ताज़ा खबर
 

उच्च शिक्षण संस्थान और संगोष्ठियां : रस्मी कवायद

सरकारी संस्थानों के सेमिनार में आयोजक और भाग लेने वाले उसे मुख्यत: अपने बायो-डाटा और संस्थान द्वारा किए कार्य का विवरण बढ़ाने मात्र को उपयोग की चीज समझते हैं। इसीलिए, बरसों, दशकों से किसी सेमिनार या उसमें पढ़े पर्चों के प्रकाशन की कोई प्रसिद्धि या चर्चा नहीं सुनी जाती।

Author नई दिल्ली | January 29, 2017 4:26 AM
राजनीतिकरण और उत्तरदायित्व-हीनता से सब कुछ खत्म हुआ है। इस हद तक कि बड़े-बड़े संस्थानों के अधिकारी इसे समझने तक से लाचार मिलते हैं।

शंकर शरण

सरकारी विश्वविद्यालयों, संस्थानों में होने वाले सभा-सेमिनारों की गुणवत्ता समय के साथ तेजी से गिरी है। आबंटित रकम खर्च करना और रिपोर्ट जमा कर देना मुख्य कार्य रह गया है। खासकर सामाजिक ज्ञान और मानविकी विभागों के लिए यह हूबहू सच है। किसी सेमिनार का उद्देश्य क्या था, उससे क्या निकला और उससे जुड़ा आगे कोई कार्य है या नहीं- ऐसे सवाल अनर्गल हो चुके हैं। आयोजक ऐसे प्रश्नों की कल्पना तक नहीं करते, उत्तर सोचना तो दूर रहा। सेमिनार आयोजन के सूचना-पत्रों से ही यह झलक उठता है। चूंकि सालाना बजट आता है, उसे खर्च करना है, इसलिए विविध गतिविधियों की तरह सेमिनार भी किए जाते हैं। किसी को उद्घाटन के लिए बुला लिया, फोटो खिंच गई, बाकी सब रूटीन रस्म। रिपोर्ट जमा, अगले साल फिर वही क्रम। दिमाग केवल इस पर दौड़ाया जाता है कि किस व्यक्ति, विषय पर सेमिनार योजना बनाएं ताकि मंजूरी मिल जाए। हालांकि मंजूरी में कोई अड़चन नहीं, सिवा तकनीकी खानापूरी के, क्योंकि पैसे देने वाली सरकारी संस्थाएं खुद चाहती हैं कि अधिक से अधिक पैसे दिए जाएं, ताकि अगले बजट में और पैसों की मांग की जा सके। क्योंकि संसद में भी किसी विभाग की कार्य-कुशलता का यही मानक है कि उसने कितने पैसे खर्च किए।

यह एक मोटी-सी तस्वीर है। जगह-जगह, यदा-कदा कुछ अपवाद भी हो सकते हैं। पर सरकारी संस्थानों के सेमिनार में आयोजक और भाग लेने वाले उसे मुख्यत: अपने बायो-डाटा और संस्थान द्वारा किए कार्य का विवरण बढ़ाने मात्र को उपयोग की चीज समझते हैं। इसीलिए, बरसों, दशकों से किसी सेमिनार या उसमें पढ़े पर्चों के प्रकाशन की कोई प्रसिद्धि, चर्चा या उल्लेख नहीं सुना जाता। बड़े प्रोफेसर खुद मजाक में कहते हैं कि सेमिनारों में ‘मीट, ईट, रिपीट’ ही होता है। यह कितना लज्जाजनक है, इसका उन्हें भान तक नहीं है।
गैर-सरकारी संस्थानों में स्थिति काफी भिन्न है। विषय चयन से लेकर आमंत्रित वक्ता और श्रोताओं तक पर वास्तविक सोच-विचार होता है। कारण वही है कि वहां ऊपर कोई देखने-परखने वाला रहता है कि काम की गुणवत्ता कैसी रही। किसी गतिविधि से क्या निकल कर आया। यानी मात्र पैसे खर्च करना काम का पर्याय नहीं समझा जाता। साथ ही अच्छे, औसत और बेकार प्रोफेसर, वक्ता या शोधार्थी की पहचान पर ध्यान रखा जाता है। तदनुरूप मान-सम्मान, तरक्की, आदि भी। न थोक भाव में नियुक्तियां, न सिफारिशी, भाई-भतीजावादी या राजनीतिक प्रवृत्तियों की प्रमुखता। लेकिन चूंकि अभी भारत में नब्बे प्रतिशत से अधिक विश्वविद्यालय और अकादमिक संस्थान सरकारी क्षेत्र में हैं, इसलिए वहां मौजूद अकादमिक वर्ग वास्तव में नाम का है। इसलिए भी, उनके सेमिनार वैसे ही लफ्फाजी भर होते हैं।

राजनीतिक उद्देश्यों से शैक्षिक संस्थानों का संख्यात्मक विस्तार, उसी कारण शैक्षिक-वैचारिक गतिविधियों का संचालन, नियुक्तियों में गुणवत्ता के प्रति बेफिक्री, नियुक्तियों का स्थाई रूप, सामाजिक हितों के प्रति सरकारों की बेपरवाही, नेताओं द्वारा पार्टी-हित की सर्वोपरिता- यह सब विगत दशकों में हमारे अकादमिक संस्थानों की दुर्गति के कारण हैं। अब विश्वविद्यालय केवल कागजी, प्राय: नकली प्रमाण-पत्र देने वाले कारखाने रह गए हैं। वहां कोई उच्च अध्ययन, चिंतन नहीं होता। वह सरकारी मंत्रालयों के एक्सटेंशन अंगों के रूप में केवल पैसे खर्च करने, लूटने-लुटाने की जगह में बदल चुके हैं। यहां स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो पहली पीढ़ी विश्वविद्यालयों में आई, तब तक अंगरेजों द्वारा बनाए मानकों और आॅक्सफर्ड-कैंब्रिज, अमेरिका से प्रशिक्षित भारतीय विद्वानों की निष्ठा की झलक शेष थी। उनके रिटायर होते न होते सब कुछ एक बारगी बदल गया। जिन संस्थानों की देश भर के विद्वत जगत में प्रतिष्ठा थी, वहां थोक भाव उल्लू बोलने लगे। ऊपर गिनाए गए कारणों से अब सामाजिक-मानविकी विभागों में कहीं कुछ नहीं बचा है।

इसे सुधारना इसलिए असंभव है, क्योंकि सभी राजनीतिक दल एक ही लीक पर हैं। किसी तरह लोगों को बहला कर, तोड़ कर सत्ता लेना, और सत्ता में बने रहने की जुगत में लगे रहना। इसके लिए सारे सरकारी संस्थान उनके निजी और पार्टी हित-साधन के औजार हैं। इसलिए इसमें सुधार की आशा नहीं करनी चाहिए। विश्वविद्यालय, अकादमिक संस्थान अब सिर के बल खड़े हैं। वहां के मुख्य स्तंभ विद्वान और विद्यार्थी के बजाए बिल्डिंग, फंड और खानापूरी हैं। उन्हें पैरों पर खड़ा करने के लिए सच्चे विद्वानों को खोज कर लाना और असली विद्यार्थियों को प्रोत्साहन देना अनिवार्य है। यह संभव नहीं, क्योंकि हमारे सत्ताधारी लोग पार्टी-हितों के बंदी और अज्ञानी हैं। इसलिए वैसा करने में न उनकी रुचि, न उनमें इसकी योग्यता है। इसकी सच्चाई आज भी यूरोपीय विश्वविद्यालयों, अकादमिक संस्थानों से तुलना कर जांच सकते हैं। उन्हीं की शैली में यहां विश्वविद्यालय भवन से लेकर शिक्षा-कार्यक्रम तक सब शुरू किए गए थे। वे यूरोपीय संस्थान आज भी अपना गौरव बनाए हुए हैं, जबकि भारत में अब एक भी विश्वविद्यालय सामाजिक ज्ञान, मानविकी में किसी विशिष्टता के लिए नहीं जाना जाता।

यहां सेमिनारों, गोष्ठियों की दयनीय स्थिति उन्हीं मूल कारणों से है। अलग से इसके कोई कारण नहीं हैं। राजनीतिकरण और उत्तरदायित्व-हीनता से सब कुछ खत्म हुआ है। इस हद तक कि बड़े-बड़े संस्थानों के अधिकारी इसे समझने तक से लाचार मिलते हैं। सुधारने की चिंता करना तो दूर रहा। इस दुर्गति से निकलने के लिए गैर-सरकारी, सामाजिक प्रयासों से ही आशा करनी चाहिए। उन्हीं से निवेदन, आग्रह और उन्हीं को प्रोत्साहित करना चाहिए। यानी नए संस्थान बनाना, जो समाज द्वारा चलाए जाएं, जिन्हें स्थानीय, क्षेत्रीय या राष्ट्रीय लोग उसी चिंता से चलाएं जैसे अपने पारिवारिक हितों के लिए करते हैं। राष्ट्रीय, सामाजिक स्वाभिमान को केंद्र में लाए बिना हमारे विचार-विमर्श में गुणवत्ता नहीं आ सकती। यह सरकार नहीं, समाज द्वारा ही हो सकता है।

वैसे भी, भारतीय परंपरा में शिक्षा और चिंतन-विमर्श राजकीय नहीं, विशुद्ध सामाजिक गतिविधि और स्वामित्व का क्षेत्र था। स्वतंत्र भारत में समाजवादी, मुख्यत: नेहरूवादी-मार्क्सवादी व्यामोह में सब कुछ सरकार द्वारा, फिर उसे विशेष पार्टी और विचारधारा द्वारा करने का जो दावा शुरू हुआ, उसने हमारी शिक्षा, चिंतन और विमर्श को गर्त में ले जाने में जबर्दस्त भूमिका निभाई। सोवियत मॉडल पर देश भर में असंख्य संस्थान और योजनाएं बनाई गर्इं, जो जल्द ही पार्टी और राजनीतिक विचारधारा की सेवा का साधन बन कर रह गर्इं। सभी पार्टियों ने निरपवाद रूप से वही मॉडल अपना लिया, क्योंकि पार्टी और निजी हित साधन के लिए सरकारी संस्थाएं दुधारू गाय बनाई जा चुकी थीं। इसलिए जैसे आर्थिक क्षेत्र में विनिवेशीकरण हुआ, उसी तरह शिक्षा क्षेत्र में सरकार और राजनीतिक दलों को धीरे-धीरे बाहर किए बिना हमारी सद्गति नहीं दिखती। विचार-विमर्श, गोष्ठी, सेमिनार, प्रकाशन, चिंतन, सब जगह लफ्फाजी खत्म कर गुणवत्ता की पुनर्स्थापना इसी से जुड़ी है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App