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उच्च शिक्षण संस्थान और संगोष्ठियां : संगोष्ठियों का सच

विश्वविद्यालयों के सेमिनारों में बुलाए जाने का पैमाना विद्वता से नहीं, बल्कि वरिष्ठता से तय होता है। क्षेत्र विशेष में योगदान नहीं, बल्कि नेटवर्किंग ज्यादा उपयोगी साबित होती है और इसका मकसद होता है, एक-दूसरे को लाभ पहुंचाना।

Author नई दिल्ली | January 29, 2017 4:21 AM
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में होने वाले सेमिनार इस संवाद प्रक्रिया के एक जरूरी मंच हैं और जिनके होने से शिक्षा संस्थाओं की बौद्धिक पहचान बनती है।

जवरीमल्ल पारख

वित्तीय वर्ष की समाप्ति के अंतिम तीन महीनों के दौरान विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में सेमिनारों की बाढ़-सी आ जाती है। इसकी बड़ी वजह है, उस वित्तीय वर्ष में सेमिनारों के लिए निर्धारित पैसों को खर्च करने का दबाव। लेकिन इसके अलावा भी कई गौण कारण होते हैं, जिनमें वित्तीय आबंटन में देरी होना और अक्तूबर से दिसंबर के बीच बहुत से त्योहारों का पड़ना है। पर बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ये सेमिनार अपने उद्देश्य को पूरा करने में कामयाब होते हैं। विश्वविद्यालय और कॉलेज उच्च शिक्षा के ऐसे संस्थान हैं, जिनका काम सिर्फ उपाधियां प्रदान करना नहीं है। अगर उन्हें ऐसा समझा जाता है या उन्हें इन्हीं में सीमित कर दिया जाता है तो न वे ज्ञान के नए क्षेत्रों की खोज कर सकते हैं और न ही पहले से उपलब्ध ज्ञान में कुछ नया जोड़ सकते हैं। कॉलेज और विश्वविद्यालय ऐसे सामाजिक संस्थान हैं, जहां नई सोच और नए विचार पैदा होते हैं। इनकी बौद्धिक गरिमा से ही देश की गरिमा निर्मित होती है। विश्वविद्यालय का शैक्षिक माहौल कक्षा आधारित अध्यापन से नहीं बनता और न ही प्रयोगशालाओं में पाठ्यचर्या आधारित प्रयोगों से। यह उस पूरे शैक्षिक माहौल से निर्मित होता है, जो अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच बहसों के माध्यम से अनवरत और उन्मुक्त भाव से चलता रहता है। इसकी प्रकृति बुनियादी तौर पर लोकतांत्रिक और समतावादी होती है। इनमें किसी तरह की श्रेणीबद्धता या हानि-लाभ का भाव नहीं होता। इन बहसों के विषय पाठ्यक्रमों और पाठ्यचर्याओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि विश्व की समस्त गतिविधियां उनमें शामिल होती हैं।

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में होने वाले सेमिनार इस संवाद प्रक्रिया के एक जरूरी मंच हैं और जिनके होने से शिक्षा संस्थाओं की बौद्धिक पहचान बनती है। कक्षाओं के अतिरिक्त होने वाली इन बौद्धिक गतिविधियों से विद्यार्थी न सिर्फ लाभान्वित होते हैं, बल्कि उनकी सोच-समझ का परास विस्तृत होता है। उम्मीद यही की जाती है कि इन सेमिनारों में सभी तरह के विचारों को बिना किसी भय और दबाव के अपने को व्यक्त करने का अवसर मिले। लेकिन इसके साथ ही उन विचारों की आलोचना और प्रत्यालोचना करने की भी पूरी स्वतंत्रता प्राप्त हो। उन्हें राष्टÑवादी या राष्टÑविरोधी कह कर तिरस्कृत या बहिष्कृत न किया जाए। अगर वक्ताओं में भय हो और श्रोताओं में असहिष्णुता तो बौद्धिक विमर्श का लोकतांत्रिक माहौल निर्मित नहीं हो सकता। यह तो नहीं कहा जा सकता कि विश्वविद्यालयों में होने वाले सेमिनार इस आदर्श स्थिति के अनुरूप होते रहे हैं। मगर यह भी सही है कि इसमें पिछले कुछ सालों में भयावह गिरावट आई है।

कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में आयोजित होने वाले सेमिनारों की गिरावट का एक बड़ा कारण उन नीतियों में निहित है, जो अध्यापकों की नियुक्ति और प्रोन्नति से संबंधित हैं। सरकारें समझती हैं कि अगर उच्च शिक्षा संस्थानों में काम करने वाले अध्यापकों की नियुक्ति और प्रोन्नति से शोध कार्य को जोड़ दिया जाए तो स्वत: उनके शैक्षिक स्तर में बढ़ोतरी होगी। इसके लिए कुछ अंक भी निर्धारित कर दिए गए हैं, जिन्हें शैक्षिक निष्पादक संकेतक (एपीआइ) कहा जाता है। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ है कि शोध कार्यों के स्तर और गुणवत्ता में निरंतर गिरावट हो रही है। प्रोन्नति के लिए प्रकाशित होने या सेमिनारों में पढ़े जाने वाले शोधपत्रों में भी इसी गिरावट को देखा जा सकता है।

सेमिनारों के लिए आमतौर पर पैसा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से प्राप्त होता है, जिसे प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालय और कॉलेज की ओर से सेमिनार के लिए विस्तृत प्रस्ताव भेजा जाता है और उस प्रस्ताव की स्वीकृति पर ही उन्हें अनुदान प्राप्त होता है। नए अध्यापकों के लिए इन सेमिनारों की सबसे बड़ी उपयोगिता यह होती है कि इनमें भागीदारी से जो एपीआइ (शैक्षिक निष्पादन संकेतक) अंक अर्जित करते हैं वे उनके आगामी प्रोन्नति में काम आते हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों द्वारा निरंतर सेमिनार होते रहें और उनमें भागीदारी द्वारा नए अध्यापक प्रोन्नति के लिए आवश्यक एपीआइ अंक अर्जित कर सकें।

सेमिनारों में प्रस्तुत आलेखों से मौलिक और शोधपरक होने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन जिस थोक भाव से विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं, वहां ऐसी संभावना न्यूनतम होती जा रही है। व्यवहार में देखा यही जाता है कि एपीआइ अंक हासिल करने के लिए सेमिनार में पत्र-वाचन करने वाले ज्यादातर प्रतिभागियों के लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं होता कि उनका आलेख किस स्तर का है और उन्हें आलेख प्रस्तुत करने के लिए कितना समय दिया जाता है, या वह विचार-विमर्श का हिस्सा बनता है या नहीं। उनके लिए सबसे जरूरी होता है पत्र-प्रस्तुति का प्रमाणपत्र हासिल करना। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्हें पत्र पढ़ने का अवसर दिया गया या नहीं। एक सेमिनार में अगर सौ आलेख प्रस्तुत किए गए हैं, तो उनमें मुश्किल से पांच या दस आलेख कुछ हद तक स्तरीय होते हैं और वे भी इन शोधपत्रों के ढेर में अनचिन्हे रह जाते हैं।

इन सेमिनारों में विषय से संबंधित कुछ विद्वानों (जो आमतौर पर विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर होते हैं) को व्याख्यान देने के लिए बुलाया जाता है। ये विद्वान और इनके व्याख्यान ही उक्त सेमिनारों की सबसे बड़ी उपलब्धि माने जाते हैं। पर बहुत कम विद्वान (?) सेमिनारों को गंभीरता से लेते हैं। वे चाहते हैं कि उन्हें सेमिनारों का उद्घाटन या बीज व्याख्यान या अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया जाए, जो उनके पद और वरिष्ठता के अनुरूप हो। पत्र-वाचन को वे छोटा काम समझते हैं। हिंदी के आचार्यगण प्राय: लिखित आलेख प्रस्तुत नहीं करते। उनके लिए यह भी जरूरी नहीं है कि दिए गए विषय पर वे अपना व्याख्यान दें। उनके लिए बिना किसी तैयारी के चालीस-पचास मिनट तक इधर-उधर की हांकना ही विद्वता है। अपने अनुभव से कह सकता हूं कि विश्वविद्यालयों के इन सालाना होने वाले सेमिनारों से कहीं बेहतर सेमिनार गैर-सरकारी और गैर-व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा आयोजित होते हैं।

विश्वविद्यालयों के सेमिनारों में बुलाए जाने का पैमाना विद्वता से नहीं, बल्कि वरिष्ठता से तय होता है। क्षेत्र विशेष में योगदान नहीं, बल्कि नेटवर्किंग ज्यादा उपयोगी साबित होती है और इसका मकसद होता है, एक-दूसरे को लाभ पहुंचाना। ज्यादा से ज्यादा फंड हासिल करना और ज्यादा से ज्यादा आचार्यों को आमंत्रित करना आयोजक की नेटवर्किंग क्षमता को दिखाता है। तरह-तरह की गुटबंदियां और आपसी राग-द्वेष भी इसमें सक्रिय रहते हैं। इसी का नतीजा है कि विश्वविद्यालयों के सेमिनार ऐसे अनुष्ठानों में बदलते जा रहे हैं, जिनके साथ जुड़े शैक्षिक लक्ष्य ही सबसे ज्यादा उपेक्षित रह जाते हैं। अध्यापकों के बीच इन प्रवृत्तियों के बलवती होते जाने ने उन ताकतों को विश्वविद्यालयों के शैक्षिक माहौल को बिगाड़ने और अपना वर्चस्व स्थापित करने का अवसर प्रदान किया है, जिनकी लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय से प्रेरित वैचारिक बहसों में यकीन नहीं है।

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