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तवलीन सिंह का कॉलम वक़्त की नब्ज़ : ध्यान बंटाने का मौका

रोहित वेमुला के मामले में संवेदनशीलता मानव संसाधन विकास मंत्री ने भी नहीं दिखाई, जब दो विद्यार्थी गुटों के झगड़ों के बीच आने का काम किया..

Author नई दिल्ली | January 24, 2016 5:40 PM
नई दिल्ली में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के खिलाफ प्रदर्शन करते युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता। (पीटीआई फाइल फोटो)

होता कई बार ऐसा है कि अपने वतन को दूर किसी दूसरे देश से देखा जाए तो वे चीजें दिखने लगती हैं, जो देश के अंदर रहते हुए नहीं दिखतीं। सो, रोहित वेमुला का पत्र मैंने दावोस में पढ़ा और आंखें भर आर्इं। खुदकुशी के जो कारण उसमें लिखे थे उनसे साफ जाहिर था कि एक काबिल युवक अपनी जान लेने पर मजबूर इसलिए हुआ क्योंकि अपने साथ हुई नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं कर पाया। दोष उसका जो भी रहा हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय के अधिकारियों की नजरों में, उसको जिस तरह बाहर निकाला गया, बिलकुल गलत था। वह दलित न होता तो भी गलत होता, लेकिन चूंकि वह एक गरीब दलित परिवार से था, और भी ज्यादा संवेदनशीलता की जरूरत थी। यह संवेदनशीलता मानव संसाधन विकास मंत्री ने भी नहीं दिखाई, जब दो विद्यार्थी गुटों के झगड़ों के बीच आने का काम किया। अब चाहे कुछ भी कहें अधिकारी या मंत्री, एक नौजवान की जान चली गई है और इसको किसी भी हाल में माफ नहीं किया जा सकता। इन लोगों में थोड़ा-सा भी आत्मसमान अगर है, तो इनको फौरन अपने इस्तीफे दे देने चाहिए।

ऐसा कहने के बाद यह भी कहना जरूरी है कि जिस बेशर्मी से कुछ ‘सेक्युलर’ राजनेताओं ने रोहित की चिता पर रोटियां सेंकने की कोशिश की है, वह बेशर्मी की हद है। राहुल गांधी और डेरेक ओब्रायन को इतनी चिंता होती दलित छात्रों के साथ अन्याय की तो उस समय क्यों नहीं हैदराबाद पहुंचे जब रोहित और उसके दलित साथी प्रदर्शन कर रहे थे? उस समय जाकर हमदर्दी जताई होती तो मुमकिन है कि रोहित आज जिंदा होता। सो, अब क्यों इतनी तकलीफ हो रही है कि हैदराबाद पहुंच कर लंबे-चौड़े भाषण दे रहे हैं? दलित छात्रों ने पहले भी अन्याय न बर्दाश्त होने के कारण आत्महत्याएं की हैं अन्य शिक्षा संस्थानों में तो इस बार क्या खास हुआ है, जो देश भर में हंगामा करने की कोशिश हो रही है? क्या सच यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की जो शृंखलाबद्ध योजना उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरू हुई थी उस शृंखला की एक और कड़ी जोड़ने का काम हो रहा है?

प्रधानमंत्री निवास पहुंचने के कुछ दिन बाद पुणे में एक मुसलिम युवक की हत्या की थी हिंदुत्व कट्टरपंथियों ने, सो इसका दोष मोदी के सिर लगाने की कोशिश की गई थी। फिर जब कुछ शिवसेना सांसदों ने एक रोजापरस्त मुसलिम सेवक के मुंह में रोटी ठूंसने की कोशिश की तो इसका भी दोष प्रधानमंत्री पर लगाने की कोशिश हुई। यह सिलसिला मीडिया की सुर्खियों से गायब हुआ, तो शुरू हो गया ईसाइयों पर तथाकथित अत्याचार का अभियान। जब मालूम पड़ा कि गिरजाघरों पर हमले छोटे-मोटे चोरों ने करवाए थे, तो क्रिश्चियन कौम अचानक सुरक्षित हो गई और मुसलमानों पर खतरा मंडराने लगा। मोहम्मद अखलाक की हत्या, बहुत शर्मनाक थी, लेकिन जिस तरह से देश के बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार वापसी अभियान चलाया, क्या वह ठीक था? क्या उससे भारत का नाम ज्यादा और मोदी का नाम कम नहीं खराब हुआ?

अब आई है दलितों पर अत्याचार की बारी। यकीन कीजिए कि यह सिलसिला भी कुछ ही दिन चलेगा, लेकिन इसके चलने से फिर से प्रधानमंत्री का ध्यान आर्थिक और सामाजिक सुधारों से हट कर जाएगा इस नए राजनीतिक चक्कर को सुलझाने पर। रोहित की आत्महत्या सुर्खियों में रहनी चाहिए थी जरूर, लेकिन क्या एक-दो सुर्खियां प्रधानमंत्री के उस भाषण पर नहीं हो सकती, जो उन्होंने विज्ञान भवन में पिछले हफ्ते दिया था? नौजवानों से भरा था विज्ञान भवन उस दिन और उनको प्रोत्साहित करने के लिए प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी सरकार पूरी तरह से उन लोगों का समर्थन करेगी, जो ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘स्टैंडअप इंडिया’ के तहत कोई नया कारोबार शुरू करेंगे।

दावोस में इस साल ग्रामीण बैंक के मोहम्मद यूनुस आए हुए हैं। एक सभा में शामिल हुए थे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और श्रीलंका के राष्ट्रपति के साथ। दोनों राजनेताओं ने जब रोजगार पैदा करने की बातें कीं अपने देशों में, तो यूनुस साहब ने कहा कि उनकी राय में रोजगार पैदा करना सरकार का काम नहीं होना चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि गरीबी अगर दूर करनी हो किसी नौजवान की, तो सबसे अच्छा रास्ता है उसको कोई कारोबार शुरू करने के लिए आर्थिक समर्थन देकर। समस्या वह है उनकी राय में कि बैंक गरीबों को कर्ज देना पसंद नहीं करते हैं। सो, इस मसले का हल जब हो जाएगा तो गरीबी समाप्त करने के लिए बहुत बड़ा कदम होगा। उन्होंने प्रधानमंत्री की जनधन योजना की तारीफ की और तारीफ इसकी भी की कि पिछले दो वर्षों में करोड़ों भारतीय पहली बार बैंकों में खाता खोल पाए हैं।

अच्छे काम और भी किए हैं मोदी सरकार ने, लेकिन ऐसा लगता है कि हम जैसे राजनीतिक पंडित कभी उनकी तरफ देखने का कष्ट उठाने की जरूरत महसूस नहीं करते हैं। शौचालयों की जरूरत मंदिरों से ज्यादा है हमारे देश में और मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने इसकी तरफ न सिर्फ ध्यान दिया है, बल्कि इस योजना को पूरी तरह से समर्थन दिया है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना निहायत जरूरी है, क्योंकि कामयाब होती है अगर यह योजना तो भारत की शक्ल बदल जाएगी, लेकिन इसके बारे में जब लिखते हैं राजनीतिक पंडित तो व्यंग्य के शब्दों में। इन्हीं शब्दों में ऐसी योजनाओं का मजाक उड़ाते हैं विपक्ष के राजनेता और उनके बयान हम छापते हैं सुर्खियों में।

समय आ गया है इस बात को स्वीकार करने का कि न विपक्ष चाहता है परिवर्तन और विकास और न ही हम मीडिया वाले। रोहित की आत्महत्या मोदी को बदनाम करने के लिए एक नया मौका देती है हमको।

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