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संवाद: परंपरा का अतिवाद

मनुष्य अपने स्वभाव की मनोभूमि पर परंपरा को अपनाता और त्यागता या उसमें समय और स्थिति के अनुसार परिवर्तन परिवर्द्धन करता रहा है। उसे किसी जड़ता की जड़ से बांध कर नहीं रखा जा सकता। वह विचार भी है, आचरण भी है, वह स्मृति भी है इतिहास भी है, वह देशकाल भी है और देशकाल का अतिक्रमण भी।

परंपरा पर मनुष्य के मस्तिष्क और स्वभाव का प्रभाव पड़ता है।

अक्सर अपनी परंपराओं, अपनी जड़ों से कटने का आरोप लगा कर किसी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उसकी रचनात्मकता को प्रश्नांकित किया जाने लगता है। पर परंपरा कोई ठोस चीज या तय पैमाना तो है नहीं कि जिसे सामने रख कर कहा जा सके कि उसे किस रूप में अपनाया जा सकता है। परंपराएं लोकजीवन के ज्ञान, कर्म और आचरण से निर्मित होती हैं। मनुष्य ही उनका निर्माता है और मनुष्य ही उनका पालक, पोषक और प्रयोगकर्ता है। परंपरा किसी जड़ रूढ़ि का नाम नहीं है। वह एक ऐसी सतत प्रवहमान गतिशील, परिवर्तन-गामी और सांस्कृतिक धारा है, जो सदा प्रेरक होती है। जाहिर है, समय और स्थितियों, मनुष्य की बदलती जरूरतों और उसमें बुद्धि के विकास के साथ-साथ परंपराओं में भी कुछ बदलाव स्वाभाविक रूप से आते हैं। मनुष्य अपने स्वभाव की मनोभूमि पर परंपरा को अपनाता और त्यागता या उसमें समय और स्थिति के अनुसार परिवर्तन परिवर्द्धन करता रहा है। उसे किसी जड़ता की जड़ से बांध कर नहीं रखा जा सकता। वह विचार भी है, आचरण भी है, वह स्मृति भी है इतिहास भी है, वह देशकाल भी है और देशकाल का अतिक्रमण भी। इसलिए किसी भी प्रकार के कर्मकांड, पाखंड-ग्रस्त पूजा-पाठ, अंधविश्वास या सांप्रदायिक कट्टरता को परंपरा नहीं कहा जा सकता।

परंपरा एक सांस्कृतिक प्रवाह है, जो मानव संस्कारों से रचा जाता है। इसलिए परंपराएं अपने औचित्य, विवेक और प्रचलित विश्वासों के साथ अपनाई या निरस्त की जाती रही हैं। एक अत्यंत मनोरंजक उदाहरण है, जो आचार्य विनय मोहन शर्मा ने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक ‘वे दिन’ में हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में दिया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे- संस्कृत पढ़े-लिखे विद्वान पंडित पुरुषों और अंग्रेजी पढ़ी-लिखी विदुषी स्त्रियों को आधा शरीर नंगा रखने में ही आनंद आता है। यह उक्ति कितनी सही और सार्वकालिक है! क्या इसे परंपरा कहेंगे? निस्संदेह हजारी प्रसाद द्विवेदी यह बात व्यंग्य में कहा करते थे, पर इस कथन में पुरातन परंपरा और आधुनिकता में द्वंद्व तो प्रकट होता ही है।

जहां तक भारतीय संस्कृति और समाज का प्रश्न है, उसमें परंपरा की अनेक धाराएं बहती हैं। सनातन धारा में वैदिक धारा, शैव नासदीय, वैष्णव, जैन, बौद्ध, इस्लाम, मसीही, यहूदी, पारसी सिख और हमारे समय के महापुरुषों, संतों, महात्माओं द्वारा तो आध्यात्मिक धाराओं का प्रवाह रचा ही गया, लेकिन साहित्य में भी विचारधारा, भाषाई धारा, सृजन धारा और उनके साथ नाना प्रकार की ज्ञान धाराएं रची गर्इं। परंपरा कितनी प्रबल होती है, इसे कवि जयशंकर प्रसाद ने इस प्रकार कहा था- ‘है परंपरा लग रही यहां/ ठहरा जिसमें जितना बल है’। परंपरा इतनी बलवती होती है कि उसमें ठहरने वाले का भी बलवान होना जरूरी है।

साहित्य और कलाएं साधना की विवेक धाराएं हैं, सौंदर्य और संवेदन की धाराएं हैं। परंपरा के शब्दकोशीय अर्थ हैं- रीतिरिवाज, मत-मतांतर, दोहराव और विभिन्न जातिवर्ग समुदाय में प्रचलित विश्वास। इसका तात्पर्य तो यह है कि शब्दकोश में जो सीमित अर्थ हैं, उन्हें मुक्तकरने का काम विचार और उसकी धाराएं करती हैं। सनातन धर्म में आस्तिक और नास्तिक मत परंपराएं रही हैं, वैदिक अवैदिक धाराएं रही हैं। जैन धर्म में श्वेतांबर-दिगंबर, बौद्ध धर्म में हीनयान और महायान के साथ महापरिनिव्यान सुत्तधारा, मसीह धर्म की प्रेम धारा, इस्लाम की इल्हाम आलोक धारा, सिखों की ग्रंथधारा आदि धाराएं परंपरा के रूप में आज तक प्रचलित हैं, लेकिन साहित्य और कलाएं अतीत के प्रचलन को वर्तमान का चलन बनाने के बजाय उन्हें समय और स्थिति में रूपांतरित कर देती हैं। इसलिए चाहे काव्यशास्त्र, व्याकरण, अलंकार, पिंगल शास्त्र हों या तत्कालीन समाज में घनीभूत प्रचलित परंपरा हो, साहित्य ने परंपरा का जड़ता से उन्मोचन भी किया है और कलाओं ने अतीत के आग्रह का अतिक्रमण भी किया है।

साहित्य में अगर संस्कृत के वाङं्मय का आधार हटा कर देखें, तो वीर काव्य रचा गया, भक्ति काव्य रचा गया, खरी बोली के मानक रूप में खड़ी हो जाने पर अनेक विधाओं में कल्पनाशील उत्कृष्ट काव्य और गद्य की रचना की गई। साहित्यकार न वीर काव्य की गर्जना से बंधा रह सका, न भक्तिकाल के भजनों से, न रीतिकाल की शृंगार रीतियों से, न सूफियों के मादन तत्व से, न ब्रज, अवधी जैसी लोक भाषाओं से। वह कबीर, सूर, तुलसी जैसी महान प्रतिभाओं से बंध कर भी मुक्त हुआ और उसने अपनी सृजन भूमि का नया संस्करण विचार, विवेक, अध्ययन, अनुभव, भाषा, शैली, शिल्प, तथा दिक-काल या समय और स्थिति के अनुरूप या उनका अतिक्रमण करके रचा। सर्जना की साहित्य और कलाओं में यह निरंतर गतिशीलता ही तो परंपरा का नित्य नवीनीकृत होना है।

अब परंपरा के नाम पर जो टकराव वैचारिक धरातल पर हिंदीवादी अकादमिक अध्यापकों ने किए, उन पर भी विचार किया जाना चाहिए। हिंदी के कुछ विद्वान अध्यापक-प्राध्यापकों का कहना कितना हास्यापद है। शायद वे अपनी हीन ग्रंथि के कारण कुछ अपमानजनक फतवे सार्वजनिक मंचों से देकर यह साबित करना चाहते हैं कि परंपरा का सच्चा ज्ञान और आचरण तथा सृजन केवल उनके ही पास है। वे अंग्रेजी साहित्य पढ़े हिंदी के लेखकों पर आरोप लगाते हैं कि इन अंग्रेजी वालों के पास हिंदी और भारतीय परंपरा का ज्ञान नहीं होता। कितना भ्रामक विचार है यह? इतिहास दर्शन और संस्कृति के निष्णात विद्वान, अंग्रेजी, फ्रेंच, संस्कृत और अन्य अनेक भाषाओं के प्रगल्भ विद्वान गोविंदचंद्र पांडेय के हिंदी सृजन और ज्ञान से टकरा कर तो देखें जरा। अज्ञेय भी अंग्रेजी और अन्य अनेक भाषाओं के जानकार थे।

इसी तरह ऐसे अनेक नाम लिए जा सकते हैं, जो अंग्रेजी के उपाधिधारी या अध्येता थे, इन लोगों ने जितना उत्कृष्ट साहित्य रचा और विशेषकर आज भी जो हिंदी को सृजन और समालोचना से संपन्न कर रहे हैं, उनमें युवा पीढ़ी के अनेक ऐसे लेखक हैं, जो अंग्रेजी की पृष्ठभूमि से आए हैं। इसलिए यह कहना अपनी भाषा के महत्त्वपूर्ण लेखकों के प्रति एक प्रकार का हिंसक विचार है और जो संस्कृति, परंपरा या लोक साहित्य के अनेक आग्रहों से ग्रस्त हैं, उन्हें सोचना होगा कि परंपराओं में भाषा और साहित्य, कलाएं और विचार सब लेखक के अपने तेज से आते हैं, निस्तेज होने पर विलुप्त हो जाते हैं। अधिकांश उत्कृष्ट हिंदी साहित्य में अंग्रेजी के विद्वानों का भी एक बड़ा योगदान है। इसलिए किसी भाषा मात्र के अध्ययन या उसमें रचनात्नक रूप से सक्रिय रहने भर को उस भाषा की परंपरा से जुड़े रहना नहीं माना जा सकता।

इसलिए स्वयं की हीनता को दूसरों की हीनता समझने वाले हिंदी के लेखक, विचारक अपने दृष्टि-पटल को व्यापक और उदात्त बनाएं और उठाने-गिराने के छद्मों से मुक्त हों, फिर चाहे भाषा कोई भी हो, साहित्य और साहित्यकार किसी भी भाषा का हो। किसी अन्य भाषा के साहित्य और साहित्यकार की निंदा या अपमान करके हम स्वयं अपना, अपनी भारत और अपने लेखक का सम्मान प्रतिष्ठित नहीं कर सकते। भाषाएं ज्ञान का विस्तार करती हैं। उनका परंपरा के नाम पर अपमान कहां तक उचित है?

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