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जलवायु : निरापद नहीं है पनबिजली

पंद्रह सालों के दौरान पनबिजली से होने वाली मीथेन समस्या ने अंतरराष्ट्रीय खबरों में थोड़ी-बहुत जगह बनाई है, लेकिन हाल ही में चर्चा ने रुख बदला है। अब चिंता का विषय यह..

Author नई दिल्ली | November 15, 2015 12:09 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (स्रोत विकीपीडिया)

पंद्रह सालों के दौरान पनबिजली से होने वाली मीथेन समस्या ने अंतरराष्ट्रीय खबरों में थोड़ी-बहुत जगह बनाई है, लेकिन हाल ही में चर्चा ने रुख बदला है। अब चिंता का विषय यह है कि पनबिजली जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वाकई एक हल है या सिर्फ भ्रम है? क्या जलवायु परिवर्तन के चलते इसे इस्तेमाल करना सही है?

असल में पनबिजली अपने आप में मीथेन गैस की एक फैक्टरी है या यों कहें कि यह एक मीथेन बम है, जिसके ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को पहले किसी ने देखा ही नहीं था। पनबिजली से होने वाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है। वैज्ञानिक अध्ययन इस बात को पुख्ता करते हैं कि पनबिजली बांध और जलाशयों से निकलने वाली मीथेन गैस की मात्रा मुखतलिफ जलवायु में मुखतलिफ हो सकती है।

उत्तरी सब-आर्कटिक जलवायु में मीथेन से होने वाले ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा कोयला-तापीय विद्युतीय संयत्र से होने वाले ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा से कम आंकी गई है। समशीतोष्ण जलवायु वाले इलाकों- जैसे अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में भी मुखतलिफ जलवायु होने की वजह से मीथेन उत्सर्जन की मात्रा भी अलग अलग देखी गई है जो न केवल जलवायु बल्कि जलाशय के आकार और हरियाली की मौजूदगी पर भी निर्भर है। लेकिन कोयला तापीय विद्युतीय संयत्रों से होने वाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की तुलना में कहीं कम तो कहीं ज्यादा है। जबकि उष्णकटिबंधीय जलवायु वाले इलाकों में पनबिजली से निकलने वाली मीथेन से होने वाला ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन, उतनी ही ऊर्जा पैदा करने वाले कोयला तापीय विद्युत संयंत्र से होने वाले उत्सर्जन की मात्रा का दोगुने से भी ज्यादा है।

हालांकि, इंटरगवर्नमेंटल पेनल आॅन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने पनबिजली के लिए बांधों आदि से निकलने वाली मीथेन के आकलन के लिए कुछ दिशा निर्देश निर्धारित किए हैं लेकिन यह भी सच है कि ये दिशा-निर्देश मात्र कागजी कार्यवाही बनकर रह गए हैं। पनबिजली परियोजनाओं से निकलने वाली मीथेन का आकलन शायद ही किया गया हो लेकिन दुनिया भर में हजारों की तादाद में पनबिजली के लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं। ब्राजील के एक वैज्ञानिक का अनुमान है कि दुनिया भर में कुल मानव उत्सर्जित मीथेन का लगभग तेईस फीसद हिस्सा मौजूदा पनबिजली परियोजनाओं की वजह से है। जैसे-जैसे पनबिजली परियोजनाएं बढ़ेंगी, मीथेन की मात्रा भी बढ़ेगी।

पनबिजली को अक्सर ग्रीन एनर्जी यानी इको फ्रेंडली का चोगा पहना दिया जाता है और क्लीन एनर्जी और कार्बन-मुक्त एनर्जी बताकर लोगों और सरकारों को बेचा जाता है। हालांकि आईपीसीसी ने भी पनबिजली को ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के एक स्रोत के रूप में अंकित किया है। विज्ञान ने भी पनबिजली को क्लीन एनर्जी होने की क्लीन चिट नहीं दी है, फिर भी क्योतो प्रोटोकोल के क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म में पनबिजली को एक कार्बन फ्री एनर्जी के रूप में शामिल किया गया है। इसको जलवायु परिवर्तन से निपटने के एक साधन के रूप में देखा जा रहा है। इसे लागू करने में ज्यादातर वही देश शामिल हैं जो पेरिस में कोप- 21 में इकट्ठा हो रहे हैं। इससे भी बढ़कर खराब तो यह है कि विश्व बैंक जैसी संस्था ने भी इसे क्लीन एनर्जी की सूची में शामिल किया है और इसमें पैसा लगाकर इसकी बढ़ोतरी को भी बढ़ावा दे रही है। लगभग सभी देश इसी सोच के साथ पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा देने में लगे हैं। यहां तक कि अमेरिका की सरकार भी विज्ञान के खिलाफ जाकर क्लीन एनर्जी के इस फरेब को बढ़ावा देने में लगी है।

कोप- 21 से ठीक पहले भागीदार देशों ने संयुक्त राष्ट्र को अपना अपना ‘इंटेंडिड नेशनली डेटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस’ (आईएनडीसी) भेजा है। यह ऐसी योजना का एक मसविदा है, जिसमें कहा गया है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह कार्बन उत्सर्जन में कटौती करेंगे। इसमें बताया गया है कि चीन हर साल दर्जनों पनबिजली संयत्र लगा रहा है, यहां तक कि दुनिया का सबसे बड़ा पनबिजली संयत्र भी इसमें शामिल है। अपने आईएनडीसी में चीन का कहना है कि पारिस्थितिकी और पर्यावरण संरक्षण और साथ ही स्थानीय बाशिंदों की पुनर्बहाली के मद्देनजर वह आगे बढ़कर पनबिजली परियोजनाओं को बढ़ावा देगा। भारत अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए पनबिजली परियोजनाओं का सहारा लेगा।

भारत का कहना है कि देश की जल संपदा मेंं विकास की अपार संभावनाएं हैं इसलिये सौ गीगावाट से भी अधिक क्षमता वाली पनबिजली परियोजनाओं के लिए वह न केवल बहुत से नीतिगत फैसला ले रहा है बल्कि जमीनी काम भी कर रहा है। जापान के आईएनडीसी में कहा गया है कि वह अपने कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य को टुकड़ों में पूरा करेगा और यह लक्ष्य 2030 तक नौ फीसद पनबिजली परियोजनाओं से करेगा। कनाडा ने कहा है कि पनबिजली के जलवायु परिवर्तन संबंधी खतरे कम हैं, इसलिए वह इस अक्षय ऊर्जा से बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए निवेश में बढ़ोतरी करेगा। कनाडा में दर्जनों नए पनबिजली बांधों पर काम चल रहा है और उनमें से कुछ अगर सुदूरवर्ती इलाके में है तो उसे कम कार्बन प्रभाव वाला माना जाता है।

आलम यह है कि बहुत से देश पनबिजली परियोजनाओं को अंजाम दे रहे हैं लेकिन अपने आईएनडीसी में इसका जिक्र तक नही कर रहे हैं। ऊपर से उनका यह तुर्रा भी है कि वे नेशनल ग्रीन हाउस गैस इवेंट्रीज के लिए बनाए गए 2006 आईपीसीसी दिशानिर्देशों का ही पालन कर रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर इंडोनेशिया ने न केवल दर्जनों पनबिजली बांध बनाएं हैं बल्कि लगातार बनाने में जुटा हुआ है। जबकि अपने आईएनडीसी में इसने पनबिजली का जिक्र तक नहीं किया है। बल्कि यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह 2006 आईपीसीसी के मुताबिक अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती कर लेगा। 2006 के आईपीसीसी दिशानिर्देशों में भी साफ कहा गया है कि पनबिजली बांधों और जलाशयों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन का भी आकलन किया जाना चाहिए।

लेकिन फिर भी मलेशिया, ब्राजील, ग्वाटेमाला, रूस, भारत और यहां तक कि अमेरिका सरीखे देश, जो पनबिजली परियोजनाओं के जरिए अपनी नदियों और पर्यावरण को नष्ट करने पर तुले हैं, उन्होंने भी अपनी आईएनडीसी सूची में पनबिजली को मीथेन उत्सर्जन के एक स्रोत के रूप में शामिल नहीं किया है। ऊपर से इसे क्लीन एनर्जी के स्रोत में चुना है। या तो इन देशों की समझ का फेर है या फिर जानबूझकर आईपीसीसी दिशानिर्देशों की अनदेखी की जा रही है।

इसका नतीजा क्या हो सकता हैय अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। हाल ही में पूर्वी यूरोपीय बाल्कन देशों ने 2700 पनबिजली बांध परियोजनाओं को अंजाम देने की घोषणा की है उसपे तुर्रा ये कि हरेक का जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये विकल्प के तौर पर स्वच्छ ऊर्जा यानी क्लीन एनर्जी के स्रोत के रूप में बखान किया जा रहा है।
पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों को यकीन है कि ऐसी सोच के चलते कोप- 21 में भी जलवायु वार्ता शायद ही किसी नतीजे पर पहुंचेगी। पनबिजली से निकलने वाली मीथेन के बारे में जानकारी की कमी, क्लीन एनर्जी के रूप में बखान करना आदि जैसी अनेक समस्याएं रोड़ा बनेंगी। पनबिजली परियोजनाओं से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को नजरंदाज करके हम केवल ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का ही गलत आकलन नहीं करेंगें बल्कि जलवायु परिवर्तन से धरती को होने वाले खतरों में भी इजाफा करेंगे। (मीनाक्षी अरोड़ा/ गैरी वॉक्नर)

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