इस विकास को पुरुषवर्ग से अच्छा कौन समझ सकता है। जब दुनिया भर के हर मुद्दे पर सिर जोड़ कर वे विकल्प तलाश लेते हैं, तो इस मुद्दे को भी राष्ट्र स्तर की समस्या मान कर विचार करें और बुनियादी शारीरिक, मानसिक डिसआर्डर के कारण को दूर करने का संकल्प लें। आखिर यह कब तक चलेगा, कहीं तो रुकना और रोकना होगा न?