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दूसरी नजर: तिल-तिल कर मरता उदार लोकतंत्र

सन 1789 की फ्रांस की क्रांति के दौरान ये शब्द निकले थे- स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा या मृत्यु। फ्रांसीसी गणतंत्र और फ्रांस के लोगों के लिए हमेशा बने रहने वाले इन शब्दों को फ्रांस के लोगों और उन सबको, जो इसकी सीमाओं के भीतर रहने के इच्छुक हैं, को याद दिलाने के लिए कुछ देश राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आलोचना कर रहे हैं।

फ्रांंस में हुई आतंकी घटना के विरोध में प्रदर्शन करते लोग।

भारत के संविधान में एक प्रस्तावना है। बहुत सारे लोग इसकी प्रस्तावना को नहीं पढ़ते और न इसकी महत्ता को समझते हैं। यहां तक कि ‘मौलिक अधिकार’, ‘अनुच्छेद 32’ या ‘आपातकाल’ जैसे चुनिंदा प्रावधानों से वाकिफ लोग भी इस प्रस्तावना के शब्दों से अनजान हो सकते हैं।
जिस दिन संविधान सभा ने इसे स्वीकार किया था, प्रस्तावना में कहा गया था कि ‘हम, भारत के लोग, सत्यनिष्ठापूर्वक भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं’।

(जनवरी 1977 में राष्ट्र को और परिभाषित करने के लिए इसमें ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए।) इसके बाद प्रस्तावना में यह भी कहा गया कि हम ‘इसके सभी नागरिकों की न्याय, आजादी, समानता सुरक्षा के लिए और उन सबके बीच भाईचारे को बढ़ावा देने… का संकल्प करते हैं।’ये वे शब्द हैं, जो यह परिभाषित करते हैं कि एक राष्ट्र के रूप में हम क्या हैं और भारतीय गणतंत्र जो होगा, वह उदार लोकतंत्र होगा।

ये शब्द हमेशा के लिए

सन 1789 की फ्रांस की क्रांति के दौरान ये शब्द निकले थे- स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा या मृत्यु। फ्रांसीसी गणतंत्र और फ्रांस के लोगों के लिए हमेशा बने रहने वाले इन शब्दों को फ्रांस के लोगों और उन सबको, जो इसकी सीमाओं के भीतर रहने के इच्छुक हैं, को याद दिलाने के लिए कुछ देश राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की आलोचना कर रहे हैं। एक इस्लामी आतंकी के हाथों सैमुअल पैटी नाम के शिक्षक की हत्या के बाद मैक्रों ने कहा- ‘शांति के लिए हम सभी मतभेदों को स्वीकार करते हैं। हम नफरत फैलाने वाले भाषण बर्दाश्त नहीं करेंगे और उचित बहस का समर्थन करते हैं। इसे जारी रखेंगे। हम हमेशा मानवीय गरिमा और सार्वभौमिक मूल्यों को बनाए रखेंगे।’

कई देशों ने किसी न किसी रूप में इन तीन शब्दों को अपने संविधान में शामिल किया है। वे उदार लोकतंत्र होने का दावा करते हैं, जैसे भारत करता है। हालांकि लगातार भारत सहित कई देशों में ऐसे दावे खोखले होते जा रहे हैं। कई देश तो लोकतंत्र की पहली ही परीक्षा में नाकाम हो गए हैं, अगली परीक्षा कि क्या लोकतंत्र उदार है, के बारे में कुछ नहीं कहना।

अंधेरे की ओर

हाल में टाइम पत्रिका के अंक में दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची आई है। छह राष्ट्र/ सरकार प्रमुख मैंने गिने- नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग, एजेंला मर्केल, जायर बोलसोनारो (ब्राजील), डोनाल्ड ट्रंप और साइ इंग-वेन (ताइवान)। छह में से कोई भी यह दावा नहीं करेगा कि दो लोग लोकतंत्रों का नेतृत्व कर रहे हैं। वास्तव में मोदी और ट्रंप चुनावी लोकतंत्रों के नेता हैं, लेकिन फिर भी वे ‘उदार’ होने के ठप्पे को खारिज करेंगे।

सिर्फ मर्केल और साइ ही सही मायनों में उदार लोकतंत्र का नेतृत्व कर रही हैं। अगर आप कुछ और बड़े तथा ताकतवर देशों के राष्ट्र प्रमुखों को इसमें जोड़ लें तो और बदतर तस्वीर मिलेगी। मध्य एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और खुद हमारे पड़ोस में तानाशाही और चुनावी लोकतंत्रों के कई उदाहरण मिल जाएंगे, लेकिन सही मायनों में उदार लोकतंत्र नहीं मिलेगा।

टाइम ने मोदी के बारे में कहा था- ‘… दलाई लामा ने सद्भाव और स्थायित्व के उदाहरण के तौर पर (भारत की) प्रशंसा की है। नरेद्र्र मोदी ने इन सबको लेकर संदेह पैदा कर दिया… उनकी पार्टी ने न सिर्फ उत्कृष्टता, बल्कि बहुलताबाद को खत्म कर दिया… महामारी का संकटकाल असहमति को कुचलने का बहाना बन गया। और दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र और अंधेरे में चला गया।’

दूसरे देश भी ऐसे अंधेरे में जाने से बचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जस्टिस रुथ बैडर गिन्सबर्ग के निधन के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने एमी कोने बैरेट को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का जज नामित करने में जरा वक्त बर्बाद नहीं किया और तीस दिन के जरा से वक्त में ही अप्रत्याशित रूप से नामांकन की प्रक्रिया को पूरा कर डाला। उदारवादी अमेरिका, खासतौर से महिलाएं, समझ गर्इं कि बड़े उदारवादी हासिल जैसे स्कूलों का एकीकरण, गर्भपात का अधिकार, वहनयोग्य देखभाल कानून और बिना भेदभाव वाले आव्रजन कानूनों को पलटा जा सकता है।

हम कौन हैं?

लोकतंत्र और उदार देश समान नहीं होते हैं। लोकतंत्र बहुत छोटे से वक्त में ही अनुदारवादी लोकतंत्र में तब्दील हो सकता है, जैसा कि भारत में हो रहा है। लाखों लोगों की नागरिकता संदेह में पड़ गई है, खुल कर बोलने की आजादी को कम कर दिया गया है, मीडिया को कब्जे में कर लिया गया है, प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी गई है या काफी हद तक प्रतिबंधित कर दिया गया है, दलबदल को बढ़ावा दिया जाता है, राज्य एक धर्म या एक भाषा को संरक्षण देता है।

संस्कृति के रूप में बहुसंख्यकवाद को खत्म कर दिया गया है, अल्पसंख्यक और भेदभाव वाले समुदाय खौफ में रह रहे हैं, पुलिस अपने आकाओं की सुनती है न कि कानून की, सेना राजनीतिक मामलों पर बोलती है, कर और कानून प्रवर्तन ऐजेंसियां दमन का हथियार बन गई हैं, अदालतें कमजोर हैं, संस्थाओं को या तो हथिया लिया गया है या उन्हें शक्तिहीन कर दिया गया है और कानून का शासन खत्म हो गया है। दुखद तो यह है कि जो हो रहा है उसे कुछ ही देख पा रहे हैं। और इनमें से कुछ जो देख रहे हैं, वे चुप्पी साधे हुए हैं।

संसद में जब बिना किसी वोट के कानून पास हो रहे हों, जब राजनीतिक नेताओं को बिना आरोपों के कई-कई महीने जेल में ठूंस दिया जा रहा हो, जब लेखकों, कवियों, प्रोफेसरों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्तार्ओं पर राष्ट्रद्र्रोह के मुकदमे थोपे जा रहे हों, दिनदहाड़े सैकड़ों साल पुरानी मस्जिद को ढहा दिए जाने के मामले में कोई दोषी करार न दिया जाए, बलात्कार और उसके बाद नृशंस हत्या की शिकार लड़की के मृत्यु पूर्व बयानों के वाबजूद एफआइआर दर्ज न की जाए और कोई गिरफ्तारी न हो। जब पुलिस की शब्दावली में मुठभेड़ शब्द घुस आया हो, जब नाम के राज्यपाल निर्वाचित सरकारों के लिए रोड़े अटकाने लगें और जब अत्यंत महत्त्वपूर्ण संस्थानों को बिना मुखिया या बड़ी संख्या में कर्मचारियों के खाली पदों के साथ छोड़ दिया जाए तो देश एक कदम और अंधेरे में चला जाता है।

पिछले साल नवंबर में क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में एक बंदूकधारी ने इक्यावन लोगों की हत्या कर दी थी और दर्जनों लोगों को घायल कर दिया था। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंदा आर्डर्न ने तब कहा था- वे हमारे हैं। जिस व्यक्ति ने हमारे खिलाफ यह हिंसा की है, वह हमारा नहीं है।
मैक्रों और आर्डर्न उन कुछ नेताओं में से हैं जो उस जुबान में बोलते हैं जिसे हम सुनना चाहते हैं। जिस तरह हम उदार लोकतंत्र को मरता देख रहे हैं तो हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि ‘हम कौन हैं?’

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