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मुद्दा: कृत्रिम मेधा का दुश्चक्र

मशीन कितनी भी ज्ञानवान हो जाए, संवेदना की उम्मीद उससे नहीं की जानी चाहिए। संवेदना के साथ कोई अपरिचित व्यक्ति भी एक आज्ञाकारी संतान की भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके बिना अपनी खुद की संतान भी दुश्मन बन जाती है।

कृत्रिम मेधा वह तकनीकी है, जो मशीन को भी इंसान की तरह सोचने और निर्णय लेने में समर्थ बनाती है।

मानव सभ्यता के विकास में अब वह समय भी आ गया है, जब हम मानवीय गुणों की उम्मीद मशीन से भी करने लगे हैं। ‘कृत्रिम मेधा’ के क्षेत्र में हो रहे शोधों का एक दौर बीत चुका है और अब इसके छिटपुट परिणाम आने शुरू भी हो गए हैं। इसी जून में भारत, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और न्यूजीलैंड आदि देशों ने मिल कर वैश्विक भागीदारी के साथ कृत्रिम मेधा के विकास के क्षेत्र में संयुक्त रूप से काम करने की मंशा जाहिर की है।

दूसरी तरफ हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी कृत्रिम मेधा के साथ भाषा-प्रौद्योगिकी के विकास की बात की गई है और इस आधार पर देश की शिक्षा में गुणात्मक बदलाव की उम्मीद भी है। बीते पांच अक्तूबर को, ‘सामाजिक अधिकारिता हेतु जिम्मेदार कृत्रिम मेधा (रेज) 2020’ शीर्षक से आयोजित पांच दिवसीय वैश्विक सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में, प्रधानमंत्री ने इसे भारतीय संदर्भों के अनुरूप विकास और भारतीय भाषिक तथा सामाजिक विविधता के अनुरूप इसको उपयोगी बनाने का आह्वान किया। इस वैश्विक सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों के साथ पूंजीपतियों की भी सहभागिता थी।

कृत्रिम मेधा का आशय उस प्रणाली से है, जिसमें मशीन में कृत्रिम ज्ञान का विकास और इसी कृत्रिम संज्ञानात्मक क्षमता के आधार पर उनमें संदर्भगत निर्णय लेने की क्षमता का विकास किए जाने से है। मसलन, बिना चालक के कार का संचालन। गौरतलब है कि जब कोई आदमी कार चलाना सीखता है, तो निश्चित रूप से उसका विधिवत प्रशिक्षण होता है, जिसमें चालक को कार की कार्य-प्रणाली से लेकर सड़क के नियम और उससे जुड़ी पूरी व्यवस्थाओं का समुचित ज्ञान प्राप्त करना होता है।

यहां ज्ञान को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए, क्योंकि सूचना-प्रौद्योगिकी के उभार के बाद से डाटा, सूचना और ज्ञान के आपसी संबंधों पर बहुत धुंध छाई है। हम सूचना को ही ज्ञान मान लेते हैं, जो गलत है और इस आधार पर कृत्रिम मेधा की कार्य-प्रणाली को नहीं समझा जा सकता। यहां एक उदाहरण से इसको समझते हैं- ‘104 डिग्री’ का बुखार एक ‘डाटा’ है। किसी को 104 डिग्री बुखार हुआ है, यह ‘सूचना’ है, जबकि 104 डिग्री का बुखार प्राणांतक हो सकता है, यह ‘ज्ञान’ है।

स्पष्ट है कि किसी अनजान व्यक्ति के लिए यहां उपलब्ध ‘डाटा’ और ‘सूचना’ भर से यह कतई नहीं पता होगा कि अधिक बुखार होने से व्यक्ति की मौत हो सकती है। इसके लिए व्यक्ति को अन्य स्रोतों से सूचना लेनी होती है, उसे समझना पड़ता है, उसके बाद ही वह किसी निर्णय पर पहुंच पाता है।

इसी प्रकार मशीन को इतना समझाने के लिए ढेर सारे एल्गोरिद्म की आवश्यकता पड़ती है। इसके साथ मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों के सापेक्ष मशीन में सेंसर की आवश्यकता होती है। मनुष्य-मस्तिष्क जिस तरह उद्दीपन और अनुक्रिया के आधार पर काम करता है, उसी के अनुरूप कृत्रिम मेधा के लिए प्रोग्रामिंग हो रही है।

जिस प्रकार मनुष्य भंगिमा की भाषा को ग्रहण करता है, उसी प्रकार एक रोबोट में भी संकेत-भाषा के व्याकरण को समझने का प्रयास हो रहा है, जिसमें कंप्यूटर विज्ञान से लेकर तर्कशास्त्र की भी आवश्यकता पड़ती है। जिस प्रकार आग और धुएं के संबंध को तर्कशास्त्र से हल किया जाता है, उसी प्रकार लाल संकेत और गाड़ी के रुकने के संबंध को एल्गोरिद्म के माध्यम से जोड़ा जाता है। इसी आधार पर दिल्ली मेट्रो में चालक के बिना भी मेट्रो का संचालन हो रहा है। इसके अलावा शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा, मौसम विज्ञान और प्रशासन आदि में यह बहुत उपयोगी हो सकता है।

कृत्रिम मेधा की सफलता की पृष्ठभूमि पर विकसित रोबोट को वाक-अनुदेश और आंगिक संकेतों के आधार पर ‘एक आज्ञाकारी संतान’ की तरह सेवा में लिया जा सकता है, जो आज के एकल समाज में बुजुर्गियत के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। दूसरी तरफ, किसी फसल की जिजीविषा और विकास के चरणों के अध्ययन और मौसम की उपयुक्तता के आधार पर कृत्रिम मेधा से उम्मीद की जानी चाहिए कि वह किसान के लिए उपयोगी भविष्यवाणी कर दे और किसान अपनी फसल के साथ उसी के अनुरूप व्यवहार करे। सीमा-सुरक्षा के लिए तो यह अद्वितीय साधन हो सकता है।

मगर समस्या यहां यह है कि इस कृत्रिम मेधा के विकास में अधिक से अधिक डिजिटल डाटा की आवश्यकता होगी, जिसमें भाषाई डाटा (कॉर्पस) भी शामिल है और यह अच्छी तरह से स्वीकार किया जाना चाहिए कि इंटरनेट डाटा का अधिकांश हिस्सा आज गूगल और फेसबुक जैसी निजी कंपनियों के सर्वर में सुरक्षित है।

देश में ऐसा कोई ढांचा अब तक नहीं बन पाया है, जिसमें अपनी इतनी बड़ी आबादी का डिजिटल डाटा संग्रहित और उसको समय की मांग के अनुरूप संसाधित और उपयोग किया जा सके। देश की सार्वजनिक और निजी स्वामित्व की हजारों वेबसाइटें भी विदेशी सर्वर के सहयोग से चलती हैं, क्योंकि निर्बाध संचालन और कम लागत के स्तर पर ये देश के सर्वर से बेहतर सिद्ध होते हैं। हालांकि पिछले साल इस दिशा में कानून-निर्माण की पहल हुई, लेकिन अभी परिणाम को व्यावहारिक बनाना चुनौतीपूर्ण है।

कृत्रिम मेधा का एक सिरा लगातार भाषा के साथ जुड़ा होता है, क्योंकि बिना भाषा के ज्ञान के अभिव्यक्ति की क्षमता प्रभावित होती है। इसमें संसार भर की सूचनाओं को कृत्रिम मस्तिष्क में निवेशित करने और समय पर उसको व्यवहार में लाने के लिए एक भाषा की आवश्यकता होगी। गौरतलब है कि भाषा और तकनीक के मध्य प्राय: अंग्रेजी ही मुख्य भाषा रहती है, ऐसे में भारतीय भाषाओं की उपेक्षा यहां नहीं होनी चाहिए। जैसा कि इस सम्मेलन में भी इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि इसका सिर्फ सकारात्मक उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

मशीन कितनी भी ज्ञानवान हो जाए, संवेदना की उम्मीद उससे नहीं की जानी चाहिए। संवेदना के साथ कोई अपरिचित व्यक्ति भी एक आज्ञाकारी संतान की भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके बिना अपनी खुद की संतान भी दुश्मन बन जाती है। ऐसे में मशीन के भरोसे बुजुर्गियत को संभालना फिलहाल कल्पना की ही बात है।

कृत्रिम मेधा के विकास में जिस तरह डाटा की केंद्रीयता होगी, उसमें भारत में भी इसके विकास में गूगल जैसी कंपनी के बिना सोचना संभव नहीं है, जैसा कि नीति आयोग और गूगल में इस विषय पर बातचीत भी हो रही है। ध्यान रहे कि गूगल के समग्र डाटा में भारत में उसके प्रयोक्ताओं का भी प्रचुर मात्र में डाटा होगा। अभी चीन के साथे जारी तनाव में वहां की डिजिटल कंपनियों पर डाटा चुराने और देश के विरुद्ध उपयोग करने के आरोपों के बीच अनेक मोबाइल अनुप्रयोगों को भारत में बंद किया गया है।

क्या यह संभव नहीं कि ऐसा तनाव कभी अमेरिका के साथ भी हो सकता है, भले वह पड़ोसी नहीं है, तो भी। क्योंकि आधुनिक युद्धों का केंद्र तो व्यापारिक प्रतिष्ठानों से लेकर साइबर का मैदान ही है। ऐसे में यह उचित है कि यथासंभव और यथाशीघ्र इस क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ के नारे को साकार किया जाए और देश की भाषा में व्यवहार करने वाला रोबोट देश की तकनीक और संसाधन से विकसित हो।

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