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रंगमंचः हिंदी रंगमंच की चुनौतियां

हिंदी रंगमंच के समक्ष चुनौतियां वास्तव में जितनी दिखतीं हैं, उतनी हैं नहीं। उसे अपने ही पैरोकारों से खतरा है।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 04:21 am
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हिंदी रंगमंच और रंगकर्म के समक्ष चुनौतियां बहुत हैं, जिनसे जूझना और निजात पाना आसान नहीं है। इनमें सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, कुलीनतावाद, उपभोक्तावाद और सबसे अधिक उभर कर आई कला बनाम व्यावसायिकता की चुनौतियां इन दिनों हिंदी रंगमंच को अधिक झेलनी पड़ रही हैं। इन चुनौतियों के पीछे जिन दृष्टियों का आधार है, वे इसे अपने स्तर पर निर्धारित करने लगी हैं।

वही प्रस्तुतियां हों, जो विभाजनवादी दृष्टि को पुष्ट करें, उन्हीं प्रस्तुतियों को प्राथमिकता दी जाए जो एक क्षेत्र-विशेष की मानसिकता (यहां संकेत केंद्रीय कही जाने वाली धारा से है) को पुष्ट करें, उन्हीं मंचों को प्रतिष्ठा दी जाए, जिनमें कुलीनता और शास्त्रीयता को प्रमुखता मिले, वे नाटक ही मंचित हों, जो बाजारवादी मूल्यों को प्रसारित करते हों और उन्हीं प्रस्तुतियों को महत्त्व दिया जाए, जिनमें व्यवसाय-वृत्ति को वहन करने की क्षमता हो, जिनमें समय के साथ बदल गए दर्शक और उनकी मानसिकता को संतुष्ट करने की तत्परता हो।

मोटे तौर पर हिंदी रंगमंच इन्हीं चुनौतियों से जूझ रहा है और उसकी जनतांत्रिकता, सामाजिक सरोकार, कलात्मकता और सांस्कृतिक प्रदर्शनधर्मिता दांव पर लगी है। सच्चाई यह है कि केंद्रीय रंगमंचीय प्रतिष्ठानों से जुड़े निर्देशकों, नाटककारों और संस्थाओं ने इन्हीं लक्ष्यों के लिए कार्य करने को अपना मुख्य कर्म मान लिया है।

इसी से जुड़ा एक अहम प्रश्न यह है कि क्या हमने आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी की एक समन्वित रंग-परंपरा बनाने की कोशिश की है? ईमानदारी से कहें तो नहीं। हमने जो हिंदी की मुख्यधारा का रंगमंच बनाया है, वह या तो विदेशी नाटकों के अनुवाद का मंच है या फिर भारतीय भाषाओं के नाट्यांतरण का। इस मंच में; जिसे हम प्रतिनिधि हिंदी रंगमंच कहने का भ्रम पालते हैं; उसमें नाच, बिदेसिया, तमाशा, नाचा, बिदापत, नौटंकी और कीर्तनियां आदि क्षेत्रीय नाट्य-पद्धतियों के लिए कोई जगह नहीं है, जो समन्वित रूप से एक केंद्रीय हिंदी रंगमंच बना सके और समूचे हिंदी क्षेत्र की जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व हो सके।

जब तक क्षेत्रीय हिंदी नाट्य-परंपराओं से एक समग्र हिंदी रंगमंच का निर्माण नहीं होगा, तब तक केवल इन्हीं चुनौतियों पर बहस करना अनावश्यक लगता है। पहले एक समग्र हिंदी रंगमंच तो बने, फिर उसके समक्ष आर्इं चुनौतियों पर भी विचार करने की गुंजाइश होगी। यह महज एक धारणा नहीं, आवश्यकता भी है; क्योंकि नाट्यालेख, दर्शक, रंगकर्म के स्तर पर सहकार और रंग-समीक्षा जैसे विकट प्रश्नों का उत्तर देना इसी प्रकार संभव है।

आखिर हबीब तनवीर का रंगकर्म व्यवहार के धरातल पर हिंदी रंगकर्म का आदर्श कब बनेगा? हबीब तनवीर का रंगकर्म केवल प्रशंसा का रंगकर्म नहीं है, वह हिंदी के समग्र मंच का मॉडल है। उसकी समीक्षा से ही हिंदी रंगकर्म की नाट्यालोचना भी वास्तविक आकार पा सकती है; क्योंकि वह रंग-परंपरा के सृजनशील उपयोग से संभव हुआ है। उसमें स्तानिस्लावस्की, ब्रेख्त जैसे रंग-चिंतकों से अधिक भरतमुनि के रंग-सिद्धांतों का व्यावहारिक उपयोग है। उसमें पश्चिम का ‘अभिनय’ नहीं, पारंपरिक भारतीय ‘प्रदर्शन’ का उपयोग है।

ध्यान देने की बात है कि ‘अभिनय’ सायास किया जाता है, जबकि ‘प्रदर्शन’ स्वाभाविक रूप से होता है। भारतीय रंगकर्म पारंपरिक रूप से स्वभावत: प्रदर्शनधर्मी है, अभिनयधर्मी नहीं। प्रदर्शनधर्मी होने के कारण ही हबीब तनवीर का रंगकर्म हिंदी के मध्यभाग की बोली, नाट्यपद्धति और जीवन-संघर्षों से उठे कथानकों के उपयोग से जीवंत बनता है।

इसी तरह ‘बिदेसिया’ शैली में निबद्ध नाटकों को केंद्रीय हिंदी रंग-परंपरा का एक भाग बनाया जा सकता है, जो करोड़ों भोजपुरीभाषी जनता की चेतना, आकांक्षा, संघर्ष, सांस्कृतिकता और उसके स्वप्नों को अभिव्यक्त करते हैं। यह कितना दुखद लगता है कि करोड़ों भोजपुरीभाषी जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले भिखारी ठाकुर हिंदी की मुख्यधारा के रंगमंच पर न केवल अलक्षित, बल्कि भयावह उपेक्षा के शिकार भी हैं। इस पर आपत्ति तो होगी ही कि जिन उपभाषाओं ने अपनी कीमत पर हिंदी को विस्तार, अस्मिता और संभावना दी, उनके सांस्कृतिक उद्यमों की उपेक्षा की जाए।

एक समय, और आज भी समर्पित कथाकार-नाटककार हृषीकेश सुलभ ने भिखारी की परंपरा में जिन नाटकों को रचा है या जिन पर सफल प्रस्तुतियां संभव हुर्इं हैं, क्या उन्हें हिंदी की मुख्यधारा के रंगमंच पर स्थान नहीं मिल सकता? ‘मैला आंचल’, ‘अमली’ जैसे नाटक और शूद्रक के ‘माटीगाड़ी’ (मृच्छकटिकम) जैसे नाटकों को हृषिकेश सुलभ ने जो स्थानीयता दी है, जिस तरह से उसे हिंदी के जातीय संदर्भों से जोड़ा है और उसे आज के प्रसंगों में प्रासंगिक बनाया है, उसमें हिंदी के समक्ष खड़ी अनेक चुनौतियों से लड़ने की ताकत दिखाई देती है। प्रश्न है कि क्या उसे कोई देख पा रहा है?

आश्चर्य की बात तो यह है कि हिंदी की मुख्यधारा के रंगमंच पर ऐसी प्रस्तुतियों को हास्य से अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता। आखिर क्यों? ऐसी ही स्थिति हिंदी के अनेक क्षेत्रों में रचित नाटकों और हो रही प्रस्तुतियों पर दिखाई देती है। बघेली, मैथिली, छत्तीसगढ़ी, अवधी आदि भाषाओं की नाट्यशीलता के साथ ऐसा ही व्यवहार होता रहा है। मुझे लगता है कि इसका समेकित उत्तर खोजे बिना हिंदी रंगमंच के समक्ष आर्इं चुनौतियों पर बहस निरर्थक है।

असल सवाल है कि अनेक दबावों के बीच जिस तरह हिंदी की रचनाशीलता और उसके सांस्कृतिक उपादानों का संकुचन हो रहा है, उसके रंगकर्म की स्थिति इससे अलग नहीं है। एक तो यह आज भी अपनी वास्तविक पहचान नहीं पा सका तो दूसरी ओर उसे खा जाने वाली ताकतें सक्रिय हो उठीं। इन हालात ने हिंदी रंगकर्म को बहुत प्रभावित किया है। यह समझ पाना मुश्किल होता जा रहा है कि जो लोग हिंदी के सांस्कृतिक उद्यमों को जानते तक नहीं, वे इसकी तकदीर बन कर इतराते फिरते हैं। जिन्हें हिंदी जनता की आशाओं-आकांक्षाओं से कोई वास्ता नहीं, वे सिर्फ उसे हांक सकते हैं; उसकी चिंताओं की परवाह नहीं कर सकते।

हिंदी रंगमंच के समक्ष चुनौतियां वास्तव में जितनी दिखतीं हैं, उतनी हैं नहीं। उसे अपने ही पैरोकारों से खतरा है। जब उसकी व्यापकता की प्रतिष्ठा होगी और उसे एक संयुक्त कला के रूप में देखा जा सकेगा, तो वह इन मुश्किलों से बाहर आ सकेगी। इसका एक कारण यह भी है कि हिंदी रंगमंच के विस्तार में इन चुनौतियों से लड़ पाने की स्वाभाविक सामर्थ्य है।

इसमें यह भी कहना निरापद नहीं है कि हिंदी रंगकर्म में अनुवाद और नाट्यांतरण की संस्कृति से दूरी बनाई जानी चाहिए, साहित्य की पाठ्य-विधाओं में भी जबर्दस्ती नाटक खोजने से बचा जाना चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि हिंदी में लिखित मौलिक नाटकों को तरजीह दी जाए। रंगकर्म जब सचमुच एक मिशन हो सकेगा और हिंदी में उसकी एक संस्कृति बन सकेगी जैसे कि वह बांग्ला, मराठी या कन्नड़ में है, तो जनता भी उसमें अपने जीवन की अभिव्यक्ति पा सकेगी। और जब जनता की भागीदारी होगी तो कोई चुनौती हिंदी रंगमंच के विकास और उसकी सृजनशीलता को प्रभावित नहीं कर सकेगी।

(ज्योतिष जोशी)

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