ताज़ा खबर
 

भाषा : भारतीय राष्ट्रवाद और भाषाएं

असल में किसी भाषाभाषी में जब उच्चता का बोध आ जाता है, तो वह दूसरी भाषा नहीं सीखना चाहता।

हिंदी भाषा

प्रसिद्ध विचारक बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को एक ‘कल्पित समुदाय’ बताया था, जहां व्यक्ति अपनी पहचान को इस राष्ट्रीयता की परिधि में दूसरों से जोड़ता है। इसमें एंडरसन भाषा को एक प्रमुख प्रतीक बताते हैं, जिससे इस ‘समुदाय’ की कल्पना संभव हो पाती है। यानी कोई भाषा अपने समाज को जोड़ती है और वही उसकी राष्ट्रीय पहचान भी होती है। निर्मल वर्मा ने भी एक प्रसंग में स्वीकार किया है कि ‘भाषा अपने समाज को एक घेरे में रखती है।’ इसके बाद ही कोई राष्ट्र एक प्रशासनिक इकाई के रूप में खुद को संवारता-सहेजता है और इस क्रम में भौगोलिक सीमा के रेखांकन के साथ प्रशासनिक तंत्र वहां झंडा, राष्ट्रभाषा, राष्ट्रगान और सांस्कृतिक प्रतीकों को केंद्र में रख कर अपने समाज को जोड़ने का उपक्रम करता है।

भारतीय ‘राष्ट्रवाद’ स्वतंत्रता-संघर्षों की उपज है। स्वतंत्रता-आंदोलनों में सामान्य सहभागिता से लेकर आत्म-बलिदान तक के पीछे प्राय: राष्ट्रवाद की भावना ही प्रेरक होती थी। तत्कालीन स्वतंत्रता-संघर्ष के नेताओं द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण के उद्देश्य से इस भावना को नियोजित ढंग से पोषित भी किया जाता रहा। स्वदेशीकरण से लेकर एकीकरण की प्रक्रिया के बरक्स किसी विदेशी शक्ति का होना भी राष्ट्रीय भावना के विकास में सहयोगी थी। देश में स्थानीय अस्मिताई प्रतीकों में पारस्परिक विभेद के बावजूद केंद्रीय स्तर पर एक राष्ट्रीय भावना विकसित होती थी।

हालांकि तत्कालीन समाज में बौद्धिक स्तर पर राष्ट्रीय एकता की एक माध्यम संपर्क-भाषा के रूप में अंगरेजी भी थी। लेकिन स्वतंत्रता-आंदोलन की व्यापकता और स्वदेशीकरण की स्थिति में राष्ट्रीय प्रतीकों के चयन में महात्मा गांधी ने हिंदी को एक संपर्क-भाषा ‘हिंदुस्तानी’ के रूप में आगे बढ़ाया। अंगरेजी दासता और सघन बहुभाषिक समाज के बीच गांधी ने 1919 में जलंधर में कांग्रेस के मंच से घोषित किया कि ‘अब से कांग्रेस के सभी कार्यक्रम देश के एक तिहाई से अधिक आबादी के समझ सकने वाली भाषा ‘हिंदी’ में होंगे।’ इसके क्रियान्वयन के लिए तत्कालीन कांग्रेस-सदस्यों को हिंदी सिखाने के लिए देश के विभिन्न प्रांतों में हिंदी-शिक्षक भेजे गए।

भारतीय राष्ट्रवाद की एक बड़ी दुविधा इसके प्रतिफलन को लेकर थी, जहां कुछ असहमतियां भी मुखर रहीं। इसके पीछे भारतीय वैविध्य के निर्णायक घटक जैसे जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र आदि थे। यही कारण है कि महात्मा गांधी और आंबेडकर के ‘राष्ट्रवाद’ की सोच में उद्देश्यगत अंतर था। इन सबके बावजूद तत्कालीन परिदृश्य में भाषाई पक्षों का प्रतिनिधित्व सही ढंग से नहीं हो पाया।

बहरहाल, आजादी के बाद राष्ट्र को एक भावनात्मक मानचित्र समझ लिया गया और राष्ट्रवाद को देश की समकालीन राजनीति में सक्रिय दल ही अपने हिसाब से व्याख्यायित, अनुप्राणित और प्रसारित करते रहे। लोकतांत्रिक सरकारें बनीं, लेकिन देश की आंतरिक चुनौतियों की किसी स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश की तरह नहीं लिया गया। इसमें राष्ट्रवाद को महज एक सत्ताई उपक्रम बना लिया गया। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में किसी स्थानीय समाजों की अपेक्षाओं के मध्य ‘राज्यों के संघ’ के रूप में भी देश के अनेक महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की उपेक्षा की गई, जो आज तक जारी है। इस क्रम में देश की राष्ट्रभाषा और राजभाषा का सवाल भी है।

देश की बाह्य परिधि में सोलह सौ से अधिक आंतरिक भाषाई सीमाएं भी हैं। ये सीमाएं मुखरित न हों, इससे बचने के लिए 2007 में भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा प्रस्तावित ‘भारतीय भाषाओं का नया सर्वेक्षण’ (एनएलएसआइ) के प्रस्ताव को व्यापक सहमति के बावजूद तत्कालीन गृह मंत्रालय ने खारिज कर दिया था। गौरतलब है कि देश में आज तक भाषाओं की वास्तविक स्थिति जानने की कोई व्यवस्था नहीं है। आज भी एकमात्र स्रोत लगभग सौ साल पुराने ग्रियर्सन के नेतृत्व में संपन्न भाषा सर्वेक्षण पर आश्रित होना पड़ता है। इसका नुकसान यह हुआ कि देश में भाषाओं को लेकर कोई स्पष्ट और दूरदर्शी नीति नहीं है। कुशल भाषिक योजना के अभाव में राष्ट्रभाषा की दावेदार हिंदी को एक बड़े भू-भाग को हिंदी-पट्टी नाम दे दिया गया, जिससे इस व्यापक क्षेत्र की आबादी की द्वितीयक भाषा हिंदी को मातृभाषा बता कर न सिर्फ उनको व्यापक परिक्षेत्र में वास्तविक मातृभाषाओं से दूर कर दिया गया, बल्कि द्वितीयक क्षमता का नागरिक भी बने रहने को मजबूर किया गया।

इससे हिंदी का नुकसान यह हुआ कि देश के दूसरे क्षेत्रों में इसे शक की दृष्टि से देखा जाने लगा और आज देश में ही इससे भयाक्रांत लोगों की संख्या कम नहीं है। इतना ही नहीं, यहां दूसरे स्तर की उनचास से अधिक भाषाओं को हिंदी की बोलियां बता कर इनकी अस्मिता को ऐसे लोगों के भरोसे छोड़ दिया गया, जो भाषाओं को माध्यम बना कर इसके हित से अधिक तुष्टीकरण को बढ़ावा देते हैं। हिंदी को इसके भौगोलिक पहचान के बिना भी द्वितीय भाषा के रूप में व्यवस्थित किया जा सकता था, तब देश की अखिल भारतीय पहचान इसमें शामिल हो सकती थी। इस स्थिति में यह देश की सभी भाषाओं से शब्द स्वीकार कर पाती और वर्तमान से बेहतर देश की संपर्क भाषा बन सकती थी। दूसरी स्थानीय भाषाओं के उभार को हिंदी के लिए खतरे की तरह नहीं देखा जाता। हिंदी का लोकतांत्रिक चरित्र और मजबूत होता। देश की स्थानीय भाषाओं में भी बिना किसी हीन भावना के साहित्य विकसित हो पाता।

सवाल है कि अगर कोई राष्ट्र अपने नागरिकों के प्रति जवाबदेह है, तो वह अपनी स्थानीय सांस्कृतिक समृद्धि, पहचान और सौंदर्य की अवहेलना कैसे कर सकता है? बिना स्थानीयता के किसी केंद्र की कल्पना संभव है? हजारी प्रसाद द्विवेदी ने चेताया था कि ‘भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुंदर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता है।’ सवाल है कि भारतीय ‘राष्ट्र’ के मुखर चेहरे में स्थानीयताओं को कितना स्थान मिला है? यह अनायास नहीं है कि भारतीय राष्ट्र एक ऐसे मुहाने पर आ चुका है, जहां स्थानीयताओं की उपेक्षा का खमियाजा यहां के रहन-सहन और जीवन पर पड़ रहा है।

असल में किसी भाषाभाषी में जब उच्चता का बोध आ जाता है, तो वह दूसरी भाषा नहीं सीखना चाहता। जबकि भारतीय परिस्थिति ऐसी नहीं है। 2001 में परवेज हुदभाय को दिए एक साक्षात्कार में अमेरिकी भाषाविद चोमस्की ने कहा था कि ‘अगर आप भारत में किसी टैक्सी चालक से बात करें, तो संभव है कि वह पांच अलग-अलग भाषाएं जानता हो, वह बचपन से अपने गली-मुहल्लों में ये भाषाएं सीख जाता है। इस प्रकार वे लोग किसी अमेरिकी से ज्यादा सभ्य होते हैं, क्योंकि अमेरिकी सिर्फ एक भाषा जानता है।’ अब यह दोष भारतीय ‘राष्ट्र’ के कर्णधारों का है कि वे देश की जनता को इस माने में लगातार असभ्य बना रहे हैं। आजादी के छह दशक बाद भी राजभाषा के सवाल को अंगरेजी से मुक्त नहीं कराया जा सका है। किसी राष्ट्र के निर्माण में राष्ट्रभाषा अगर आवश्यक है, तो उससे अधिक आवश्यक वहां की स्थानीयता को निष्प्राण होने से बचाना भी उसी राष्ट्र की चिंता होनी चाहिए।

फ्रांस में प्रचलित एक कहावत के अनुसार ‘स्वाभाविक रूप से फ्रेंचभाषी होने के कारण आप फ्रांस के नागरिक हैं… उस पूरे क्षेत्र पर आपका अधिकार है, जहां तक फ्रेंच बोली जाती है।’ इस तर्क पर देखा जाए तो भारतीय राष्ट्र की सीमा का विस्तार सिनेमा और पारगमन के फलस्वरूप व्यापक भी हुआ है, लेकिन इस व्यापकता में सांस्कृतिक विस्तार से अधिक पूंजी का वर्चस्व है। ऐसा राष्ट्र किसी काम का नहीं, जो सांस्कृतिक रूप से खोखला हो और इसमें आम जनता का उपयोग राष्ट्र-निर्माण में महज किसी शुष्क र्इंट की तरह हुआ हो।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App