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विमर्शः अस्मिता विमर्श और समकालीन वैचारिकी

उन्नीसवीं और बीसवींं शताब्दी में मुख्य रूप से वर्ग-विहीन समाज का सपना और जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना का महान स्वप्न बिखर गया।

Author January 22, 2017 2:39 AM

राजेश मल्ल

इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों तक आते-आते जिस महाआख्यान को, जो दोनों तरह की विचार सरणियों- वामपंथी वैचारिकी और लोक-कल्याणकारी जनतंत्र- ने रचा था, वह धीरे-धीरे भाषा, जाति, लिंग, वर्ण आदि छोटे-छोटे उपेक्षित सामाजिक समूहों को एक नई न्यायपूर्ण स्थिति प्रदान करने में अक्षम साबित हुआ। उन्नीसवीं और बीसवींं शताब्दी में मुख्य रूप से वर्ग-विहीन समाज का सपना और जनकल्याणकारी राज्य की स्थापना का महान स्वप्न बिखर गया। नई बाजार-व्यवस्था और उदारतावाद के नाम पर लोकहित की तमाम योजनाएं स्थगित हो गर्इं और बची सिर्फ विकास की अंधी दौड़, गलाकाट प्रतियोगिता, युद्ध उन्माद, बहुसंख्यक की आक्रामकता और मौज-मस्ती पर आधारित उपभोक्तावादी संस्कृति। यह भी देखने में आता है कि प्रतिरोध के स्वर भी क्रमश: बाजार के हवाले हो गए। इसी बीच उपेक्षित अस्मिताएं, जो असमान विकास की शिकार हुर्इं, वे उठ खड़ी हुर्इं। ऊपर से देखने में तो क्रांतिकारी दिखने वाला यह विचार चिंतन अंतिम निष्कर्ष में सत्ता में हिस्सेदारी तक सीमित हो गया।

आज का समकालीन वैचारिक विमर्श एक तरह के धूम्रावरण से आच्छादित दिखाई देता है। एक तरह से निराशा का वातावरण सृजित हुआ है, जहां मजदूर, किसान की पुरानी शब्दावली न केंद्रीयता प्राप्त कर रही है, न ही अस्मिता विमर्श के कतिपय संदर्भ जैसे दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक। आज जरूरी है कि इस गंभीर वैचारिक संकल्प और स्वप्नहीनता के दौर में नए विचार के संदर्भों को खोला जाए और आज के लिए स्पष्ट वैचारिकी तैयार की जाए।
ऐसा नहीं है कि आज सारे विचार अप्रासंगिक हो गए हैं या नई वैचारिकी की तालाश की बेचैनी खत्म हो गई है। वाम-दलित एकता, पर्यावरण अनुकूलित विकास, जल-जंगल-जमीन संरक्षण, उन्मादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, जिसकी जितनी संख्या उतनी सत्ता में हिस्सेदारी, मूल निवासी के साथ अस्मिता विमर्श- दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक जैसे विमर्श हमारे चारों तरफ फैले हैं। कुछ सत्तानसीन हैं और कुछ आंदोलनरत। जरूरी है कि हम अपने पूर्व वैचारिक महाअख्यानों की विफलता की पड़ताल करें और उपेक्षित जनसमूहों और उनकी अस्मिताओं को न्यायोचित सम्मान दें। शायद यहां से कोई नई वैचारिकी प्राप्त हो, जो हमें बेहतर न्यायपूर्ण और मानवीय समाज बनाने में मदद करे।

ध्यान से देखें तो जो महाआख्यान वर्गविहीन समाज का मार्क्सवाद ने रचा था और जिसने बीसवीं शताब्दी के कला, साहित्य, चिंतन को बहुत गहराई से प्रभावित किया, उसके आर्थिक एजेंडे में भाषा, जाति, लिंग, वर्ण भारत के विशेष संदर्भ में, के प्रति उपेक्षा बरती। जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा वाले विकास मॉडल में भी अस्मिताएं उपेक्षित हुर्इं। कभी राष्ट्र के नाम पर, कभी वर्गविहीन सपने के नाम पर खासकर हमारे देश में अस्मिताओं की बलि चढ़ाई जाती रही। यह आश्चर्यजनक है कि वाम विचारधारा के प्रस्तोताओं ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान दिलाया, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों ने व्यवहार के स्तर पर इसे उपेक्षित ही रखा।

यों भारत में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के समय ही आकाली आंदोलन, मुसलिम लीग और आंबेडकर के दलित आंदोलन में अस्मिता विमर्श को देखा जा सकता है। इसमें लीग का आंदोलन भारत विभाजन तक पहुंच गया। यह भी ध्यान में रखना होगा कि बंटवारे के बाद भी पाकिस्तान में पुन: अस्मिताओं का टकराव शुरू हुआ और इस महाद्वीप में एक और विभाजन बांग्लादेश के रूप में हुआ। आजादी के बाद दलितों की उपेक्षा अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और स्त्रियों के प्रति घोर सामंती जड़ विचारों ने जहां उनकी अस्मिताओं को कुचला, वहीं जातीय अन्यायपूर्ण विभाजन ने भारतीय सामाजिक ढांचे को न्यायपूर्ण और बराबरी की जगह नफरत और उत्पीड़न का ऐशगाह बना दिया। उत्तर-आधुनिकतावादी चिंतन ने इन स्थितियों का सहारा लेकर मुख्य रूप से दोनों मॉडलों को विनष्ट करने में अपना हथियार बनाया। हर चीज के अंत की घोषणा के साथ सर्वग्रासी बाजार संस्कृति ने पुराने भाषिक विन्यास, किसान, मजदूर, जनता, लोककल्याण के स्थान पर सड़क, पानी, बिजली, मॉल, मेट्रो को स्थापित कर दिया। विकास का यह मॉडल एक तरफ पर्यावरण संतुलित विकास की अवधारणा को खंडित किया तो दूसरी तरफ पुरानी समाजिक संरचनाओं में भारी तोड़-फोड़ मचाई। बढ़ता कंक्रीट का जंगल गांव को निगलने लगा। गांव भी अपनी पुरानी केचुल छोड़ कर विकास के नाम जारी अंधी दौड़ में अपना सब कुछ गंवा बैठा। खनिज खनन की बेताबी ने जल, जंगल, जमीन के संघर्ष को तेज कर दिया। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि बहुसंख्यकवाद के उन्माद ने उन उपेक्षित राष्ट्रीयताओं को भी लंबे समय से सेना के हवाले कर दिया। निर्भया, दामिनी, रोहित वेमुला, इरोम शर्मिला, विनायक सेन, कबीर कला मंच मात्र नाम नहीं हैं, बल्कि अस्मिता विमर्श के नए प्रतीक हैं।

विगत वर्षों में होने वाले स्वत:स्फूर्त जन-आंदोलनों में स्त्री और दलित विमर्श को केंद्रीयता मिली है। लेकिन इसी के साथ जाट आंदोलन और गुजरात के पाटीदार आरक्षण आंदोलन में अस्मिता विमर्श की वैचारिकी को उलट दिया है। यह आकस्मिक नहीं है कि पूर्व में ही इस तरह के आंदोलन भाषाई और क्षेत्रीय आंदोलन सत्ता की हिस्सेदारी में डूब गए हैं और वास्तविक अस्मिताओं के आंदोलन पीछे चले गए हैं। यही वह जगह है जहां से हमें अपनी वैचारिक समझ को साफ करने की जरूरत है। आज वाम-दलित एकता का शोर और मार्क्स-आंबेडकर की एकता को लेकर निरंतर बहस चल रही है। जहां पुराने वामपंथी विचारक वर्गसंघर्ष के धूमिल होने की बात कर रहे हैं वहीं दलित विचारकों का एक हिस्सा इसे ब्राह्मणवाद की सुनयोजित साजिश बता कर अलग राग अलाप रहा है। स्त्री-मुक्ति आंदोलन में भी किसी नवीन सामाजिक संरचना का विजन नहीं दिखाई पड़ रहा है।

यह अद्भुत है कि हर न्यायपूर्ण अस्मिता के सवाल को दरकिनार करने के लिए उसका एक प्रतिपक्ष गढ़ लिया जाता है। स्त्री के विरुद्ध पुरुष, दलित के विरुद्ध सवर्ण, भाषा के सवाल पर हिंदी बनाम अन्य भाषाएं बना कर उसकी धार कुंद कर दी जाती है। जबकि मूल सवाल है कि इन सामाजिक समूहों के साथ होने वाले अन्यायपूर्ण संबंध एक सामाजिक संरचना की उपज है और उसका संचालन एक सुविचारित लोकतांत्रिक सरकार कर रही है। जहां न्यायालय है नियम है, कानून है और उसे लागू करने की एक संगठित प्रशासनिक अमला है। जरूरत इस बात की है कि हम अपनी वैचारिक विजन में न्यायपूर्ण सामाजिक संरचनाओं की निर्मिति के लिए प्रयत्नशील हों, जहां इस तरह की अन्यायपूर्ण असमानताएं न हों।

सच तो यह है कि बीसवीं शताब्दी के विकास की सामाजिक संरचनाओं ने एक ऐसी निर्मिति दी है, जिसकी पड़ताल करते समय आप हम बार-बार अपने पुराने माइंडसेट से बाहर न होने के कारण इस निर्मिति में मौजूद अन्यायपूर्ण स्वरूपों की शिनाख्त नहीं कर पा रहे हैं और हर नए-पुराने आंदोलन के पिछलग्गू बन जा रहे हैं। जबकि जरूरत है कि हम तमाम प्रचलित वैचारिकी वर्ग-वर्ण ओवर लैपिंक, स्त्री बनाम पुरुष, दलित बनाम सवर्ण, दिल्ली बनाम क्षेत्रीय अस्मिताएं जैसे चले आ रहे विमर्शों से बाहर आकर एक नए न्यायपूर्ण सामाजिक संरचना का विजन की वैचारिकी प्रस्तुत करें, जो देश और दुनिया के स्तर पर हमें रोशन-खयाल कर सके।

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