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कभी-कभार : लेखकों की आवाज़

लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी आदि थोड़ा महीन कातते हैं और उसी के लिए बदनामी भी झेलते हैं: उन पर हमारे तेज भागते और सब कुछ को एक तरह के ‘तुरंता’ में बदलने वाली मानसिकता में जगह कम ही, नहीं के बराबर, मिलती है..

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 12:01 AM
अवॉर्ड लौटाने वाले साहित्‍यकार। (फोटो-इंडियन एक्‍सप्रेस)

वर्ष के अंत पर बहुत लोग वर्ष-भर के अपने किए-धरे का आकलन करते हैं: अपनी भूल-चूकें पहचानते और अपनी उपलब्धियां गिनाते होंगे। यही काम सार्वजनिक स्तरों पर भी होता है। अनेक माध्यम वर्ष का अपना आकलन प्रस्तुत करते हैं, विभिन्न क्षेत्रों में। साहित्य और कलाएं भी उनमें शामिल होते हैं, हालांकि उन पर ध्यान इधर कम होता जा रहा है। राजनीति, सिनेमा, मनोरंजन और फैशन, खेलकूद आदि पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यों भी हमारे समय की नायक छवियां नेता, अभिनेता, खिलाड़ी और अपराधी ही बनाते हैं: उन्हीं में से हमें अपने खलनायक भी मिलते हैं। लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी आदि थोड़ा महीन कातते हैं और उसी के लिए बदनामी भी झेलते हैं: उन पर हमारे तेज भागते और सब कुछ को एक तरह के ‘तुरंता’ में बदलने वाली मानसिकता में जगह कम ही, नहीं के बराबर, मिलती है। दिल्ली ग़ालिब का शहर था और इसी में लगभग हर रोज ‘तमाशा-ए-अहले करम’ देखने वाले शायर ने झल्ला कर कहा था कि अगर उनके शेरों के मायने नहीं हैं तो ‘न सही’। फौरन मायने समझने की जल्दी में जो समय है, उसमें अधिकांशत: साहित्य और कलाओं में न कोई मायने पाने-समझने का धीरज है, न समझ, न तैयारी।

फिर भी, यह बरस बीतते हुए यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि किसी हद तक, शायद पहली बार, हमारे अधीर समय ने अगर साहित्य की नहीं तो कम से कम लेखकों की आवाज सुनी। समाज और सत्ता में बढ़ती असहिष्णुता के विरुद्ध और उससे आगाह करने वाली लेखकों की आवाज का कुछ असर जरूर हुआ: उसमें कलाकार, वैज्ञानिक, विद्वान, बुद्धिजीवी, फिल्मी कलाकार आदि भी बड़े पैमाने पर शामिल हुए। ऐसे बहुत थे और हैं, जिन्हें बढ़ती असहिष्णुता नजर नहीं आती: उन्हें लेखकों की आवाज अतिशयोक्ति लगती है। कइयों को उसमें खोट नजर आई और कइयों को लेखकों की नीयत पर एक बार फिर शक करने का मौका मिला है।

लेखकों और कलाकारों आदि पर, इस सिलसिले में, प्रहार भी बहुत हुए- उनके चरित्र-हनन का बाकायदा अभियान भी चला और आज तक, कहते हैं, सामाजिक मीडिया पर निस्संकोच चल रहा है। लेकिन यह नोट करने की बात है कि स्वयं सृजन और विचारशील समाज की किसी बड़ी हस्ती या हस्तियों ने मूल मुद्दे या लेखकों-कलाकारों के इस आकलन को गलत या असामयिक नहीं माना। असहिष्णुता के मुद्दे और लेखकों-कलाकारों के उसे उठाने को लेकर अखबारों, टीवी चैनलों, संसद के सत्रों, गोष्ठियों और परिसंवादों में जितनी बहस हुई उसके हमारे लोकतंत्र के कई दशकों में फैले इतिहास में कम ही उदाहरण मिलते हैं। यह भी, एक तरह से, भले फौरी तौर पर ही सही, साबित हुआ कि अगर साहित्य चाहे तो समकालीन सार्वजनिक क्षेत्र में कुछ हस्तक्षेप कर सकता है। यह साहित्य दशकों से, अपने ढंग से और अपनी शर्तों पर, करता भी रहा है। यह स्थिति की बड़ी विडंबना है कि समाज और सत्ता का ध्यान उसे गहरे हस्तक्षेप पर कम गया है, नहीं के बराबर, लेकिन वह लेखकों के वक्तव्य और कार्रवाई से कुछ बेचैन, कुछ नाराज, कुछ मुखर आदि हुए हैं।

हम सुन सकते हैं यह सयानी सीख कि यह सब थोड़े समय का खेल है और जल्दी ही सब उसे भूल-भाल कर हस्बे-मामूल अपने काम में लग जाएंगे। थोड़ा-बहुत असर जो नजर आया, जल्दी ही ओझल हो जाएगा। चूंकि साहित्य लंबी पारी का खेल है, हम यह हकीकत बखूबी जानते हैं: अपनी अंतत: विफलता का भी गहरा और लगातार अहसास हमें है। इतना नैतिक संतोष हमें है कि हमने समय पर अंत:करण की आवाज उठाई और वह, थोड़ी देर सही, सुनी गई। हमारी कोशिश यही है कि यह आवाज उठती रहे और उसकी सुनी-अनसुनी उसके समय और जरूरत को प्रभावित न कर सके।

साहित्य के पाठक

हमारे समाज में, खासकर हिंदी समाज में साहित्य के पाठक कम हो रहे हैं, यह शिकायत आम है। पुस्तकें छप रही हैं, बिक भी रही हैं, पर उनकी उपलब्धता की जगहें कम हो रही हैं। शिक्षा और साक्षरता, सौभाग्य से, हिंदी क्षेत्र में बढ़ी है, लेकिन अनुपात में पाठक नहीं बढ़े हैं। साहित्य की शिक्षा में, प्राय: हर स्तर पर, बहुत उतार आया है: साहित्य के अच्छे और उसमें स्थायी रुचि जगा सकने वाले शिक्षक भयानक रूप से अल्पसंख्यक हैं। इतना बढ़ता, महत्त्वाकांक्षी युवा वर्ग है, जिसकी साहित्य में रुचि लगभग न के बराबर है: उसमें भी साहित्य अल्पसंख्यक मामला है। अच्छी, सक्रिय और उत्सुक पाठकों की उपस्थिति और शिरकत के बिना अच्छा साहित्य कैसे लिखा जा रहा है यह शोध के अलावा आश्चर्य का विषय है।

आप किसी बड़े राजनेता पर, किसी भी राजनीतिक दल और विचारधारा के, यह लांछन नहीं लगा सकते कि वह फुरसत में या अपने व्यस्त जीवन में कुछ समय निकाल कर, साहित्य पढ़ता-गुनता है। सार्वजनिक भाषा में जो गिरावट, भदेसपन और अभद्रता, बड़े पैमाने पर आई और आ रही है उससे स्पष्ट है कि इस समाज ने साहित्य के सहज प्रभाव से अपने को सर्वथा मुक्त कर लिया है। और कुछ नहीं तो साहित्य कम से कम आपकी भाषा को तो सिविल, भले कितनी ही पैनी और तीखी, बना सकता है, उसमें आपको दीक्षित कर सकता है। पर साहित्य को यह भी नहीं करने दिया जा रहा है। नतीजा सामने है: आक्रामकता, हिंसा, अभद्रता, विचारहीनता का बढ़ता प्रभाव।

अगर आप हाल ही में हुए असहिष्णुता के विवादों का जायजा लें और उसमें जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों आदि पर लगाए गए तो उनसे यही नतीजा निकल सकता है कि ऐसा उसी समाज में हो सकता है, जिसमें उसके बड़बोले प्रवक्ता साहित्य और कलाओं की, विद्वत्ता और विज्ञान की कोई कद्र नहीं करते और जिन्होंने कभी साहित्य आदि पढ़ा ही नहीं है। लोकतंत्र में बहस जरूरी है- पर समझ, ज्ञान और भद्रता भी उतने ही जरूरी हैं। लेखकों आदि ने अपने वक्तव्यों में, निश्चय ही, बहुत तीखे ढंग से, आलोचना की है, पर किसी ने भी अभद्रता नहीं की, कोई अपशब्द नहीं कहे, कोई और किसी का चरित्र-हनन नहीं किया। इसके बरक्स उनके विरुद्ध जो कुछ कहा गया उसमें से अधिकतर गाली-गलौज, अपमान, अवमानना, अप्रामाणिक मनगढ़ंत तथ्यों से भरा हुआ रहा है। यह वही कर सकते हैं, जिन्होंने साहित्य के मानवीय और भद्राचारी प्रभाव से अपने को पाक-साफ ‘स्वच्छ’ रखा है!

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