ताज़ा खबर
 

तीरंदाज: छीजती मेधा के दौर में

अगर हम थोड़ी-सी भी गंभीरता से अपने आसपास देखें तो साफ हो जाएगा कि हमारे बौड़मपन की दर में लगातार वृद्धि हो रही है। तर्कनिष्ठ व्यवहार और संवाद लगातार घट रहा है और हम हर मुद्दे के अति सरलीकरण में जुटे हुए हैं। हम संकल्पना और व्यावहारिक जटिलता से मुंह चुराने लगे हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

हर बुद्धिमान व्यक्ति में एक मूर्ख छिपा होता है। पर क्या हर मूर्ख में एक बुद्धिमान व्यक्ति विद्यमान होता है? वैसे किसी अक्लमंद आदमी की बेअक्ली जल्द ही पकड़ ली जाती है। पर अक्लमंद होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वह हमेशा रोशन दिमाग ही रहेगा और उसकी बाती की लौ कभी फड़फड़ाएगी नहीं। कई बार ऐसा होगा कि उसका अक्ल से अनायास ही फासला हो जाए, पर इससे वह बेअक्ल साबित नहीं होता है। यह बात बेअक्ल पर भी लागू होती है। वह अचानक होशियारी कर सकता है, पर रहेगा बेवकूफ ही।

हम सब बहुत होशियार हैं। हमारा समाज भी ऐसा है कि हम गर्व से अपना जयघोष करते रहते हैं। पर क्या ऐसा वास्तव में है? कहीं ऐसा तो नहीं कि बुद्धिमता के दिव्यास्वपन में हम जी रहे हैं, जबकि हम बौड़म-दर-बौड़म होते चले जा रहे हैं? अगर एक तरह से देखा जाए तो पिछले कुछ सालों में वाट्स-ऐप्प यूनिवर्सिटी की शागिर्दगी जिस तरह से बढ़ी है, उससे बौड़मता का विकास साफ नजर आता है। हम मानें या न मानें, पर हम बुद्धिमता से बुद्धिहीनता की ओर सरपट फिसलते जा रहे हैं। भारत में तो अध्ययन का रिवाज नहीं है और न ही वैज्ञानिक प्रवृत्ति का चलन है। हम गंभीर अध्ययन नहीं करते हैं, पर अनुमान लगाने में विशेषज्ञ हैं, क्योंकि ज्ञान तो सब हम हजारों वर्षों पहले ही पा चुके हैं। ऐसी स्थिति में आज के हालात जानने के लिए हमारे पास पश्चिमी देशों में हो रहे शोध पर निर्भर रहने के आलावा कोई और चारा नहीं है। इन अध्ययनों से हम अपने हालात का मोटा-मोटा अंदाज लगाने के लिए मजबूर हैं।

खैर, लंदन के शोधकर्ता एडवर्ड डटन के दशकों लंबे अध्ययन के अनुसार पश्चिम के तमाम देशों में आईक्यू यानी बुद्धिलब्धता का स्तर कम होता चला जा रहा है। जिन देशों में उन्होंने अध्ययन किया, उनमें अति विकसित देश जैसे फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क, नार्वे और फिनलैंड शामिल थे। डटन ने अपने शोध में पाया कि इन देशों के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्यादा बुद्धिमान होने के बजाय मंदबुद्धि होते चले जा रहे हैं। यह देश हर साल आईक्यू पैमाने पर एक अंक का चौथाई हिस्सा खो रहे हैं। इस अध्ययन के आधार पर उनका कहना है कि हम बौड़मपन की ओर तेजी से अग्रसर हैं और अब वह दिन दूर नहीं, जब सरल संकल्पना और तर्कनिष्ठ विवेचना हमारी समझ से परे हो जाएगी। उनके हिसाब से बौड़मपन की प्रवृत्ति उन्नीस सौ नब्बे के दशक के मध्य से शुरू हो गई थी और अब वह सिर चढ़ कर बोल रही है। मजे की बात यह है कि बुद्धिमता पिछली सदी में लगातार बढ़ती रही है। जेम्स फ्लींन ने इस पर एक आधिकारिक शोध किया था, जिसमें उन्होंने पाया था कि 1930 से पश्चिमी देशों में आईक्यू की बढ़त बड़ी तेजी से हुई थी, जो 1990 के आने तक शिथिल पड़ गई थी। उसके बाद इसमें गिरावट आने लगी थी। फ्लींन का कहना है कि शुरुआती दौर में कौशल और कारीगरी जीवनयापन के लिए जरूरी थी और इस वजह से लोग बुद्धि और हाथों का उपयोग भरपूर करते थे। इसके चलते आईक्यू का स्तर भी बढ़ने लगा था।

इक्कीसवीं शताब्दी में स्किल या कौशल की जरूरत कम हो गई है और उसके साथ आईक्यू भी घट रही है। फ्लींन का मानना है कि देशों की अर्थव्यवस्थाओं में जैसे-जैसे सेवा क्षेत्र बढ़ रहा है, वैसे वैसे जनसंख्या बौड़म होती जा रही है। इस क्षेत्र में काम करने के लिए न तो कौशल की जरूरत है और न ही अपनी बुद्धि के उपयोग की। सोशल मीडिया की उपलब्धता भी हमारी बुद्धि को बहते पानी की तरह काट रही है। लोग अपना दिमाग खर्च करने की जगह फोन या कंप्यूटर पर निर्भर हो गए हैं। इससे अति सरलीकरण करने की प्रवृत्ति में भारी वृद्धि हुई है। जो चीज लोगों को एक निगाह में समझ ने नहीं आती, वह उससे हट लेते हैं। ऐसे में मेधा कमजोर होती चली जा रही है। एक और भयावह परिदृश्य उत्पन्न हो रहा है। जो लोग मेधावी हैं वे अपना वक्त प्रोफेशनल उपलब्धियों को हासिल करने में लगा रहे हैं। वे शादी देर से करते हैं और कम बच्चे भी पैदा करते हैं। इसके विपरीत बेहुनर, बेअक्ल कम उम्र से ही संतान उत्पति में जुट जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में कमजोर मेधा वाले समाज में जल्द ही बहुसंख्यक हो जाएंगे। गिरती मेधाशक्ति का एक और बड़ा कारण प्रदूषण है, खासकर रासायनिक प्रदूषण। प्लास्टिक का जहर तो है ही, साथ में कीटनाशक, आयोडीन की कमी, कुपोषण आदि भी हमारे थायराइड गतिविधियों के साथ खतरनाक छेड़छाड़ कर रहे हैं। कुल मिलाकर यह डर अब शोधकर्ताओं में व्याप्त हो गया है कि सभ्यतागत प्रतिलोम ही अब मानवमात्र का भविष्य है। वैसे तो यह सब अध्ययन विदेशों में हुए हैं और कहा जा सकता है कि हिंदुस्तान पर लागू नहीं होते हैं, पर इनके परिणामों को नजरअंदाज करना घातक होगा। अगर हम थोड़ी-सी भी गंभीरता से अपने आसपास देखें तो साफ हो जाएगा कि हमारे बौड़मपन की दर में लगातार वृद्धि हो रही है। तर्कनिष्ठ व्यवहार और संवाद लगातार घट रहा है और हम हर मुद्दे के अति सरलीकरण में जुटे हुए हैं। हम संकल्पना और व्यावहारिक जटिलता से मुंह चुराने लगे हैं। शायद हमारी रोशनखयाली का बल्ब फ्यूज हो गया है और इसीलिए अतीत की अंधेरी गुफाओं में हमें जेहनी आराम मिलने लगा है। अगर हम सभ्यतागत प्रतिलोम को अपनी उपलब्धि मान रहे हैं, तो हमसे ज्यादा और कौन बौड़म हो सकता है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App