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‘आदिवासी विमर्श’ कॉलम में हरि राम मीणा का लेख : संचार और संकुचित संचेतना

नियत तारीख पर वह व्यक्ति अदालत में हाजिर हुआ और बतौर सबूत पत्थर का एक टुकड़ा और सकुआ वृक्ष की एक टहनी अदालत को दिखाते हुए पूरे विश्वास के साथ दावा किया कि ‘हुजूर पत्थर का यह टुकड़ा सैकड़ों वर्षों से मेरे घर के आंगन की चट्टान का हिस्सा है और यह हरी टहनी सकुआ के उस वृक्ष की है।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 5:39 AM
भीमराव अंबेडकर

सवाल उठता रहा है कि मुख्यधारा के जनसंचार माध्यमों में आदिवासियों को कितनी जगह मिलती है? यह मुद्दा भी सामने आता है कि उस मिली हुई जगह में आदिवासियों के प्रति मीडिया का दृष्टिकोण कहां तक यथार्थ के निकट है? दूसरे, आदिवासियों का अपना मीडिया कहां तक विकसित हुआ है? इसमें प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया और सिनेमा वगैरह सभी को शामिल किया जा सकता है। सवाल यह भी है कि मास मीडिया में आम आदमी को कितना स्थान दिया जाता रहा है?

पत्र-पत्रिकाओं के स्तर पर हमारे देश की प्रेस करीब दो शताब्दी पुरानी है, जिसका सक्रिय कालखंड आजादी की लड़ाई को माना जा सकता है। आजादी के बाद हिंदुस्तान के राजनीतिक नेतृत्व पर समाजवादी विचारधारा का प्रभाव था। साथ ही जनवादी और प्रगतिशील वामपंथी बुद्धिजीवियों का खासा असर बौद्धिक जगत में था। इसका प्रभाव अस्सी के दशक तक देखा जा सकता है। मीडिया में आदिवासियों की बात सामने आती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति दिखाई देती है कि आजादी की लड़ाई में सन 1770-71 के पहाड़िया विद्रोह से 1947 तक नागारानी गाईदिल्यू के संघर्ष तक भारत के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों में हुए विद्रोहों को इतिहास के साथ तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में कोई स्थान नहीं दिया गया। आजादी के बाद भी नक्सलवाद जैसे मुद्दों के अलावा मीडिया में अगर आदिवासियों को अभिव्यक्त किया है तो बतौर फैशन या रोमांटिक दृष्टिकोण अपनाते हुए। आदिवासी जीवन का यथार्थ अपेक्षित स्थान के साथ मीडिया में नहीं देखा गया।

सोवियत संघ के विघटन, फिर एक-ध्रुवीय विश्व और पूंजी का ध्वज उठाए अमेरिका की अगुआई में पाश्चात्य देशों की दरोगागिरी का उग्र रूप इस तथाकथित भूमंडलीय दौर में सामने आ रहा है। उसमें मास मीडिया पर केवल पूंजी के विभिन्न रूपों- बाजार, विज्ञापन, उच्च तकनीकी, ग्लैमर, व्यक्ति को पण्य में बदलने के षड्यंत्र और समग्र व्यवस्था के भीतर अवांछनीय अतिक्रमण दृश्य-अदृश्य वातावरण के अलावा कुछ सामने नहीं आ रहा है। ऐसी स्थिति में आम आदमी मुश्किल से जगह पा रहा है, आदिवासी जीवन की बातें तो अलग हैं।
सिनेमा में आदिवासियों के यथार्थ को चित्रित करने वाली गिनी-चुनी फिल्में सामने हैं। ज्यादातर सिनेमा और धारावाहिकों में आदिवासियों का चित्रण रोमांटिक या जंगली सिद्ध करने के नजरिए से ही किया गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एकाधिक ब्लॉगों ने कुछ कदम उठाए, बाकी सब जगह आदिवासी कवरेज न के बराबर है। हां, पिछले कुछ समय से इस तरफ, खासकर आदिवासी युवा वर्ग का ध्यान जाने लगा है।

राष्ट्रीय स्तर के हिंदी-अंगरेजी के प्रमुख समाचार-पत्रों के कवरेज का विश्लेषण किया जाए, तो नब्बे के दशक के बाद आदिवासियों से संबंधित खबरें या फीचर बहुत कम देखने को मिलते हैं। अब तक गिनी-चुनी पत्रिकाओं के आदिवासी विशेषांक आए हैं। इस पक्ष पर भी चर्चा होनी चाहिए कि मुख्यधारा मीडिया में पत्रकारिता, अभिनय, प्रबंधन आदि में आदिवासी समुदाय के कितने लोग जुड़े हैं? उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि इक्के-दुक्के को छोड़ कर इनका प्रतिनिधित्व नगण्य है। आदिवासी जीवन से जुड़ी विषय-वस्तु के विभिन्न पक्षों के सवालों, समस्याओं, उनके समाधानों के भीतर प्रवेश के लिए जरूरी है कि जो लोग आदिवासी जीवन से सीधे-सीधे जुड़े हुए हैं उनका सहयोग प्रतिनिधित्व के स्तर पर लिया जाए तो आदिवासी जीवन की वास्तविकता काफी हद तक सामने आ सकेगी। यह इसलिए कि आदिवासी-लोक भारतीय समाज का एकमात्र तबका है, जो अलग-थलग पड़ा हुआ है और शेष समाज से अभी तक अपेक्षित स्तर पर नहीं जुड़ पाया है।

एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। एक आदिवासी परिवार जंगल के जिस कोने में पीढ़ियों से रहता आया था, उसे अदालत में साबित करना था कि वह जगह उसी परिवार की है। परिवार का मुखिया अदालत में हाजिर हुआ। अदालत ने उससे पूछा कि ‘जहां तुम रह रहे हो वह जगह तुम्हारी है, इसका क्या प्रमाण है?’ कई पेशियों में वह कोई सबूत पेश नहीं कर पाया। उसके पास कोई दस्तावेज नहीं था, जो सिद्ध कर सके कि वह जमीन उसकी है। बहुत सोच-विचार कर उसने कहा कि ‘मेरा मुकदमा खारिज मत करो, मैं अगली तारीख पर प्रमाण प्रस्तुत कर दूंगा।’ अदालत मान गई।

नियत तारीख पर वह व्यक्ति अदालत में हाजिर हुआ और बतौर सबूत पत्थर का एक टुकड़ा और सकुआ वृक्ष की एक टहनी अदालत को दिखाते हुए पूरे विश्वास के साथ दावा किया कि ‘हुजूर पत्थर का यह टुकड़ा सैकड़ों वर्षों से मेरे घर के आंगन की चट्टान का हिस्सा है और यह हरी टहनी सकुआ के उस वृक्ष की है, जो मेरे बुजुर्गों ने मेरे घर के आंगन में लगाया था।’ जज उस व्यक्ति और उसके प्रमाणों की तरफ अचंभे से देखने लगा। वह इस उधेड़-बुन में था कि इन प्रमाणों को माना जाए या नहीं?

अदालत का फैसला अपनी जगह। मीडिया ने अपना फैसला इस शीर्षक से दे दिया- ‘पागल पहुंचा अदालत में’। खबर के शीर्षक के निहितार्थ बहुत गहरे और व्यापक हैं। न्याय प्रणाली उन कानूनों पर आधारित होती है, जिन्हें किसी राष्ट्र-समाज की मुख्य धारा के जन-मानस की परंपराओं, भावनाओं, आवश्यकताओं, अपेक्षाओं के अनुरूप बनाया जाता है। जमीन के मालिकाना हक से संबंधित कानून है कि जमीन का कोई टुकड़ा किसी व्यक्ति की मिल्कियत तभी होगा जब वह वंशानुगत या क्रय किया हुआ या भेंट-दान-बख्शीस में प्राप्त और तद्नुसार हस्तांतरित हो। इसका बाकायदा दस्तावेज तैयार किया जाता है, जो राजस्व रिकार्ड का हिस्सा होता है। ठेठ आदिवासी समाज आज भी इस प्रक्रिया से अनभिज्ञ है। यही वजह है कि वनाधिकार अधिनियम 2005 बन जाने के बावजूद आदिवासिओं को उनकी पुश्तैनी जमीन पर मालिकाना हक मिलने में कई प्रकार की कठिनाइयां आ रही हैं। उनके पास जमीन होने का एकमात्र आधार वंशानुगत कब्जा है और उस कब्जे का अभिलेखीय नियमन नहीं हुआ। ऐसी दशा में एक आदिवासी चट्टान का टुकड़ा या पेड़ की टहनी को बतौर सबूत अदालत में पेश करता है, जो मुख्यधारा के कानूनी प्रावधानों में नहीं आता।

ऐसे में मीडिया की दृष्टि क्या हो? इस सवाल का जवाब अब भी शेष है। मीडिया की भूमिका में तथ्यात्मक सूचना का प्रचार-प्रसार, मनोरंजन और जन-चेतना फैलना मुख्य है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सूचना उपलब्ध कराना भी जनचेतना का हिस्सा है और स्वस्थ मनोरंजन जीवन में अपनी महत्त्व रखता है। यहां आदिवासी समाज में जनचेतना पैदा करने का मुद्दा सामने आता है। प्रजातांत्रिक प्रणाली में संश्लिष्ट समाज के निर्माण का दूसरा मुद्दा सामने आता है। प्राकृतिक अधिकारों की दृष्टि से उस आदिवासी परिवार की पुश्तैनी जमीन पर उसका आधिपत्य स्वीकार करने का मुद्दा केंद्र में है। इन सारे पक्षों को देखते हुए मीडिया की भूमिका क्या होनी चाहिए और मीडिया ने पूर्वोक्त शीर्षक से खबर शाया करके कौन-सी भूमिका निभाई, यह विचारणीय विषय है।

मौजूदा दौर में मीडिया के लिए बाजार में बिक्री योग्य तथाकथित सेलेब्रिटीज, न्यूज मैन्यूपुलेशन, टीआरपी, पेड न्यूज, स्टिंग आॅपरेशन, मीडिया ट्रायल, आदि महत्त्वपूर्ण है, न कि किसी के मौलिक-प्राकृतिक अधिकारों का प्रश्न। अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले उस आदिवासी के लिए क्या सत्य पर आधारित ‘मीडिया ट्रायल’ संभव नहीं था? जमीन के हक की लड़ाई लड़ने वाले झारखंड के उस आदिवासी परिवार का यह उदाहरण अकेली घटना नहीं है। आदिवासी समाज की जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ाई का मुद्दा व्यापक है, जो उस समाज का मौलिक अधिकार है, जिसे सरकार ने भी वनाधिकार अधिनियम के तहत स्वीकार किया है। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने नंदी बाई के प्रकरण में 5 जनवरी, 2011 को अत्यंत महत्त्वपूर्ण न्यायादेश पारित किया, जो आदिवासी समाज को इस महादेश का मौलिक उत्तराधिकारी मानता है।

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