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सामूहिक विवेक का आह्वान

कई बरस बाद ‘प्रतिरोध’ को उसकी आवाज और एक नई वैधता मिली है। पिछले दो हफ्तों में करीब पच्चीस लेखकों ने अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा दिए हैं...

Author October 18, 2015 11:44 AM

कई बरस बाद ‘प्रतिरोध’ को उसकी आवाज और एक नई वैधता मिली है। पिछले दो हफ्तों में करीब पच्चीस लेखकों ने अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा दिए हैं और कुछ ने अकादेमी से इस्तीफा दे दिया है। इनमें से अधिकतर लेखक प्रांतीय भाषाओं में लिखते हैं। वे शांत, एकांतप्रिय नागरिक हैं, जो परिस्थितियों से जूझते हुए शब्द साधना में लगे रहते हैं। सरकार का विरोध, अमूमन उनका काम नहीं है।

उनके गरिमामय वक्तव्य यह दिखाते हैं कि असहिष्णुता के चतुर्दिक उभार, कुछ विद्वानों और तर्कवादियों की हत्याओं, लेखकों और शिक्षाविदों को मिल रही धमकियों, और घर में गोमांस रखने के शक में भीड़ के हाथों एक गरीब आदमी की पीट-पीट कर की गई हत्या, आदि घटनाओं से उन्हें कितनी गहरी पीड़ा हुई है। वे सत्ता में बैठे लोगों की उदासीनता या उनकी मिलीभगत से हैरान हैं।

सम्मान लौटाना एक प्रतीकात्मक कार्रवाई है। रवींद्रनाथ ठाकुर, शिवराम कारंत और खुशवंत सिंह ने भी ऐसा किया था। इससे लेखक के उस काम की अहमियत कम नहीं हो जाती, जिसके लिए उसे पुरस्कृत किया गया था। अलबत्ता इन लेखकों ने असहिष्णुता की ताकतों और उनके सरपरस्तों के विरुद्ध खुलेआम खड़े होकर निजी स्तर पर एक बड़ा जोखिम मोल लिया है। ये ताकतें, जिन्हें अपमान करने में महारत हासिल है, उनके ऐकांतिक जीवन को तबाह कर सकती हैं।

इन लेखकों पर अवसरवाद और एकतरफा होने के आरोप लगाए गए हैं। उनसे पूछा गया है कि उन्होंने तब क्यों नहीं विरोध जताया जब दंगे हुए या नागरिक अधिकार कुचले गए। कोई केवल इस वजह से विरोध जताने का अधिकार नहीं खो देता कि उसने हर निंदनीय घटना पर समान रूप से रोष प्रकट नहीं किया। फिर, आरोप सामान्यतया सही नहीं है। मसलन, नयनतारा सहगल ने इमरजेंसी की घोषणा होने पर साहित्य अकादेमी के अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
सामूहिक अंत:करण
देश के अंत:करण को जगाने के लेखकों के आह्वान ने आम नागरिकों को उद्वेलित किया है। देश का एक सामूहिक विवेक है, भले वह धर्मगत, जातिगत और भाषागत पूर्वाग्रहों के कारण क्षत-विक्षत हो गया हो। यह विवेक एक व्यक्ति के विरोध या नाफरमानी से उठ खड़ा हो सकता है।

1930 में, बस घुटने तक धोती लपेटे एक पतला-दुबला आदमी झुका और उसने कलछी में समुद्र से मुट्ठी भर नमक उठाया।
1955 में, एक गरीब अश्वेत औरत ने सरकारी बस में अश्वेतों के लिए आरक्षित अपनी सीट छोड़ने से मना कर दिया।
1962 में, एक ऊंचे कद का हट्टा-कट्टा आदमी होठों पर मुस्कान लिए जेल में दाखिल हुआ, और वहां सत्ताईस वर्षों तक रहा, संकल्पित और अपराजित।

इनमें से विरोध का हर कृत्य एक क्रांति की शुरुआत का संकेत था, जिसने इतिहास को बदल दिया। भारत ने दो सौ साल से ज्यादा समय से उस पर हुकूमत करते आ रहे औपनिवेशिक हुक्मरानों को निकाल बाहर किया, और स्वतंत्र गणराज्य बन गया। अमेरिका नस्लभेद खत्म करने के लंबे सफर पर निकल पड़ा। दक्षिण अफ्रीका ने रंगभेद का खात्मा कर अपनी खोई हुई आत्मा फिर से पा ली और अपनी जनता के नागरिक अधिकार बहाल किए।

सहमति का दबाव
हम व्यक्ति के स्तर पर सिविल नाफरमानी के उदाहरण बराबर देख रहे हैं, पर क्या हम ऐसे कृत्य से प्रेरित होते हैं? दुख की बात है कि इसका उत्तर नकारात्मक है। इरोम शर्मिला ने पंद्रह बरसों से खाना छोड़ रखा है, अपनी इस मांग की खातिर कि सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम को रद्द किया जाए। लेकिन उन्हें और उनके संघर्ष, दोनों को काफी हद तक भुला दिया गया है। हमने इस अमानवीय कानून में, जो कि हमारे लोकतंत्र पर एक धब्बा है, मामूली बदलाव करने की भी जहमत नहीं उठाई।
नागरिक के कर्तव्य मतदान से ही शुरू और वहीं समाप्त नहीं हो जाते।

हमारा दायित्व केवल शासन चलाने के लिए सरकार को चुनना भर नहीं है। हमारे लिए हर समय यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सरकार रोजाना अपना ‘राजधर्म’ निबाहे। शासकों पर अंकुश रखने का असहमति से बढ़ कर कारगर औजार कोई दूसरा नहीं हो सकता। असल में, एक बुद्धिमान शासक अपने आलोचकों का स्वागत करेगा। जैसा कि संत तिरुवल्लुवर ने कहा है, ‘एक शासक, जो आलोचना को कतई बर्दाश्त नहीं करता, गर्त में गिरेगा, भले उसके कोई दुश्मन न हों।’

हमारे सामाजिक संगठन हम पर सहमत होने का दबाव डालते रहेंगे, एक खास तरह से सोचने का, बहुसंख्यक जो चाहते हैं उसे मानने का। हममें से कई लोग, बिना विचारे, इस मिथ को स्वीकार कर लेते हैं कि देश के लिए ‘मजबूत’ (पढ़िए: प्रभुत्वशाली) नेता बेहतर है बनिस्बत नरम (पढ़िए: सहमति बनाने वाले) नेता के।

दूसरा मिथ यह है कि तेज आर्थिक विकास तभी हो सकता है जब ऐसी विचार पद्धति स्वीकार की जाए जिसके गिर्द कोई बहस या असहमति न हो (तथाकथित सिंगापुर मॉडल)। एक और मिथ यह है कि महान राष्ट्र का मतलब है विशाल सेना, एटमी हथियार और भयभीत पड़ोसी। दुनिया का इतिहास बताता है कि इनमें से कोई भी धारणा सच नहीं है। जबकि खुले, बहुलतावादी और सहिष्णु समाजों ने- जिन पर उदार और विनम्र नेताओं ने शासन किया- अनेक क्षेत्रों में उत्कृष्टता और अप्रत्याशित समृद्धि हासिल की है।

लेखक जिन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनके न केवल राजनीतिक आशय हैं, बल्कि गहरे सामाजिक परिणाम भी हैं। सभी भारतीय क्या धर्म या आहार या भाषा या पहनावे की बाबत एक ही धारणा को मानने के लिए बाध्य हैं? और वे सभी, जो इसके लिए राजी नहीं हैं, सार्वजनिक जीवन, सार्वजनिक संस्थानों, सार्वजनिक विमर्शों और यहां तक सार्वजनिक स्थानों से बहिष्कृत कर दिए जाएंगे?

भिन्न नजरिया- असहमति- स्वतंत्र समाज की पहचान है। कल्पना कीजिए कि वाल्तेयर ने अगर यह कहा होता कि ‘‘आपके विचार से मैं सहमत नहीं हूं और आपने जो कहा उसके लिए मैं आपको मार डालूंगा।’’ क्या तब नेता सिर्फ यह कहता कि वह ‘व्यथित’ है। लेखक जो कह रहे हैं वह यह है कि ऐसे में नेतृत्व को क्षुब्ध होना चाहिए और हिंसा तथा असहिष्णुता की विनाशकारी ताकतों को नेस्तनाबूद कर देना चाहिए।

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