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तीरंदाजः उम्मीद नजर नहीं आती

चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो, खालिस्तान का या फिर भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध चलाने की उनकी वर्षों पुरानी मुहिम, सब अपनी जगह कायम है। इमरान खान के आने से उसमें कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है।

भारत में बैठे हुए कुछ जानकार पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने की हिमायत कर रहे हैं, जिससे उसके सामने खड़ा भीषण संकट टल जाए।

अठारह अगस्त को इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। पिछले लगभग दो दशक से वे पाकिस्तान की राजनीतिक ‘टीम’ में खेलते रहे हैं, जिसमें काफी समय ऐसा रहा है, जिसमें लगता था कि उनके प्रतिद्वंद्वी उनको खेल से ‘ड्रॉप’ करा कर ही चैन लेंगे। पर इमरान खान किसी तरह से ‘प्लेयिंग एलेवेन’ में अपनी जगह बनाए रहे। शुरू-शुरू में जब वे राजनीति में आए थे, तो लगता था कि वे सिर्फ अपनी लोकप्रियता के आधार पर पाकिस्तान की ‘कप्तानी’ तक सरल तरीके से पहुंच जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। उन्हें पाकिस्तानी ‘पिच’ के बदलते मिजाज का अंदाज नहीं था और न ही उन्हें इस सच्चाई का अहसास था कि उनके देश में ‘न्यूट्रल अंपायर’ जैसी व्यवस्था नहीं है। अंपायर वास्तव में खुद राजनीतिक मैदान में दोनों तरफ से खिलाड़ी भी था, दोनों टीमों का कप्तान भी, अंपायर भी और खेल पर सट्टा लगवा कर उससे हुई आमदनी का एकमात्र हिस्सेदार भी था।

खेल इमरान खान समझ तो गए थे, पर वर्षों तक वे हाशिए पर लगे हुए उस मौके का इंतजार करते रहे थे, जब कोई अंपायर ऐसा आए, जो उन्हें गोद लेकर उस ‘रन-अप’ पर खड़ा कर दे, जहां से वे ताबड़तोड़ विकेट चटका सकें- ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने अपने क्रिकेट के लंबे करिअर में किया था और बेहिसाब शोहरत पाई थी। शायद इमरान को मालूम था कि प्रतिद्वंद्वियों के पैर उखाड़ने का हुनर उनमें है तो जरूर, पर पाकिस्तानी सरजमीन का अंपायर उनके खेल कौशल को ‘नो बॉल’ तब तक करार करता रहेगा, जब तक वे अपने को उनके फरमे में नहीं ढाल लेते हैं।

पाकिस्तान में हुए हाल के आम चुनाव के नतीजे आने से पहले ही यह तय हो गया था कि नवाज शरीफ और उनकी पार्टी पर गाज गिरने वाली है और फौज की नई पसंद इमरान खान हैं। चुनाव प्रचार के दौरन आरोप लगने लगे थे कि इमरान को फौज का समर्थन मिल रहा है, इसलिए वे प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। राजनीतिक आरोपों के अलावा उन पर व्यक्तिगत व्यभिचार के आरोप भी लगे थे। यह आरोप बहुत गंभीर थे और किसी भी राजनेता के सार्वजनिक जीवन को दफ्न करने के लिए काफी थे। पर ऐसा हुआ नहीं। मत पेटियों ने वैसे ही फैसले उगले, जैसे फौज को पसंद थे।

ऐसा सिर्फ इमरान खान के साथ नहीं हुआ। पाकिस्तान की तमाम आतंकी तंजीमें, जिनके बारे में कहा जा रहा था कि उन्हें व्यापक जनसमर्थन हासिल है, चुनाव में औंधे मुंह गिरीं। वे चुनाव में बड़े जोर-शोर से उतरी थीं- उनकी तैयारी पूरी थी, उनके पास संसाधन थे, कट्टरपंथियों का समर्थन था और कई ऐसे ‘पोस्टर बॉय’ भी थे, जिनकी आम आवाम में गहरी पैठ थी। राजनीतिक जानकारों का अनुमान था कि इस चुनाव में वे पाकिस्तानी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रभावी घुसपैठ करने में कामयाब रहेंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। ऐसा न होने की वजह आम अवाम का कट्टरपंथियों से मोहभंग नहीं था, बल्कि फौज की रणनीति थी। चरमपंथियों को ‘रन आउट’ करना फौज के लिए जरूरी था। फौज नहीं चाहती थी कि उसके द्वारा ‘पोषित नॉन स्टेट’ ‘प्लेयर्स स्टेट प्लेयर्स’ हो जाए, उसके कामकाज में दखलंदाजी करने की स्थिति में आ जाए। पाकिस्तानी फौज के लिए जरूरी था कि आतंकी तंजीमें फौज के साए में ही रहें, उसकी मोहताज रहें और उसके इशारे पर ही अपने क्रियाकलापों को अंजाम दें। उनकी चुनावी जीत उनको बेलगाम कर देती और फौज के हाथ से उनकी नकेल छूट जाती।

वास्तव में जो कुछ भी हुआ, वह फौज द्वारा पाकिस्तानी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपने तरीके से चलाने की रणनीति के तहत हुआ है। चुनाव प्रक्रिया लोकतांत्रिक सरीखी जरूर थी, पर उसका नतीजा पूरी तरह से ‘फिक्स्ड मैच’ की तरह था। खूब चौके-छक्के पड़े, धुआंधार गेंदबाजी हुई, रोमांच और सस्पेंस भी रहा, पर वही टीम जीती, जिसको जीतना था। इमरान खान ने अपने मुल्क के अवाम से वादा किया है कि वे एक नया पाकिस्तान बनाएंगे। नए पाकिस्तान में क्या-क्या होगा, हमें अभी मालूम नहीं है। हां, कुछ जुमले जरूर उछाले गए हैं, जिनमें पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को बीमारी से पहलवानी तक ताबड़तोड़ पहुंचाने की बात कही गई है। नए प्रधानमंत्री ने एक तरफ तो अपने अब तक रहे आका अमेरिका को बड़ी बहादुरी से डांटा है, तो दूसरी तरफ नई पसंद चीन को पुचकारा है। उनके बयान ठीक वही हैं, जो जनरल साहबों ने उन्हें कंठस्थ कराए हैं।

ऐसी स्थिति के चलते हमें पाकिस्तान से और भी ज्यादा चौकन्ना हो जाना चाहिए। भारत में बैठे हुए कुछ जानकार पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने की हिमायत कर रहे हैं, जिससे उसके सामने खड़ा भीषण संकट टल जाए। कुछ और दोस्ती का पैगाम लेकर टहल रहे हैं। इमरान खान के उस बयान से वे प्रभावित हैं कि अगर हिंदुस्तान दोस्ती की तरफ एक कदम बढ़ाएगा तो वे दो कदम चलेंगे। पाकिस्तान की सत्तर साल से अपनाई हुई चाल, उसका चरित्र और हाल के चुनाव में फौज की भूमिका को मद्देनजर रखते हुए कोई भी नरम नीति या दोस्ताना पहल खामखयाली ही साबित होगी। पाकिस्तान पूरी तरह से जनरल साहबों के कब्जे में है और हिंदुस्तान के प्रति उनका क्या रवैया है, यह जग जाहिर है। चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो, खालिस्तान का या फिर भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध चलाने की उनकी वर्षों पुरानी मुहिम, सब अपनी जगह कायम है। इमरान खान के आने से उसमें कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है। संभावना इसकी ज्यादा है कि फौज इमरान खान के तेज-तर्रार मिजाज और आक्रामक खेलने की शैली का फायदा अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करे। ‘पोस्टर बॉय’ इमरान की मजहबी जुबान को हथियारों से लैस करके वे हमारे देश में और बड़ा संकट पैदा कर सकते हैं।

पाकिस्तान बर्बादी की कगार पर है। वहां आर्थिक संकट गहरा रहा है, सिविल सोसाइटी तहस-नहस हो चुकी है, मुहाजिर अपने हाल पर रो रहे हैं और सिंध-बलूचिस्तान प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा नहीं रहना चाहते हैं। उधर चीन अपने दमखम और खरीद-फरोख्त के जरिए पाकिस्तान के एक बड़े हिस्से पर अपनी प्रभुसत्ता कायम कर चुका है। अफगानिस्तान पहले ही अपना पल्लू झाड़ चुका है। इतना कुछ होने के बावजूद भारत जैसे देश को ऐसी कौन-सी जरूरत आन पड़ी है कि वह पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाने या निभाने के लिए आतुर हो? पहले अमेरिकी और यूरोपीय दबाव होने की दलील दी जाती थी। अब वह दलील भी खारिज हो चुकी है। अब समय आ गया है कि भारतीय नीति अपनी आखें पाकिस्तान से फेर ले। पड़ोसी से दुआ-सलाम से भी बचे, पर साथ में उस पर कड़ी नजर रखे। कई सेंधें लग चुकी हैं- उनको सिर्फ भरना नहीं है, बल्कि नई सेंध लगने से पहले अपनी दीवारों को और मजबूत करना है।

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