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दूसरी नजरः उपयोग न करने में ही शक्ति है

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 7 कहती है: ‘बैंक के गवर्नर से परामर्श के बाद केंद्र सरकार समय-समय पर बैंक को दिशा-निर्देश दे सकती है, जिसे वह संभवत: जनहित में अत्यावश्यक समझती है।’

Author November 4, 2018 4:33 AM
प्रतीकात्मक फोटो

भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 7 कहती है: ‘बैंक के गवर्नर से परामर्श के बाद केंद्र सरकार समय-समय पर बैंक को दिशा-निर्देश दे सकती है, जिसे वह संभवत: जनहित में अत्यावश्यक समझती है।’ कानून में यह अनुच्छेद है, लेकिन इसका कभी उपयोग नहीं किया गया। इस अनुच्छेद की शक्तियां इसका उपयोग न करने में निहित हैं। संसद ने सरकार को क्या कहा, इसे इस तरह से कल्पित किया जा सकता है :

धारा 7 का प्रयोजन
– आप सरकार हैं, पर याद रखिए कि यहां रिजर्व बैंक (आरबीआइ) भी है।
– हम आपको दिशा-निर्देश जारी करने की शक्ति देंगे लेकिन…. (विराम), आप गवर्नर से सलाह-मशविरे को बाध्य हैं। ध्यान रहे, आपको गवर्नर से सलाह करनी है, बैंक से नहीं या बैंक से निदेशक मंडल से नहीं।
– हम मान लेते हैं कि आप गवर्नर से नियमित सलाह-मशविरा करते हैं, लेकिन स्मरण रहे कि अगर नियमित विचार-विमर्श में आप किसी समझौते तक नहीं पहुंचे तो इसके बाद सांविधिक परामर्श है। और जब आप सांविधिक परामर्श करते हैं तो अपने दिमाग में यह बात रखें, आरबीआइ एक्ट के अनुसार, आरबीआइ का यह कर्तव्य है कि, ‘वह बैंक नोट जारी करने का नियमन करे और मौद्रिक स्थिरता के दृष्टिगत आरक्षित निधियों की सुरक्षा करे।’
– सांविधिक परामर्श के अंत में, आप और गवर्नर संभवत: सहमत नहीं हों पाएं। इसके बाद आप क्या करेंगे? अपनी बात रखने के बाद, क्या आप इसे वहीं छोड़ देंगे और उम्मीद करेंगे कि घटनाक्रम जैसी शक्ल लेगा, गवर्नर अपने विचार बदल लेंगे? या आप परमाणु बटन दबा देंगे और इसके बाद जो होना अपरिहार्य है, उसके लिए खुद को तैयार रखेंगे- गवर्नर का त्यागपत्र?

आरबीआइ से बैर
ऊपर उल्लिखित संवाद दरअसल काल्पनिक है, पर कानून की भावना यही है। हालिया घटनाक्रम स्पष्ट रूप से जाहिर करते हैं कि सरकार ने नहीं किया (भावना का सम्मान।
जब यह सरकार गवर्नर के साथ नियमित परामर्श के लिए बैठती है तब इस काल्पनिक संवाद को अपने मन में दोहराएं। इसका परिणाम सरकार और आरबीआई के बीच अप्रत्याशित गतिरोध है।
अब घटनाक्रम का तारतम्य देखें। डॉ. रघुराम राजन का तिरस्कार हुआ। फिर भी सितंबर, 2017 में अपना शुरुआती कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद वे सेवाएं जारी रखने के इच्छुक थे। उन पर ‘पर्याप्त भारतीय’ न होने के आरोप लगे और एक तरह से उन्हें जबरन विदा किया गया। डॉ. उर्जित पटेल को लाया गया, लेकिन कुछ ही हफ्तों में विमुद्रीकरण जैसी भयंकर भूल से उनके रुआब घट गया। वैश्विक केंद्रीय बैंक समुदाय में डॉ. पटेल की प्रतिष्ठा धूमिल हो गई। डॉ. पटेल ने अपनी स्वतंत्रता और प्राधिकार पर दृढ़ता से जोर देकर अपनी छवि को हुए नुकसान की भरपाई का प्रयास किया। सरकार की शुरुआती चिंता ब्याज दरों की थी, लेकिन इस मुद्दे पर पटेल मजबूत स्थिति में थे- उनको मौद्रिक नीति समिति का समर्थन था। जल्दी ही सरकार को महसूस हो गया कि अकेले ब्याज दर ही ‘विकास में अवरोध’ नहीं है। दूसरी दरारें भी सामने आ गर्इं।

निर्माण क्षेत्र का ही मामला लें। विमुद्रीकरण ने भवन निर्माण क्षेत्र को गहरी चोट पहुंचाई। इसके बावजूद रीयल स्टेट फर्मों की शेयर कीमतें दोगुने से भी ज्यादा हो गर्इं! हालांकि जनवरी, 2018 से इनकी शेयर कीमतों में चालीस फीसद की गिरावट आई है (और इसमें से इक्कीस फीसद सिर्फ पिछले छह हफ्तों में)। यह आश्चर्यजनक नहीं है, यदि आप यह देखें कि अपने बैंक कर्जों के पुनर्भुगतान के लिए रीयल स्टेट फर्में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी का रुख कर रही हैं; एनबीएफसी ने वाणिज्यिक पत्र जारी कर पैसा जुटाया; और इस पत्र को मुख्यत: म्यूचुअल फंडों और दूसरे फंड आधारित निवेशकों ने खरीदा। लेकिन आइएलएंडएफएस के भहराने के बाद इस कड़ी पर भी मार पड़ी। आज, एनबीएफसी नया फंड जुटाने में असमर्थ हैं, जो क्षेत्र एनबीएफसी के फंड पर निर्भर थे, सिकुड़ते चले गए,और छोटी और मझोली फर्में, जो परंपरागत रूप से एनबीएफसी से कर्ज हासिल करती थीं, मंझधार में छोड़ दी गर्इं। बाजार में भय और गुस्सा है।

दरारें
सरकार इन तीन दरारों से निपटने को व्यग्र है : पहला है तरलता, खासकर एनबीएफसी की तरलता की स्थिति और उनकी कर्ज और भुगतान संबंधी आसन्न प्रतिबद्धताओं का। दूसरी है सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पूंजी का क्षरण, अपर्याप्त पूंजी और कर्ज देने में उनकी असमर्थता, जिसकी वजह से कई आरबीआइ की तत्काल सुधारात्मक कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं। तीसरी है लघु और मझोले उद्योगों के लिए ‘विशेष खिड़की’ की शुरुआत जो इन छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज मुहैया करा सके जो विमुद्रीकरण और दोषपूर्ण जीएसटी से तबाही के बाद अब एनबीएफसी संकट की मार झेल रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अपनी बात मनवाने के लिए रिजर्व बैंक को राजी करने में विफल रही है। सरकार द्वारा आरबीआइ बोर्ड में अपने नए नामितों के जरिए गवर्नर पर दबाव बनाने के प्रयास भी विफल हो गए प्रतीत होते हैं।

आयव्ययक कर अनुमानों और वास्तविक प्राप्तियों के बीच बढ़ता फासला भी सरकार की परेशानी और बढ़ा रहा है। विमुद्रीकरण से एक रुपया भी ‘अर्जित’ करने में विफलता (यद्यपि दावे चार लाख करोड़ के थे) के बाद सरकार ने अपनी नजर रिजर्व बैंक की सुरक्षित निधियों पर गड़ा रखी है। यह माना जा रहा है कि सरकार ने आयव्ययक खर्चों को पूरा करने और वित्तीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के लिए रिजर्व बैंक से एक लाख करोड़ की मांग की है। यह भी माना जा रहा है कि गवर्नर ने सिरे से इनकार कर दिया। यह बारूद के ढेर में आग लगाने वाली चिनगारी है। बुधवार, 31 अक्तूबर को दिल्ली और मुंबई में यह चर्चा आम थी कि सरकार एक या अनेक मुद्दों पर धारा सात के तहत दिशानिर्देश जारी करने वाली है और इसके विरोध में गवर्नर तत्काल इस्तीफा दे देंगे। अनपेक्षित रूप से सरकार ने बुधवार को ही बयान जारी कर कहा कि वह आरबीआइ की स्वायत्तता का सम्मान करती है और उससे सामान्य परामर्श कर रही है। अगर स्थिति सामान्य थी तो यह बयान अनावश्यक था, लेकिन यदि स्थिति सामान्य नहीं थीं तो यह बयान कुटिल था! इस तरह शुक्रवार को जब मैं इस लेख को पूरा कर रहा हूं, यहां चिनगारी भी है और बारूद का ढेर भी। क्या इनमें से किसी एक को दूसरी की तरफ बढ़ाया जाएगा?

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