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मुद्दा: संकट में बचपन

बचपन को संकट से बचाने के लिए राज्य, प्रशासन, परिवार और शिक्षकों को संतुलित रणनीति बनानी होगी। बच्चों में साझा करने और हार-जीत को समान रूप से स्वीकार करने की भावना को विकसित करना होगा।

social media, social media app, depressionसोशल मीडिया पर अधिक समय देने से भारतीय किशोर और युवा मानसिक रूप से भटकने की राह पर हैं।

बचपन मानव जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा होता है। बचपन का मतलब मस्ती, शरारत, दोस्ती, लड़ाई, रूठना-मनाना, खेलना, खाना-पीना और बेफिक्र सोना। पर आज के प्रतिस्पर्धामूलक समाज में बचपन कहीं खो-सा गया है, क्योंकि बच्चे समय से पहले ही बड़े या परिपक्व होने लगे हैं या समाज में आए बदलावों ने बच्चों को समय से पहले वयस्क बना दिया है। उनमें अल्हड़पन और स्वाभाविकता का स्थान बनावटीपन ने ले लिया है और वे तनावग्रस्त होते जा रहे हैं। स्वाभाविकता की समाप्ति उनकी सृजनात्मकता की भी समाप्ति है। अगर बच्चों में सृजनात्मकता ही समाप्त हो गई, तो तनाव होना स्वाभाविक है।

भारतीय जनसंख्या आयोग (2018) के आंकड़ों के अनुसार भारत की आधी से ज्यादा आबादी पच्चीस वर्ष या इससे अधिक आयु की है। जबकि पच्चीस वर्ष से कम आयु की आबादी 46.9 फीसद है, जिसमें पुरुष आबादी 47.4 और महिला आबादी 46.3 फीसद है। यानी देश में किशोर और युवाओं की संख्या महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। दूसरी तरफ, इस जनसंख्या का एक भाग जो बाल्यावस्था और किशोरावस्था का प्रतिनिधित्व करता है, वह अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे बाल-विवाह, बाल-श्रम, बाल यौन-शोषण, लैंगिक भेदभाव, पोर्नोग्राफी, मानव अंग तस्करी, बाल वेश्यावृत्ति, मानसिक समस्याओं आदि का।

हालांकि ऐसा नहीं कि ऐसी समस्याएं पहले नहीं थीं, लेकिन अब वे पहले की तुलना में बढ़ी हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि तिरपन फीसद बच्चों के साथ किसी-न-किसी तरह का यौन दुर्व्यवहार किया जाता है और उनमें सत्तर फीसद बच्चे डर के मारे अपने माता-पिता या शिक्षकों को यह बात नहीं बताते। वर्ष 2014 में बच्चों के साथ अपराध की 89,423 और 2016 में 1,06,958 घटनाएं दर्ज हुईं। इन तीन सालों में बच्चों के प्रति अपराध की दर चौबीस फीसद तक पहुंच गई।

हाल ही में अलवर जिले के एक गांव में बारह साल के एक बालक ने पांच साल की बच्ची से दुष्कर्म किया, जो कि पीड़िता का रिश्तेदार है। इसी तरह जयपुर के गोविंदगढ़ कस्बे में किरायेदार की एक साल की बच्ची के साथ मकान मालिक के नाबालिग बेटे ने दुष्कर्म किया। सवाल है कि नाबालिग बच्चे या किशोर इस तरह के अनैतिक या आपराधिक गतिविधियों में कैसे संलग्न हो रहे हैं? क्या कारण है कि बच्चे समय से पहले इतने परिपक्व होते जा रहे हैं? उनमें परिपक्वता तो आ रही है पर सही और गलत की समझ विकसित नहीं हो रही, यह कैसा विरोधाभास है!

जैसे-जैसे प्रौद्योगिकीय विकास तीव्र होता जा रहा है, ऑनलाइन बाल यौन-शोषण या पोर्नोग्राफी के अनेक नए स्वरूप उभर कर आ रहे हैं। ऐसा नहीं कि इंटरनेट युग के आने से पहले बाल यौन शोषण नहीं होता था, पर इस आॅनलाइन सुविधा ने इस समस्या को बहुत सहज और तीव्र कर दिया है। आज बच्चों को टेक्नोलॉजी आसानी से उपलब्ध है। सोशल मीडिया पर सभी तरह की सामग्री, खासकर अश्लील सामग्री बिना रोक-टोक आसानी से उपलब्ध हो जाती है। फिल्में, धारावाहिक, वेब सीरीज, गाने कुछ भी तो इनसे अछूता नहीं है आज। नतीजतन, इस अश्लील सामग्री को देख कर बच्चे/ किशोर सही-गलत, नैतिक-अनैतिक में अंतर किए बिना अपने जीवन में इन गतिविधियों का अनुकरण करने लगते हैं।

मार्केट रिसर्च फर्म इनसाइट स्ट्रेटजी ग्रुप ने बताया है कि पांच से बारह साल के बच्चे यूट्यूब, इंस्टाग्राम, ट्विटर, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं और कम आयु की वजह से वे यह अंतर नहीं कर पाते कि सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री कितनी सही है और कितनी गलत। सोशल साइटों पर क्या पोस्ट करना चाहिए और क्या नहीं, वे इन बातों की परवाह किए बिना इन सब चीजों को मनोरंजन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू करते हैं और पता ही नहीं चलता कब इसके आदी बन कर साइबर अपराध का शिकार हो जाते हैं। जिस देश में बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता नजर आए उस देश के समावेशी विकास की कल्पना कैसे की जा सकती है?

शायद इसी के मद्देनजर 2019 में बालश्रम निषेध दिवस का लक्ष्य ‘बच्चों को सड़कों पर नहीं, बल्कि सपनों पर काम करना चाहिए’ रखा गया था। पर क्या केवल दिवस मनाने से बच्चों का भाग्य बदला या उनके साथ हो रही घटनाओं को रोका जा सकता है? इतिहास गवाह है कि सपने बिना संघर्ष के पूरे नहीं किए जा सकते। आज की किशोर और युवा पीढ़ी में संघर्ष करने का जज्बा घटने के कारण ही अनेक नकारात्मक और विध्वंसात्मक प्रवृत्तियां विकसित होने लगी हैं।

आईएलओ (2016) के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में पांच से सत्रह वर्ष की आयु के 15.2 लाख कामकाजी बच्चे हैं, जिनमें से अस्सी लाख बच्चे अकेले भारत में हैं। कितनी बड़ी विडंबना है कि सपने देखने और खेलने-कूदने की उम्र में बच्चे कार्यशील जनसंख्या का हिस्सा बनने को मजबूर हैं। छोटी उम्र में अपना और अपने परिवार का बोझ उठाने को बाध्य हो जाते हैं। ऐसे बच्चों के संदर्भ में बाल अधिकार की बात करना बेमानी लगता है। कहीं बालगृह में दुष्कर्म का शिकार होते हैं, कही घरेलू हिंसा का, तो कहीं मानव अंगों की तस्करी का और कहीं भिक्षावृत्ति के लिए बंधक नजर आते हैं।

उनकी इस स्थिति पर समाज, राज्य, प्रशासन सब मौन नजर आते हैं। उनकी इस स्थिति के लिए परिवार, पड़ोस, नातेदार, विद्यालय और राज्य सभी को समान रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि इनके पास बच्चों के ‘समावेशी विकास’ का कोई प्रारूप/ रणनीति ही नहीं है। पड़ोस और नातेदार जो कभी पारिवारिकता का अहसास दिलाते थे, वे अब ऐसा नहीं करते। इसी तरह शिक्षकों ने भी अभिभावक की भूमिका निभानी या तो कम या फिर बंद कर दी है। इसलिए यह राज्य, परिवार, पड़ोस, और स्कूल का दायित्व है कि वे बच्चों के आसपास सामूहिकता और भावनात्मकता के परिवेश को स्थापित करें और उसे जिंदा बनाए रखें।

यह भी एक सीमा तक सच है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बावजूद भारत में परिवार और विद्यालय लोकतांत्रिक नहीं बन पाए हैं और वे समानता तथा स्वतंत्रता के मूल्यों को बच्चों के व्यक्तित्व में शामिल कर सकने में विफल सिद्ध हुए हैं। ये घटनाएं किसी भी स्थिति का परिणाम हों, पर बाल्यावस्था और किशोर पीढ़ी के विकास की प्रक्रिया में ऐसे खतरे की सूचक हैं, जिन पर समाज के सभी समूहों को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

बचपन को संकट से बचाने के लिए राज्य, प्रशासन, परिवार और शिक्षकों को संतुलित रणनीति बनानी होगी। बच्चों में साझा करने और हार-जीत को समान रूप से स्वीकार करने की भावना को विकसित करना होगा। बच्चों की मासूमियत और स्वाभाविकता को बनाए रखने के लिए उन्हें जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराएं, उन्हें सफलता-विफलता को समान रूप से स्वीकार करने के लिए तैयार करें, उनसे उनकी योग्यता से अधिक अपेक्षा न करें, परिवार में तनाव रहित और सकारात्मक वातावरण प्रदान करें।

उन्हें निर्भरता की संस्कृति का हिस्सा न बना कर निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाएं, तभी वे अपने व्यक्तित्व में समग्र विकास कर पाएंगे। उन्हें टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहना नहीं, उसे एक सहायक उपकरण की तरह इस्तेमाल करना सिखाएं। जाति, धर्म, भाषा, जेंडर भेद जैसी संकीर्णताएं उनके व्यक्तित्व का हिस्सा न बनने दें, तभी एक खुशहाल और समृद्ध भारत की तस्वीर मूर्त रूप ले सकेगी।

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