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तीरंदाज: लोकतंत्र में तानाशाही

हाल के दशकों में लोकतांत्रिक तानाशाहों ने अपने को वैश्विक मीडिया और नई तकनीक के अनुसार ढाल लिया है। अपनी उद्देश्य सिद्धि के लिए अनुदार सरकारों ने पुलिसिया आतंक को बहुत हद तक त्याग दिया है। पुलिस व्यवस्था अब भी है, पर वर्दी को अदृश्य कर दिया गया है। उसकी जगह टेक्नोलॉजी को लाया गया है, जिससे लोक-विचार और आचरण को समुचित रूप से नियंत्रित रखा जा सके।

Dictatorship, democracy, hitlerतानाशाही हर व्यवस्था में खतरनाक है। लोकतंत्र में तो यह अस्वीकार्य है।

समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्तावादी और तानाशाही नेतृत्व को लेकर पांच साल पहले पेरिस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सेर्गेई गुरिएव और यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया के प्रोफेसर डेनियल ट्रेसमान ने एक अत्यंत रोचक अध्ययन किया था। अध्य्यन का शीर्षक था ‘हाउ मॉडर्न डिक्टेटर्स सर्वाइव : ऐन इन्फॉर्मेशनल थ्योरी आफ द न्यू आथॉरिटारियनिज्म’। पॉलिटिकल साइंस के इन दोनों विद्वानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक नेतृत्व का शोध किया और अपना ध्यान उन नेताओं पर केंद्रित किया, जो अपने कार्यकाल में सत्तावादी और तानाशाही प्रवृत्ति प्रदर्शित करते रहे थे। इन नेताओ में कुछ का तो तख्ता पलट हो गया, पर जो अपना कार्यकाल पूरा कर पाए या सत्ता पर उसके बाद भी काबिज रहे, उन सबमें शोधकर्ताओं को एक बड़ी समानता मिली थी।

शोध के अनुसार लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में तानाशाही प्रवृत्ति वाले हर नेतृत्व ने सिर्फ एक मूल मंत्र अपनाया है- अपनी सक्षमता की लगातार घोषणा करना। शोधकर्ताओं का कहना है कि ‘लोकतांत्रिक’ डिक्टेटर कुर्सी पर काबिज सिर्फ बल या विचारधारा से नहीं होते हैं, बल्कि वे सत्ता हथियाने के लिए अपने को औरों से अधिक सक्षम प्रमाणित करने का भरसक प्रयास करते हैं। इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि वे वास्तव में कितने सक्षम हैं। मतलब सिर्फ इस प्रसार से होता है कि उनके सरीखा कंपीटेंट (सक्षम) व्यक्ति कोई और नहीं है।

‘तानाशाहों’ के लिए विचारधारा का ज्यादा उपयोग नहीं होता और न ही उससे उनकी कोई विशेष प्रतिबद्धता होती है। शुरुआती दौर में वे विचारधारा का सीमित उपयोग जनता का ध्यान खींचने के लिए करते हैं और फिर उसके सहारे अपनी प्रबल सक्षमता के दावों का अंबार लगा देते हैं। सक्षमता के केंद्र बिंदु होते हैं- अवाम को बेहतर जिंदगी देने की उनकी काबिलियत और बाहरी खतरों से देश और लोगों को सुरक्षित रखने का उनका अजीम हौसला।

‘तानाशाह’ इन बिंदुओं पर लगातार और तरह-तरह से पैंतरेबाजी करके लोगों को विश्वास दिलाता रहता है कि अगर वह नहीं रहेगा तो प्रलय आ जाएगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि तानाशाह की कथित क्षमता निर्धारित करती है कि वह कितनी लंबी पारी खेलेगा। जितना ज्यादा वह सक्षम होने के दावों से लोगों को प्रभावित करने में सफल होगा उतना ही उसका कार्यकाल चलेगा। दावों पर पूछताछ न हो, इसके लिए तानाशाह सरकारी प्रचार-प्रसार के तंत्र पर ज्यादा से ज्यादा संसाधन लगाता है।

साथ ही वह स्वतंत्र मीडिया पर सेंसरशिप किसी न किसी रूप से लगाता है, समाज के अभिजात वर्ग को अपने दावों के साथ जोड़ने के लिए उसको प्रलोभन देता है और चुनिंदा स्थितियों में बाकी वर्गों को सबक देने के लिए पुलिस आदि का दमनकारी प्रयोग करता है। स्टेट प्रोपोगंडा, सेंसरशिप और अभिजात वर्ग की स्वीकृति- प्रत्यक्ष या परोक्ष- तीन अहम पाए हैं, जिन पर सत्तावादी की कुर्सी टिकी होती है। चौथा पाया दावों का मूसल है।

अध्ययन के अनुसार बीसवीं शताब्दी में हिटलर, स्टालिन, माओ, पोलपोट, स्पेन के फ्रांको, चिले के पिनोशो या फिर अफ्रीका के कई और तानाशाह हिंसा और आक्रामक विचारधारा के बूते पर अपने देश पर शिंकजा कस लिया करते थे। फासिज्म और कम्युनिज्म के नाम पर जर्मनी, रूस और चीन ने व्यापक स्तर पर दमन देखा है। पर इक्कीसवीं शताब्दी के आते-आते तक बड़े पैमाने पर हिंसा का प्रयोग कम होता गया है। हाल के दशकों में लोकतांत्रिक तानाशाहों ने अपने को वैश्विक मीडिया और नई तकनीक के अनुसार ढाल लिया है। अपनी उद्देश्य सिद्धि के लिए अनुदार सरकारों ने पुलिसिया आतंक को बहुत हद तक त्याग दिया है। पुलिस व्यवस्था अब भी है, पर वर्दी को अदृश्य कर दिया गया है। उसकी जगह टेक्नोलॉजी को लाया गया है, जिससे लोक-विचार और आचरण को समुचित रूप से नियंत्रित रखा जा सके।

अध्ययन के अनुसार समकालीन सत्तावादी सरकारें लोकतंत्र का जामा ओढ़ कर ऐसी तरकीब से चुनाव कराती हैं, जिसमें उनकी जीत निश्चित होती है। वे स्वतंत्र प्रेस पर प्रतिबंध नहीं लगाती हैं, बल्कि उस पर अपना प्रभाव भय और लालच दिखा कर बनाती हंै। जहां तक विचारधरा का संबंध है, तो किसी विशिष्ट विचार की जगह वे अज्ञात शत्रु से जनता को जूझने के लिए प्रेरित करती हंै। इसमें देश को बाहर से खतरा, किसी धर्म या नस्ल से खतरा आदि जैसे मुद्दे विशेषकर उठाए जाते हैं। इनसे निपटने के लिए लोकतांत्रिक तानाशाह अपने को सबसे अधिक सक्षम बताता है।

प्रोपेगंडा के माध्यम से वह अपनी सक्षमता के बयान, किस्से और कहानियां प्रसारित करता है। दूसरे शब्दों में,अपने अलोकतांत्रिक शासन कोपरफारमेंस लेजिटिमेसी या कार्यवैधता का औचित्य प्रधान करने की भरपूर कोशिश करता है। इन सरकारों का लोकहित उद्देश्य नहीं होता है, बल्कि उनक पूरा जोर इस बात पर होता है कि नेतृत्व की क्षमता का डंका बजता रहे। क्षमता का भरम लोकमानस में गहराता जाए। समकालीन नेतृत्व टीवी पर अपनी रेटिंग को इसीलिए बहुत गंभीरता से लेता है और उनको संभालने के लिए हर तरह का हथकंडा इस्तेमाल करता है।

अध्ययन की रोचक बात यह है कि लगभग सभी नेता अपनी सक्षमता साबित करने के लिए सूचना प्रवाह को सबसे ज्यादा अहमियत देते हैं। सूचना आज नशा हो गई है। इसकी उपलब्धि अगर कुछ देर के लिए भी बाधित हो जाए, तो लोग बिलबिला उठते हैं। समकालीन तानाशाह ने लोगों की दुखती रग को पकड़ लिया है और वह इस मजबूरी का भरपूर फायदा उठा रहा है।

अपनी सक्षमता की सूचनाएं, वास्तव और काल्पनिक, वह व्यापक सूचना प्रवाह में इस तरह से जोड़ता जाता है जिससे उनके बारे में सुनने और देखने की लोगों को लत पड़ जाए। लगातार चर्चा अपने पर केंद्रित करके और विपक्ष को लाचार और अक्षम बता कर तानाशाह बिना व्यापक हिंसा किए औरों को समाप्त कर देने की पुरजोर कोशिश करता है। निज विज्ञापन का शोर, जिसमें दूसरे के बोल डूब जाए समकालीन परोक्ष हिंसा की रणनीति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

कार्ल मार्क्स ने सालों पहले कहा था कि धर्म जनसाधारण की अफीम है। इक्कीसवीं शताब्दी में यह अफीम सूचना प्रवाह बन गई है और जैसे विगत वर्षों में तानाशाह धर्म का उपयोग अपनी सक्षमता सिद्ध करने के लिए करते थे उसी तरह समकालीन शासक सूचना प्रवाह का उपयोग कर रहे हैं। दोनों का नशा बहुत तेज है, विशेषकर सूचना की तलब तो सिर चढ़ कर बोलती है। लोकतांत्रिक रूप से अयोग्य शासक के लिए इस तलब को बढ़ाते रहना बेहद उपयोगी है।

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