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तीरंदाज़ : लोक-संवाद में अड़चन न बनें

हिंदी शायद वह भी है, जिसे हम बंबइया कहते हैं, यानी मराठी में सनी खड़ी बोली और अंगरेजी के शब्द। पंजाबी भी अंगरेजी के शब्दों के सहारे दिल्ली वाली पंजाबी होती जा रही है..

Author नई दिल्ली | December 20, 2015 12:24 AM
जब हमारे विद्वान धड़ल्ले से ‘लब्धप्रतिष्ठ’ की जगह ‘लब्ध प्रतिष्ठित’ बोल रहे हैं, ‘अनेकों’ और ‘श्रीमति’ का प्रचलन आम और क्षम्य हो गया है, तो फिर युवा पीढ़ी का क्या दोष! वह तो वही आत्मसात कर रही है, जो हम उसको परोस रहे हैं।

मैं हिंदी में सोचता हूं। पर एक्चुअली देखा जाए तो मैं हिंगलिश में सोचता हूं। लिखता दोनों- इंग्लिश और हिंदी- में हूं, खालिस हिंदी और अंगरेजी में। कोई मिलावट नहीं करता, क्योंकि शुद्ध भाषा लिखने की तनख्वाह मिलती है। पर जब गुस्सा आता है, तो अनायास अंगरेजी मुंह से फूट पड़ती है और जब प्यार आता है- रोमांटिक वाला- तो उर्दू के सहारे दिल-ए-नादां अपनी तोतली जुबान में इश्कबाज हो जाता है। हां, जब बच्चों पर प्यार आता है तो जरूर फिर हिंगलिश पर उतर आता हूं। आजकल के बच्चे अच्छी हिंदी समझते ही कहां हैं! एक बार कोशिश की थी जब अपने साहबजादे को देख कर वात्सल्य भाव जाग गया और सूरदास की कुछ पंक्तियां जुबान से फिसल गर्इं। हमारे लख्ते-जिगर इर्रिटेट हो गए। ‘हिंदी में बोलिए न, ये कौन-सी लैंग्वेज है!’

वैसे उनकी दादी ने स्कूल में अंगरेजी और उर्दू ही पढ़ी थी। उस जमाने में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती थी। पर हाल ही में उनका मन कोफ्त हो गया, जब उन्हें पता चला कि घर में जो पुत्रवधू आने वाली है, वह अंगरेज है। ‘मैं उसको कैसे आशीर्वाद दूंगी? मरी अंगरेजी में तो बस गॉड ब्लेस यू है। लड़की हिंदुस्तानी होती तो मन भर कर आशीर्वाद देती- दूधो नहाओ पूतों फलों से सदा सुहागन रहो तक। वह समझती और फौरन फूल-सी खिल जाती। पर अब ये आशीर्वाद उस पर से ऐसे फिसल जाएंगे जैसे पत्थर से पानी। अरे, बहू आने का मजा ही आधा हो गया’, वे दुखी मन से बोलीं।

वैसे, मैं उन्हें मां नहीं मम्मी कहता हूं और पिताजी को डैडी। अंगरेजी स्कूलों में यही सिखाया जाता था। मेरे बच्चे भी मम्मी-पापा कहने के आदी हैं। कभी-कभी मूड में आकर पिताजी कह जाते हैं और मम्मी को मां। दोस्तों में अमिताभ बच्चन के डॉयलाग की तर्ज पर हमें बाप भी कहते हैं। बाप अंगरेजी के पॉप का शायद पर्यायवाची बन गया है। बच्चों के लिए दोनों ही हिंदी है।

हिंदी शायद वह भी है, जिसे हम बंबइया कहते हैं, यानी मराठी में सनी खड़ी बोली और अंगरेजी के शब्द। पंजाबी भी अंगरेजी के शब्दों के सहारे दिल्ली वाली पंजाबी होती जा रही है। कुछ साठ-सत्तर साल पहले पुरानी दिल्ली में एक तबके में ठेठ पंजाबी बोली जाती थी, तो दूसरे में बेहतरीन फारसी-उर्दू, लखनऊ में नवाबी उर्दू का चलन था और अवधी का, ब्रज में ब्रज ही ब्रज थी और बिहार में भोजपुरी और मैथिली का बोलबाला था। अंगरेजी एक छोटा-सा तबका अपने सरकारी कामकाज के लिए इस्तेमाल करता था और उसके व्याकरण का विधिवत पालन करता था। पर देखते ही देखते सब कुछ बदल गया या कहें कि घालमेल हो गया।

उत्तर भारत के हर हिस्से से एक बड़ी आबादी काम के सिलसिले में एक जगह से दूसरी जगह पलायित हुई और अपनी बोली/भाषा को स्थानीय बोली से टूटी-फूटी अंगरेजी के जरिए जोड़ा। रोजमर्रा के अंगरेजी शब्द अपनी बात कहने का सेतु बन गए, क्योंकि ठेठ बोली अपने क्षेत्र में ही सीमित थी और अंगरेजी व्याप्त हो चुकी थी। वैसे भी हिंदुस्तान का एक बड़ा तबका कई सौ सालों से बहुभाषी रहा है। अपनी मातृभाषा के साथ-साथ एकाध और भाषा कामचलाऊ ढंग से लिख-बोल सकता है। उसके लिए दूसरों के शब्द उधार लेना कोई बड़ी बात नहीं है। पंजाबी इसका बेहतरीन उदहारण है- ब्रज भाषा से लेकर फारसी तक ने उसके निर्माण में अपना र्इंट-गारा दिया है।

हिंदी वास्तव में खड़ी बोली का संस्कृतकरण है। आजादी के बाद इसको स्थापित करने के सरकरी प्रयास किए गए। नए दौर में नए शब्दों की जरूरत थी, जो अंगरेजी शब्दों की जगह इस्तेमाल किए जा सकें। क्षेत्रीय भाषाओं में वे शब्द थे नहीं और उनके निर्माण के लिए विद्वानों को संस्कृत शब्द-सागर में गोता लगाना पड़ा। हिंदी सरकारी भाषा तो बन गई, पर संस्कृत, फारसी और क्वींस इंग्लिश की तरह लोगों तक नहीं पहुंच पाई। इसमें साहित्य भी रचा गया, पर अमीर खुसरो, तुलसी, कबीर आदि की रचनाओं की तरह मन में नहीं उतर सका। गले में फांस की तरह अटक गया।

हिंदी को सरल और लोकप्रिय बनाने का काम कुछ हद तक हिंदी के अखबारों ने किया और बहुत हद तक हिंदी फिल्मों ने। अखबारों ने शुरू-शुरू में लोकभाषाओं से शब्द उठा कर क्लिष्ट शब्दों को हाशिए पर लगा दिया। सारा प्रयास यह था कि अखबारों में छपने वाले शब्द या वाक्य जबान से फिसलें, अटकें नहीं। दूसरी तरफ हिंदी फिल्मों ने अपना अलग ही व्याकरण बनाया। शुद्धता ताक पर रख कर फिल्मकारों ने हिंदी, उर्दू, अंगरेजी और क्षेत्रीय बोलियों से वे शब्द, मुहावरे उठाए, जो भारत के संपूर्ण भूगोल में आसानी से समझे जा सकें। यानी फिल्मों ने वास्तविक हिंदुस्तानी जबान का निर्माण किया और संवाद का सरल रास्ता बनाया।

तो क्या आज हिंदी फल-फूल रही है? हां, क्योंकि उसके चलते उर्दू लगभग खत्म हो गई है। अच्छी अंगरेजी भी लोक मानस का हिस्सा नहीं है। क्षेत्रीय भाषाएं अब भी बोली जाती हैं, पर उसके आगे उनका कोई उपयोग नहीं है। इनका साहित्य भी खत्म हो गया है। आज सारी भारतीय भाषाएं/ बोलियां लिंक वर्ड्स पर निर्भर हो गई हैं और लिंक देती है अंगरेजी- अंगरेजों वाली अंगरेजी नहीं, हमारी-आपकी अंगरेजी, जिससे तमिल में भी हिंदी संवाद संभव है, अगर उसमें कुछ अंगरेजी शब्द पिरोए हुए हों।

नए रचनाकार (उनको साहित्यकार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता), चाहे अंगरेजी के हों या भोजपुरी के, इन लिंक वर्ड्स को अवॉयड नहीं कर सकते। वे उनके पात्रों, कहानी, वातावरण और उनकी अभिव्यक्ति का जरूरी हिस्सा हैं। आज के काल का भाव है। शुद्ध संस्कृत प्रेरित हिंदी वह भाव नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे अंगरेजों की इंग्लिश भी आज भारतीय मानस का भाव नहीं है। वह सरकारी फाइलों का हिस्सा जरूर है, जैसे कि मुगल काल के अंत में फारसी थी, पर आम जुबान नहीं है। गालिब भी फारसी को छोड़ कर उर्दू में कलाम लिखने लगे थे, क्योंकि उर्दू में वे लिंक वर्ड्स थे, जिनसे संदर्भ और मतलब आसानी से प्रेषित किया जा सकता था।

उनसे पहले तुलसी ने रामचरितमानस संस्कृत में नहीं, अवधी में लिखी और गौतम बुद्ध ने भी अपने शिष्यों को कड़ी हिदायत दी थी कि उनका दर्शन वे संस्कृत में नहीं, प्राकृत में ही लिखें और प्रसारित करें। तुलसी और बुद्ध दोनों से विद्वान पंडितों की बहस हुई थी और दोनों अपनी बात से नहीं हटे थे।

वास्तव में हिंदी का सुख उसके कठोर व्याकरण में नहीं, उसके सहज भाव में है और वह भाव आज की संवाद क्षमता में छिपा है। अगर हिंदी सरल संवाद करने में कामयाब है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस भाषा का लिंक वर्ड इस्तेमाल करती है। जो लोग डरते हैं कि हिंदी का अंगरेजीकरण हो रहा है या हिंदी बंबइया हो रही है या उसके सतीत्व पर कुठाराघात हो रहा है, वे लोक-संवाद में अड़चन बन रहे हैं- जनमानस पर इमोशनल अत्याचार कर रहे हैं। हिंदी को हिंदुस्तानी होने से मत रोकिए, प्लीज। गॉड ब्लेस भी हिंदी है और सदा सुहागन रहो भी। हम दोनों आशीर्वाद पाने पर एक ही तरह से पुलकित होते हैं।

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