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वक्त की नब्ज: यह मुर्दों का गांव

याद रखना जरूरी है कि सरकारी अधिकारियों को भी वही ट्रेनिंग दी जाती है आज, जो अंग्रेजों के राज में दी जाती थी। आज भी बड़े साहब रहते हैं बड़ी-बड़ी कोठियों में बिलकुल उस तरह जैसे अंग्रेज अधिकारी रहा करते थे। आज भी जनता की सेवा करने के बदले उनका प्राथमिक दायित्व है राजनेताओं की सेवा करना, चाहे इसको करते समय जनता को पांव तले कुचलना पड़े।

Priyanka Gandhi, Rahul Gandhi, Hathrasशनिवार को हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हाथरस गैंगरेप पीड़िता के परिवार से मिलने पहुंचे। (एक्सप्रेस फ़ोटो: सोर्स- अमिल भटनागर)

किसी ने ठीक ही कहा है कि भारत मुर्दापरस्तों का देश है। सो, जब तक हाथरस की वह बेटी जिंदा थी, न उसका हाल जानने कोई राजनेता पहुंचा और न ही मीडिया के वे शेर पहुंचे, जो उस समय बॉलीवुड की अभिनेत्रियों के पीछे लगे हुए थे ऐसे कि जैसे देश में कोई दूसरी खबर इतनी महत्त्वपूर्ण है ही नहीं। पंद्रह दिन तक दलित परिवार की यह बेटी मौत से अकेली लड़ती रही अपने बल पर। जिंदा रहने की इच्छा थी बहुत, लेकिन बल कहां से आता जब उसके सवर्ण जाति के बलात्कारियों ने उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ कर और उसकी जीभ काट कर मरने के लिए छोड़ दिया था उस खेत में, जहां वे उसको घसीट कर ले गए थे।

पंद्रह दिन लड़ती रही वह और मौत से पहले बयान भी दिया वीडियो पर कि उसका यह हाल किन लोगों ने किया था और स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि उसके साथ दुष्कर्म हुआ था। तब तक उसका नाम नहीं हम जानते थे, उसके मरने के बाद ही पूरे देश ने उसका नाम सुना। उसके मरने के बाद ही सोनिया गांधी और उनके बच्चों को ध्यान आया कि उत्तर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और हाथरस के लिए रवाना हुए राहुल और प्रियंका गांधी।

इसमें कोई शक नहीं कि योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने जिस तरह उस बच्ची का अंतिम संस्कार चुपके से आधी रात को किया उसके परिवार वालों की अनुपस्थिति में, वह अपने आप में बहुत बड़ा अपराध था। शुरू से हाथरस के पुलिस अधिकारी कहते रहे थे कि न उसके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, न उसकी रीढ़ की हड्डी टूटी थी और न ही उसकी जीभ काटी गई थी। सो, अब जब उन चार दरिंदों को अदालत में पेश किया जाएगा, जाहिर है वे छूट जाएंगे, क्योंकि सारे सबूत मिटा दिए गए हैं। कुछ दिन तक हल्ला मचा रहेगा और फिर हम सब भूल जाएंगे उस बच्ची का नाम।

अक्सर ऐसा ही होता है। अभी से योगी के समर्थक कहने लगे हैं सोशल मीडिया पर कि मीडिया में हल्ला वही लोग मचा रहे हैं, जो चुप रहते जब अपराधी ठाकुर नहीं, मुसलमान होते। जब भी दरिंदगी की कोई नई घटना घटी है पिछले छह वर्षों में, नरेंद्र मोदी के समर्थक ऐसा ही कहते हैं, ताकि ध्यान हट जाए उस कड़वे यथार्थ से कि मोदी की विफलताओं में सबसे बड़ी विफलता शायद यही रही है कि किसी एक भाजपा शाषित राज्य में हमने वे प्रशासनिक सुधार नहीं देखे हैं, जिनकी आशा लेकर मोदी को इस देश के लोगों ने दो बार पूर्ण बहुमत के साथ जिताया था।

कांग्रेस के लंबे दौर में न किसी प्रधानमंत्री ने और न ही किसी मुख्यमंत्री ने अंग्रेजों के बनाए हुए प्रशासनिक ढांचे में कोई सुधार लाने की कोशिश की थी। पुलिस को आज भी वही सिखाया जाता है, जो अंग्रेजों के राज में सिखाया जाता था, यानी उनका दायित्व है सरकार की सेवा करना, आम लोगों की नहीं। ऐसा प्रशिक्षण अपने देश में नहीं दिया है पुलिस को। मैं जब पहली बार इंग्लैंड गई थी और वहां के पुलिसवालों से मिली थी, मुझे आश्चर्य हुआ जब उन्होंने कहा कि उनका प्राथमिक दायित्व है आम लोगों की सेवा करना।

एक छोटे अखबार में मैंने जब ट्रेनिंग शुरू की थी स्लाउ नाम के छोटे शहर में, पहले छह महीनों में मुझे सिर्फ पुलिस के कामकाज पर लिखने को कहा गया था। तब आम लोगों के साथ उनका मिलना-जुलना, उनका बर्ताव देख कर हैरान रह गई थी। इस तरह का प्रशिक्षण अंग्रेजों ने भारत में पुलिस को नहीं दिया, इसलिए कि पुलिस का काम था गुलाम लोगों को काबू में रखना और सरकार की सेवा करना। आज तक यही चल रहा है। कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि हाथरस में पुलिस वालों ने योगी सरकार के आदेश पर आधी रात को उस बच्ची की लाश जला डाली।

रही बात योगी सरकार की संवेदनहीनता की, तो याद रखना जरूरी है कि सरकारी अधिकारियों को भी वही ट्रेनिंग दी जाती है आज, जो अंग्रेजों के राज में दी जाती थी। आज भी बड़े साहब रहते हैं बड़ी-बड़ी कोठियों में बिलकुल उस तरह जैसे अंग्रेज अधिकारी रहा करते थे। आज भी जनता की सेवा करने के बदले उनका प्राथमिक दायित्व है राजनेताओं की सेवा करना, चाहे इसको करते समय जनता को पांव तले कुचलना पड़े। मोदी जब प्रधानमंत्री नहीं थे तो अक्सर प्रशासनिक सुधारोें और देश को एक नए मार्ग पर लेकर जाने की बातें करते थे। मैं मानती हूं कि आम लोगों में बहुत उम्मीद थी कि वास्तव में मोदी ऐसा करके दिखाएंगे। अफसोस कि उन्होंने ऐसा नहीं किया है।

हाथरस जैसी दिल दहलाने वाली घटनाएं घटती हैं तो एक दर्पण बन जाती हैं, जिसमें दिखता है भारत का असली चेहरा। उस बच्ची की सहायता किसी ने नहीं की जब जिंदा थी। अब जब तड़प-तड़प कर मर गई है, तो ऐसा लगता है कि सारा देश उठ खड़ा है उसकी सहायता करने। मुख्यमंत्री ने घोषित कर दिया है कि उसके परिवार को पच्चीस लाख रुपए दिए जाएंगे और उसके एक भाई को सरकारी नौकरी। मीडिया में छाई रही है वह बच्ची और इंडिया गेट पर पहुंच गए हैं वे लोग, जो मोमबतियां जला कर अपनी संवेदना प्रकट करते हैं कुछ दिनों के लिए। लेकिन थोड़ी ही देर में उस बच्ची का नाम तक भुला दिया जाएगा और वे सुधार नहीं किए जाएंगे पुलिस और प्रशासनिक प्रशिक्षण में, जिनके बिना इस तरह की घटनाएं कभी नहीं रोकी जा सकती हैं। बहुत शर्मिंदा करती हैं ऐसी घटनाएं देश को, लेकिन आईना भी बन जाती हैं।

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